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रोटी

पेट को जब भूख लगती है तो अक्सर पाँव सबके घर से बाहर आ निकलते हैं भूख के कारण सभी प्राणी, परिन्दे, जानवर सब कीट और इन्सान तक संघर्ष करते हैं तितलियाँ लड़ती हैं अक्सर आंधियों से चींटियाँ चलतीं कतारों में निकलकर बांबियों से साँप, बिल को छोड़कर फुफकारते हैं शेर, तजकर मांद...

सच के नाम पे

दुनिया की बदसलूक़ी का तोहफ़ा लिये जिया फिर भी मैं अपने सच का असासा लिये जिया कोई महज ईमान का जज्बा लिये जिया कोई फ़रेब-ओ-झूठ का मलबा लिये जिया टूटन, घुटन, ग़ुबार, अदावत, सफ़ाइयाँ इक शख़्स सच के नाम पे क्या-क्या लिये जिया जब तक मुझे ग़ुनाह का मौक़ा न था नसीब तब तक मैं बेग़ुनाही...

सार्थकता

सच बोलने की भी जो हिम्मत जुटा न सके ऐसी निरी खोखली जवानी किस काम की शोषण को देख नहीं लहू में उबाल आए बोलो ऐसी ख़ून की रवानी किस काम की लाज, प्रेम, करुणा की नमी यदि सूख जाए भला फिर आँख बिन पानी किस काम की जिसके निधन पे न चार नैन नम हुए ऐसे आदमी की ज़िन्दगानी किस काम की...
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