रिस्क
मेरे भीतर
दौड़ना चाहती है
इक नदी
दरदरे रेगिस्तान की ओर।
मस्तिष्क ने कहा-
“रिस्क है इसमें।”
मन बोला-
“जुआ ही तो है
या तो लहलहा उठेगा
रेगिस्तान
या दरदरा जाएगी
नदी!”
Chirag Jain Writings, Free Verse, Mann To Gomukh Hai, Poetry
मेरे भीतर
दौड़ना चाहती है
इक नदी
दरदरे रेगिस्तान की ओर।
मस्तिष्क ने कहा-
“रिस्क है इसमें।”
मन बोला-
“जुआ ही तो है
या तो लहलहा उठेगा
रेगिस्तान
या दरदरा जाएगी
नदी!”
Chirag Jain Writings, Do Misron Ke Beech, Ghazal, Poetry
बिना मांगे मुझे सब कुछ मिरा दातार देता है
वो दरिया है जो पत्थर को नया आकार देता है
सरे-महफ़िल मुझे जो बेवज़ह दुत्कार देता है
अकेले में वो मिलता है तो मुझको प्यार देता है
बताओ कौन है मुज़रिम, ग़रीबी या कि वो बापू
जो बच्चों की तमन्नाओं को हर दिन मार देता है
मिरे भीतर के शाइर को कोई व्यापार सिखलाए
ज़माना दर्द देता है तो ये अशआर देता है
फ़साना एक ही होता है शाइर और वीणा का
जो छेड़ो तो तड़पकर इक नई झनकार देता है
कोई कितना भी दुनिया में भटक ले, पर यही सच है
हमेशा आसरा अपना ही घर-परिवार देता है
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Do Misron Ke Beech, Muktak, Poetry
मैं ये दावा नहीं करता कि दुनिया को बदल दूंगा
मगर जो रास्ता सच का हो, उस रस्ते पे चल दूंगा
मेरा अधिकार है चिंतन पे, संकल्पों पे, कर्मों पे
मैं ये संकल्प लेता हूँ कि सत्कर्मों पे बल दूंगा
© चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Do Misron Ke Beech, Muktak, Poetry
तेरे मन में भी इक इरादा है
मेरे मन में भी इक इरादा है
वक्त क़ी आंधियाँ बताएंगीं
कौन मजबूत कितना ज्यादा है
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Do Misron Ke Beech, Muktak, Poetry
जैसा चाहो जवाब दो इसको
दुनिया ऐसा सवाल है यारो
प्रेम के रंग से निखारो तो
ज़िन्दगी बेमिसाल है यारो
✍️ चिराग़ जैन