Chirag Jain Writings, Do Misron Ke Beech, Ghazal, Poetry
अब सही काम कर रहा हूँ मैं
अपने अंदर उतर रहा हूँ मैं
मैं कहाँ हूँ बता नहीं सकता
शायरी से गुज़र रहा हूँ मैं
चाहतें जो मुझे चिढ़ाती थीं
उनके अब पर कतर रहा हूँ मैं
जी रहा हूँ ये बात भी सच है
ये भी सच है कि मर रहा हूँ मैं
✍️ चिराग़ जैन
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उस पल जब चीख़ बन गई थी
एक नन्हीं किलकारी
जब दहल उठा था सारा ब्रह्मांड
जब दरक गई थी धरती
उस पल केवल तुम आई थीं
उसकी छटपटाहट को आलिंगन में भरकर दुलारने
तुम दूर ले गईं उसे बर्बर वहशी की पहुँच से! …
तुमने उसे मारा नहीं; बचा लिया है मृत्यु!
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Geet, Poetry, Unpublished Geet
जिन डेरों ने उत्सव पूरा था रैना के आँचल में
भोर उन्हीं डेरों पर इक वीराना पाती है
अंधियारे में जीवन सबका रंग-रंगीला लगता है
पहली किरण उदासी का अफ़साना पाती है
जिनके बिन हर महफ़िल का सिंगार अधूरा होता है
उन फूलों का गुच्छा सुबह केवल घूरा होता है
जिसके दम पर महफ़िल अपना सिर ऊँचा कर लेती है
वो सब कुछ सुबह होने तक चूरा-चूरा होता है
झूठे रंग उतर जाते हैं रात गुज़रने से पहले
भोर महज सच का बदरंग ख़ज़ाना पाती है
साज पड़े होते हैं लेकिन सुर थक कर सो जाते हैं
देह पड़ी रह जाती है और प्राण कहीं खो जाते हैं
जिनका आकर्षण था उनसे दिल घबराने लगता है
जश्न सुबह की क्यारी में इक सन्नाटा बो जाते हैं
रात जवानी की बाँहों में रास रचाती फिरती है
और सुबह रंगरलियों से उकताना पाती है
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Geet, Poetry, Unpublished Geet
चाहे कितनी देह सँवारें
चाहे जैसे रूप निखारें
चाहे कितनी गन्ध उड़ाएं
चाहे गुलशन को महकाएं
लेकिन इतना तय है इक दिन, इस डाली से झर जाने हैं
आख़िर फूल बिखर जाने हैं
सारा नूर हवा होता है, तन भी कुम्हलाने लगता है
जिस सूरज ने प्राण भरे थे, वो ही झुलसाने लगता है
जिन झोंकों के छूने पर हम, ख़ुद पर इतराते फिरते थे
उन झोंकों के छूने से भी, ये मन घबराने लगता है
कुछ पल के मेहमान सभी हैं, फिर सब अपने घर जाने हैं
आख़िर फूल बिखर जाने हैं
इस क्यारी ने जाने कितने फूलों का खिलना देखा है
रस की चाहत में भँवरों के पंखों का छिलना देखा है
इस बगिया को इन फूलों का रूप लुभा पाएगा कैसे
इस बगिया ने सुंदरता का मिट्टी में मिलना देखा है
इसको है मालूम सभी के इक दिन रंग उतर जाने हैं
आख़िर फूल बिखर जाने हैं
इसका नूर दिनों ने देखा, उसके हिस्से रातें आईं
कुछ वनफूलों के हिस्से बस, आँसू की बरसातें आईं
हम सब लोगों का ही जीवन, केवल क़िस्मत का खेला है
कुछ को माली ने दुलराया, कुछ के हिस्से घातें आईं
हम सारे ही लोग यहाँ बस कुछ दिन जीकर मर जाने हैं
आख़िर फूल बिखर जाने हैं
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Do Misron Ke Beech, Ghazal, Poetry
मरने की चाह, ज़िन्दगी जीने से कम रही
लहरों की चाल मेरे सफ़ीने से कम रही
दौलत की चमक सबसे ज़ियादा रही मग़र
मजदूर के माथे के पसीने से कम रही
सेहरा की तेज़ धूप में भी तिश्नगी तो थी
पर हिज्र में सावन के महीने से कम रही
ताउम्र मैं ख़ुशी की शक्ल भूल न पाया
आफ़त भी मेरे पास क़रीने से कम रही
✍️ चिराग़ जैन