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दुःख

वाह के मज़मों में अक्सर मौज़ूद होती है आह भी। जैसे बहुत कुछ पा लेने पर भी नहीं मिट पाती है कसक कुछ खो जाने की। दुःख जन्मता है ख़ुशियों की कुक्षि से कदाचित् यही सिद्ध करने के लिये जलती हैं खलिहानों में रखी फ़सलें फटते हैं धरती पर उतरते अंतरिक्ष-यान मरते हैं जवान बेटे...
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