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संघर्ष का जयगान

लड़ते-लड़ते हार गया था कल जो सूरज अंधियारे से उसकी एक किरण से गहरे अंधकार की मौत हो गई मस्तक की त्यौरी बन जाती थी जिस विष का नित्य ठिकाना इक मुस्कान खिली तो उस सारे विकार की मौत हो गई जिस रिश्ते को छोड़ गए थे निर्जन वन में निपट अकेला जिसको अपनेपन से ज़्यादा भाया दुनिया...
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