अयोध्या
शोभ रही नगरी सरयू-तट, खोज रहे उपमा तुलसी
नील सरोवर में दमके, जिस भाँति कली इक रातुल-सी
मानस-मानस राम बिराजत, आंगन-आंगन माँ तुलसी
या नगरी वरनैं न थके, क्या तो आदिकवि, अरु क्या तुलसी
✍️ चिराग़ जैन
शोभ रही नगरी सरयू-तट, खोज रहे उपमा तुलसी
नील सरोवर में दमके, जिस भाँति कली इक रातुल-सी
मानस-मानस राम बिराजत, आंगन-आंगन माँ तुलसी
या नगरी वरनैं न थके, क्या तो आदिकवि, अरु क्या तुलसी
✍️ चिराग़ जैन
पथराए हुए नयन बोले
देहरी बोली, आंगन बोले
फिर राम अयोध्या लौटे हैं
पुलकित होकर जन-जन बोले
साकेत स्वर्ग हो जाएगा, अब रामराज सम्भव होगा
जिसमें जन-जन हो शोकमुक्त, ऐसा समाज सम्भव होगा
अब नहीं कहीं कोई अबला, पत्थर बनकर दिन काटेगी
अब नहीं कहीं कोई रेखा, मानव-मानव को बाँटेगी
शबरी के बेर चखें राघव, फिर ये रिवाज सम्भव होगा
जिसमें जन-जन हो शोकमुक्त, ऐसा समाज सम्भव होगा
जिस धाम चुनौती उपजेगी, उस धाम उपाय निकालेंगे
नल-नील, गिलहरी सब मिलकर, सागर पर सेतु बना लेंगे
अपने सीमित संसाधन से हर कामकाज सम्भव होगा
जिसमें जन-जन हो शोकमुक्त, ऐसा समाज सम्भव होगा
अब कहीं किन्हीं सुग्रीवों के अन्तस् में क्षोभ नहीं होगा
अब युद्ध जीतने वाले को, लंका का लोभ नहीं होगा
अपनी-अपनी मर्यादा में, अब राजकाज सम्भव होगा
जिसमें जन-जन हो शोकमुक्त, ऐसा समाज सम्भव होगा
✍️ चिराग़ जैन
जिसके चेहरे की पीड़ा को पढ़कर तुम बेचैन हुए थे
उसकी आँखों के आँसू से तुमने कैसे आँख चुरा ली
जिसकी हर इच्छा का बिरवा, तुमने साँसों से पोसा था
उसकी चाहत के झूले से कैसे तुमने शाख़ चुरा ली
सिसकी भरने से पहले ही, तुम दुलराने आ जाते थे
दुनिया से मन ऊब न जाए, प्यार जताने आ जाते थे
एकाकीपन की सर्दी से जब अंतर्मन काँप रहा था
तुमने भी उस ही मौसम में रिश्तों की पोशाक चुरा ली
उम्मीदों का साथ न हो तो, साँसें कुम्हलाने लगती हैं
मन में कोई आस न हो तो, आँखें पथराने लगती हैं
तुमसे ही उम्मीद बची है, उसको मत मर जाने देना
दुनिया ने बाक़ी उम्मीदें, सीना करके चाक चुरा लीं
✍️ चिराग़ जैन
किसने बोला काम करो
घर बैठो, आराम करो
कितना कुछ है मुमकिन देख
घर पर बैठ बुलेटिन देख
बहसों से कर टाइम पास
कितने हैं अच्छे दिन देख
भूख लगी हो ख़बरें खा
ख़बरों से ही प्यास बुझा
दिन भर अख़बारों को पढ़
फिर अख़बारों पर सो जा
ख़बरों पर विश्राम करो
घर बैठो आराम करो
बाहर क़ाफ़ी गर्दी है
गर्मी, बारिश, सर्दी है
दो रोटी के चक्कर में
तूने आफत कर दी है
दाम चढ़ेंगे, बढ़ने दे
रोग बढ़ेंगे, बढ़ने दे
तंत्र मलाई खाएगा
तू बस ख़ुद को कढ़ने दे
हर सपना नीलाम करो
घर बैठो, आराम करो
माना, तेरी आदत है
लेकिन बाहर दहशत है
तुझको ज़िंदा रखना है
तेरी अभी ज़रूरत है
भाषण हो तो बाहर जा
रैली में नारे लगवा
नेताजी को वोट दिला
फिर मरता हो तो मर जा
ऐसे उम्र तमाम करो
घर बैठो आराम करो
दुःखड़ा गाकर क्या होगा
सच दिखलाकर क्या होगा
गूंगी-बहरी जनता को
गीत सुनाकर क्या होगा
हम ऐसे फरियादी हैं
हर शोषण के आदी हैं
भीतर दहके अंगारे
बाहर गांधीवादी हैं
मन ही मन संग्राम करो
घर बैठो आराम करो
✍️ चिराग़ जैन
आँखन में कजरा धर राधा ने श्याम के रूप को नैन बसायो
श्याम ने बाँसुरी होंठ लगाय के राधा के होंठों पे साज सजायो
राधा ने श्याम को श्याम ने राधा को होरी की भोरी ही रंग लगायो
देह से देह रही बिरहा पर नेह से नेह नहीं बिसरायो
✍️ चिराग़ जैन
एक जीवन में हमें संसार जितना दिख रहा है
वह गगन के एक कण बादल से ज़्यादा कुछ नहीं है
चांद, मंगल तक सफर की ख्वाहिशें और कोशिशें सब
बालपन के मूढ़ कौतूहल से ज़्यादा कुछ नहीं है
जो तुम्हारी दृष्टि को बस टिमटिमाते दिख रहे हैं
वे सभी तारे तुम्हारी सोच से बेहद बड़े हैं
क्षेत्रफल, ऊँचाइयाँ जो नापकर रटते रहे हो
वे महज इंसान के कुछ मनलुभावन आँकड़े हैं
लहलहाता दिख रहा है जो तुम्हें सागर, धरा पर
फर्श पर इक बून्द की हलचल से ज़्यादा कुछ नहीं है
बाँह के विस्तार से ही विश्व की गणना करो मत
पाँव से मत इस ज़मीं को नापने की डींग मारो
सिर्फ़ अपनी देह के आकार से तुलना करो मत
हो सके तो दृष्टि को ऊँचाई पर लाकर निहारो
तुम जिसे आकाशचुम्बी कह रहे गर्दन उठाकर
वह शिखर भी खुरदुरे भूतल से ज़्यादा कुछ नहीं है
उम्र केवल एक ज़र्रा है समय की अंजुमन का
इस जगत् की एक सिहरन मात्र ये जीवन समर है
जिस धरा के एक टुकड़े पर बसी दुनिया तुम्हारी
ये धरा ही इस महाब्रह्मांड में बस बून्द भर है
तुम जिसे दुनिया समझकर जीत लेना चाहते हो
यूँ समझ लो, एक टिड्डीदल से ज़्यादा कुछ नहीं है
✍️ चिराग़ जैन