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सपने कभी नहीं मरते

बचपन में
मेरी मजबूरियों ने
मुझसे कुछ सपने छीनकर
फेंक दिये थे
ज़मीन पर

कुछ समय तक
देखता रहा मैं उन्हें
दूर से ही

फिर उन पर
चढ़ गयीं कई परतें
…व्यस्तताओं की
…समय की
…और बेख्याली की

मुझे लगा
कि समा गये हैं
वे सब सपने
क़ब्र में।

लेकिन मैं ग़लत था
बीते कुछ दिन से
मेरे मन के ठीक नीचे
कुछ हलचल सी
महसूस होती थी

मैंने अपनी व्यस्तता की
परत हटाकर देखा
तो वे सब सपने
गहरे तक
फैला चुके थे अपनी जड़ें
विराट हो चुका था उनका स्वरूप

जिसे मैं क़ब्र समझ रहा था
वह क्यारी निकली
और जिन्हें मैं देह समझता रहा
वे बीज निकले।

✍️ चिराग़ जैन

सपनों की शोकसभा

समय मिले तो तुम भी आना दो झूठे आँसू टपकाने
हमने जो मिलकर देखे थे, उन सपनों की शोकसभा है
तुम जिनका तर्पण कर आए जीवन नदिया की धारा में
जो आँखों में ठहर गए थे, उन लम्हों की शोकसभा है

जिनसे फिल्टर हो जाते थे, कड़वाहट के सब कीटाणु
सबसे पहले अपनेपन की दोनों किडनी फेल हुई हैं
संवादों के सन्नाटे में दिल छोटा होता जाता था
मुस्कानों को लकवा मारा, आलिंगन को जेल हुई है
जिन दीवारो-दर को हम-तुम दोनों अपना घर कहते थे
जिन रिश्तों को अपना माना, उन अपनों की शोकसभा है

तस्वीरों पर धूल जमी है, गुलदस्तों में वीरानी है
आंगन की तुलसी मुरझाई, सूखी है सुख की हरियाली
अपशकुनों ने पैर पसारे, सारी चीजें़ लावारिस हैं
सारा कलरव मौन हुआ है, सारा घर लगता है खाली
जिनको उड़ने की हिम्मत हम दोनों मिल-जुलकर देते थे
हिम्मत कर पाओ तो आना, उन पंखों की शोकसभा है

✍️ चिराग़ जैन

ओस पड़ी है

सपनों के कुछ चित्र खिंचे हैं, अन्तस के कॅनवास पर
यूँ समझो कुछ ओस पड़ी है, सूखी-सूखी घास पर

आँसू से मुस्कान भिगोई, तब जाकर कुछ रंग मिले
सीमाओं के पिंजरे तोड़े, इच्छाओं के पंख हिले
फिर पहरों तक मुग्ध रहे हम, मन के सहज उजास पर

अलकों के पीछे इक दुनिया बसती है उल्लासों की
जिसमें बस बातें होती हैं रासों की मधुमासों की
उसमें जाकर हँस लेता हूँ, जीवन के संत्रास पर

आँख खुली तो दिन आ पहुँचा लेकर कर्ज़ हज़ारों का
मैंने उसको हाल सुनाया सपनों के गलियारों का
तब से ये दिन शर्मिन्दा हैं, रातों के उपहास पर

✍️ चिराग़ जैन

अधूरे ख़्वाब

हर रात
मैं बुनता था इक ख़्वाब
और फिर
उसको अधूरा छोड़
चुपचाप सो जाता था
कि कभी तुम्हारे साथ
साकार करूंगा
ख़्वाब में उभरा
ये ख़ूबसूरत लम्हा…

एक-एक करके
जाने कितने ही सपने
इकट्ठे हो गए
मेरे तकिए के नीचे।

आज जब सोने लगा मैं
बिना संजोए कोई ख़्वाब
तो अचानक
मेरे सामने खड़े हो गए
सैंकड़ों अधूरे ख़्वाब
तकिए के नीचे से निकलकर।

सबकी भंगिमा में मौजूद था
एक ही प्रश्न-
“अब हमारा क्या होगा?”

मैंने कहा-
“काश ये निर्णय
मेरे वश में होता!”

✍️ चिराग़ जैन

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