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अपनों से हारा लालकिला

जब लालकिला बदरंग हुआ हथियार चले हुड़दंग हुआ उस दिन पानी-पानी क्यों था सारा का सारा लालकिला अपनों से हारा लालकिला इस लालकिले ने कितने ही तख़्तों की उलट-पलट देखी साज़िश देखीं, धोखे देखे, इतिहासों की करवट देखी जब भी कोई दुश्मन आया, तब-तब हुंकारा लालकिला अपनों से हारा...

दिल्ली

रोज़ उजड़े, रोज़ सँवरे, इस शहर का दिल अलग है मत मिसालें दो हमारी, अपना मुस्तकबिल अलग है कुछ अलग है नूर दिल्ली का दिल बहुत मशहूर दिल्ली का खण्डहरों के साथ कितने युग खड़े हैं मुँह उठाए ख़ून में भीगी रही है साज़िशों के ज़ख़्म खाए पर इन्हीं सब साज़िशों ने रच दिया इतिहास जग में...

संविधान

धागेनातीनकगधिंन ताल चलती है, पर सुर सारेगामापाधानीसा में समाय के नूपुर छनन छन, घनन घनन घण्ट; मृदंग बजत द्रुम द्रुम द्रुम गाय के पंचम-निषाद तीव्र-कोमल से रंगे राग, दुगुन-तिगुन ताल भेद समझाय के विलग विलग स्वर गान बनते हैं, जब सब एकरूप होते सम पर आय के कभी सब त्याग...

व्यवस्थित अव्यवस्था

सिस्टम… यह एक ऐसा शब्द है, जो किसी भी भारतीय भाषा में अनूदित होकर प्रपंच बन जाता है। ईश्वर को जब सृष्टि का सर्वाधिक दीन प्राणी बनाना था, तो उसने भारतीय सिस्टम में फँसा मनुष्य बना डाला। हमारा संविधान प्रत्येक नागरिक को ‘समानता का अधिकार’ देता है; इसलिए हमारा...

पाठक से लेखक बनने तक का सफ़र

हिन्दी साहित्य में दो क़िस्म के पाठक होते हैं। पहली श्रेणी है प्रशंसक पाठकों की। वे सोशल मीडिया पर खाता बनाते ही टटोल-टटोल कर लेखकों को फ्रेंड रिक्वेस्ट भेजते हैं। फिर उनकी हर पोस्ट को देखते ही उसके नीचे कुछ निश्चित शब्दयुग्म पेस्ट करके निकल लेते हैं। इस सबमें ये इतने...
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