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याद का गीत

याद ने इक रेशमी-सा जाल फिर फैला लिया है मन ज़रूरी काम सारे छोड़कर है गुम याद फिर से आ रही हो तुम त्यौरियां चिन्ताओं का बोझा सम्भाले फिर रही हैं चेतना बरसों पुराने हर्ष में उलझी हुई है हाथ में तो ढेर सारे काम हैं आधे-अधूरे उंगलियाँ केवल तुम्हारे स्पर्श में उलझी हुई हैं...

देह और प्राण

देह के कष्ट से जिनको परहेज है प्राण का सुख उन्हें मिल सकेगा नहीं संकुचित ही रहेगी अगर पाँखुरी कोई गुल बाग में खिल सकेगा नहीं सत्य है, जो खिले वो सभी एक दिन पत्ती-पत्ती चमन में बिखर जाएंगे पर बिखरने के डर से जिन्होंने सुमन बंद करके रखा वो भी मर जाएंगे प्रेम पिंजरा अगर...
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