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यात्रा

अब तक पथ पर फूल बिछे थे नयन लुभावन चित्र खिंचे थे अब इक कंकड़ चुभ जाने से, मैं रस्ते को दोष न दूंगा जिस क्यारी को हाथ लगाया, उसमें फूल खिले; क्या कम है? जिस पगडण्डी को अपनाया, उस पर मीत मिले; क्या कम है? रेले-मेले, खेल-तमाशे, उत्सव के पल पाये यहाँ से अब कुछ सन्नाटा...

कोई बिछड़कर मिला है

जहाँ तुमको बस एक पत्थर मिला है वहाँ हमको जन्नत का मंज़र मिला है उसे भी ग़ज़ब का मुक़द्दर मिला है मुक़द्दर में जिसको तिरा दर मिला है कहाँ कोई ऐसा क़लन्दर मिला है जिसे मन मुताबिक़ मुक़द्दर मिला है हुआ एक अरसे के बाद आज तनहा लगा, जैसे कोई बिछड़कर मिला है भले चोट की जिस्म पर...
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