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रिस्क

मेरे भीतर
दौड़ना चाहती है
इक नदी
दरदरे रेगिस्तान की ओर।

मस्तिष्क ने कहा-
“रिस्क है इसमें।”

मन बोला-
“जुआ ही तो है
या तो लहलहा उठेगा
रेगिस्तान
या दरदरा जाएगी
नदी!”

ज़माना दर्द देता है

बिना मांगे मुझे सब कुछ मिरा दातार देता है
वो दरिया है जो पत्थर को नया आकार देता है

सरे-महफ़िल मुझे जो बेवज़ह दुत्कार देता है
अकेले में वो मिलता है तो मुझको प्यार देता है

बताओ कौन है मुज़रिम, ग़रीबी या कि वो बापू
जो बच्चों की तमन्नाओं को हर दिन मार देता है

मिरे भीतर के शाइर को कोई व्यापार सिखलाए
ज़माना दर्द देता है तो ये अशआर देता है

फ़साना एक ही होता है शाइर और वीणा का
जो छेड़ो तो तड़पकर इक नई झनकार देता है

कोई कितना भी दुनिया में भटक ले, पर यही सच है
हमेशा आसरा अपना ही घर-परिवार देता है

✍️ चिराग़ जैन

संकल्प

मैं ये दावा नहीं करता कि दुनिया को बदल दूंगा
मगर जो रास्ता सच का हो, उस रस्ते पे चल दूंगा
मेरा अधिकार है चिंतन पे, संकल्पों पे, कर्मों पे
मैं ये संकल्प लेता हूँ कि सत्कर्मों पे बल दूंगा

© चिराग़ जैन

इरादा

तेरे मन में भी इक इरादा है
मेरे मन में भी इक इरादा है
वक्त क़ी आंधियाँ बताएंगीं
कौन मजबूत कितना ज्यादा है
✍️ चिराग़ जैन

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