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पिछले दो-तीन दिनों से पुलिस और जनता के मध्य के संबंधों की जैसी तस्वीरें सोशल मीडिया पर दिखाई दे रही हैं, उनसे हमारे देश की सामाजिक व्यवस्था के चेहरे पर ग्रहण लग रहा है।
किसी सभ्य तथा विकासोन्मुखी व्यवस्था में पुलिस और जनता के मध्य परस्पर विश्वास का सम्बंध होता है। दोनों एक-दूसरे की गतिविधियों पर नज़र रखते हुए एक दूसरे के अधिकारों का सम्मान करते हैं, तो समाज के दो पैरों की भूमिका निबाहते प्रतीत होते हैं।
एक पैर जब दूसरे पैर को पीछे छोड़कर आगे बढ़ रहा होता है तब वह दरअस्ल दूसरे पैर के आगे आने का रास्ता बना रहा होता है। इसी समन्वय पर समाज ‘चलता’ है।
किन्तु ये दोनों पैर यदि आपस में उलझना प्रारंभ कर दें तो समाज को लड़खड़ाने से कोई नहीं बचा सकता।
ये दोनों ही पैर एक दूसरे के इतने समीप रहते हैं कि चलने की प्रक्रिया में इनमें परस्पर घर्षण की घटनाएँ स्वाभाविक हैं।
ट्रैफिक पुलिस के जवानों के साथ होनेवाली झड़पें, पैट्रोलिंग करते जवानों के साथ होनेवाली कहासुनी, किसी पुलिसकर्मी के भ्रष्टाचार की वीडियो और ऐसी ही अन्य जो दुर्घटनाएं सोशल मीडिया पर वायरल होती हैं, वे इसी घर्षण का प्रमाण हैं।
विपरीत परिस्थितियों में अधिकारियों की डाँट, पारिवारिक चुनौतियों, नकारात्मक परिवेश और प्रोटोकॉल के दायित्व निबाहते हुए पब्लिक के बीच ड्यूटी करते पुलिसवालों की मनोदशा में चिड़चिड़ापन शुमार होना स्वाभाविक है।
दूसरी ओर अपनी किसी तात्कालिक समस्या से त्रस्त नागरिक का बिलखते हुए, भन्नाए हुए, अकड़ते हुए या चिल्लाते हुए थाने आना भी स्वाभाविक है।
यहाँ तक नागरिकों और पुलिस के मध्य के संबंधों में कुछ नया नहीं है। लेकिन 19 जुलाई 2026 के बाद से दिल्ली में छात्र-आंदोलनस्थल से दोनों ओर की जो तस्वीरें दिखाई जा रही हैं वे स्वाभाविक नहीं हैं।
सोशल मीडिया, पुलिस को क्रूर सिद्ध करने पर उतारू है और मेन स्ट्रीम मीडिया, आंदोलनकारियों को गुंडा बताने पर तुला है।
हिंसा कहीं से भी शुरू हो, वह समाज के लिए कभी भी हितकारी नहीं हो सकती। पुलिसकर्मियों की लाठी से पिटकर बिलखते-चिल्लाते युवा भी समाज के भविष्य के लिए प्रश्नचिन्ह खड़े करते हैं और आंदोलनकारियों की भीड़ में फंसकर हांफता हुआ पुलिसकर्मी भी सामाजिक सौहार्द की सबसे कमज़ोर गाँठ को स्पर्श कर चुका है।
आंदोलन को लेकर सरकार की अपनी कुछ रणनीति हो सकती है। आंदोलन को लेकर विपक्ष की भी अपनी सोच हो सकती है। विधायिका और राजनीति को सड़कों पर उतरे इस जनसमूह को राजद्रोही घोषित करना है या जागरूक नागरिक -यह सियासत का विषय है लेकिन इस सियासी शतरंज में यदि समाज हार गया तो दो बादशाहों को जिताने के लिए बाइस मोहरे कुर्बान हो जाएंगे।
आंदोलन लोकतंत्र का फ्यूल पंप है। यहाँ से पाथेय लेकर लोकतंत्र जनहित की राह पर तेज़ी से दौड़ता है। आंदोलन के फ्यूल की माइलेज हर बार गाड़ी की क्वालिटी के अनुरूप बदल सकती है।
लेकिन ईंधन भरवाते समय पेट्रोल टैंक का फटना ख़तरनाक है। इसलिए पुलिस और जनता दोनों को ही स्मरण रखना होगा कि अराजकता की राह पर बढ़ा एक भी कदम समाज को गहरे अंधकार में धकेल देगा।
आंदोलनकारियों को षड्यंत्रकारी, राष्ट्रद्रोही, धर्मविरोधी, ग़द्दार और आतंकवादी कहना सरकारों की प्रवृत्ति रही है। आपातकाल के दौरान सत्ता के आलोचकों पर ‘राजद्रोह’ के चार्ज लगे। विपक्ष तो विपक्ष, विपक्ष की विचारधारा तक को समर्थन देनेवाले जेलों में भर दिए गए। स्वतंत्रता संग्राम के दौरान अपने अधिकारों की मांग करनेवाले ‘दंगाई’, ‘उपद्रवी’ और ‘अपराधी’ घोषित किए गए। अन्ना आंदोलन और बाबा रामदेव के धरने के प्रति सत्ता का नज़रिया अभी स्मृतियों से ग़ायब नहीं हुआ है। किसान आंदोलन, खिलाड़ियों के धरने और मजदूरों के आंदोलन के प्रति सरकारी नीतियों के ज़ख़्म तो अभी तक हरे हैं।
इसलिए किसी भी जन आंदोलन का समर्थन करो या विरोध… यह ध्यान रहे कि आपका निर्णय किसी लामबंद मीडिया, किसी राजनैतिक दल अथवा किसी विचारधारा के influence से प्रभावित न हो।
और आंदोलनस्थल पर खड़े हर आंदोलनकारी को और हर सुरक्षाकर्मी को यह याद रखना चाहिए कि सरकार पराई हो सकती है; षड्यंत्र विदेशी हो सकते हैं; लेकिन देश आपका अपना है।

✍️ चिराग़ जैन

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