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न्याय की व्यवस्था

यदि सब कुछ ठीक-ठाक चलता रहा तो
चैनलों पे रोज़ तीन-पाँच कौन करेेगा
पुलिस वुलिस सब ठीक काम कर लें तो
बड़े-बड़े झूठ भला साँच कौन करेगा
न्याय की व्यवस्था संविधान में करी है ऐसी
अब भला साँच पर आँच कौन करेगा
पैंसठ दिनों में बस इतना पता चला है
एक्टर के मामले की जाँच कौन करेगा

✍️ चिराग़ जैन

संदर्भ: सुशांत सिंह राजपूत के मामले की जाँच सीबीआई को सौंपी गई

गड़बड़ है विपक्ष में

अपनी ही बात को उठाने से क्यों चूकते हैं
ऐसा कैसा शासन का डर है विपक्ष में
शासन को छोड़ कर आपस में लड़ते हैं
किसी भूत-प्रेत का असर है विपक्ष में
दुखती हुई क्या कोई रग सी दबी हुई है
नाम सुनते ही थर-थर है विपक्ष में
मुद्दों पे सही से बात करने से बचते हैं
लगता है कोई गड़बड़ है विपक्ष में

✍️ चिराग़ जैन

नाय पलटी सरकार

पायलट ऐसी-तैसी कर गौ, उलटो पर गयो वार
पूरा जोर लगाया फिर भी नाय पलटी सरकार

होटल-होटल नेता दौड़े, दिल्ली दौड़ी आस
सेंटर दौड़ा, जयपुर दौड़ा, सबकी फूली साँस
गुरुग्राम में लोकतंत्र का हो न सका उपचार
पूरा जोर लगाया फिर भी नाय पलटी सरकार

कांग्रेस में गाली गूंजी, बीजेपी में दाम
कैसे अपने लोकतंत्र की भली करेंगे राम
नए नोट हैं सूटकेस में, सत्ता है व्यापार
पूरा जोर लगाया फिर भी नाय पलटी सरकार

✍️ चिराग़ जैन

संदर्भ: सचिन पायलट को मोहरा बनाकर राजस्थान में सरकार गिराने की कोशिश नाकाम

रोटी मांगे पेट

राम जी का मंदिर बनैया रे, बनैया रे
देस में बजई हैं बधैया रे
सरयू जी के तट पर रमैया रे
देस में बजई हैं बधैया रे

रामराज की फील करा दो, सब कुछ कर दो सेट
भूखे पेट भजन का करिहैं, रोटी मांगे पेट
कित्ते दिन मंझीरा बजैया रे
देस में बजई हैं बधैया रे

थाली और कटोरी देखें दो रोटी की राह
चूल्हा ठण्डा पड़ा सीगड़ी कब से रही कराह
बैठी-बैठी घूरे कढ़ैया रे
देस में बजई हैं बधैया रे

पैटरोल के दाम डराते, देस रहा है झेल
सारी पूंजी हर कर ले गया, रावण बनकर तेल
कैसे अब गड़िया चलैया रे
देस में बजई हैं बधैया रे

✍️ चिराग़ जैन

रावण

यदि अब राम की शरण में चला गया; तो,
मुझे मेरे भीतर का पाप मार डालेगा।
एकमात्र सधवा बचेगी मेरी पत्नी तो,
शेष विधवाओं का विलाप मार डालेगा।।
जिनसे सुशोभित थी रावण की राजसभा,
उन रिक्त आसनों का शाप मार डालेगा।
मृत्यु जो करेगी वह जग को दिखायी देगा,
जीवन तो मुझे चुपचाप मार डालेगा।।

जिस अपराध से न मुक्त हो सकूंगा कभी,
उसको मैं बीच मँझधार कैसे छोड़ दूँ?
अब मेरा पाप मेरे साथ जग से विदा हो,
पाप पर जीवन उधार कैसे छोड़ दूँ?
वीर हूँ, तो जीतकर जीतत्याग कर दूंगा,
अन्यथा मैं भाग्य लिखी हार कैसे छोड़ दूँ?
विजयी हुआ, तो सिया राम को ही सौंप दूंगा,
युद्ध करने का मैं विचार कैसे छोड़ दूँ?“

हारने को कुछ भी बचा नहीं है शेष अब,
प्राणप्रिय पुत्र मेघनाद भी चला गया।
नयनों से अधरों तलक हुआ भावहीन,
हर्ष भी चला गया, विषाद भी चला गया।।
जीत भी गया, तो किसको दिखायेगा विजय,
हारने का हर अवसाद भी चला गया।
रण में मरण का वरण करना ही होगा,
रावण ये जानने के बाद भी चला गया।।

तन अट्टहास करता था निज मूढ़ता पे,
मन रो रहा था अपनों के तर्पण को।
जिसपे गिरा था उसके कुटुम्ब का रुधिर,
चूमने चला था, उस भू के कण-कण को।।
अपनी ही हठ से प्रचण्ड क्रुद्ध हो गया था,
राम से नहीं था कोई क्षोभ दशानन को।
जिससे हुई थी बंधु-बांधवों की देह जीर्ण,
भोगने गया था उस बाण की चुभन को।।

उचक-उचक नभ में कुटुम्ब ढूंढ़ता था,
सबको लगा जो अभिमान से भरा हुआ।
दस-दस शीश धरती में गड़े जा रहे थे,
अपने ही मन से स्वयम् उतरा हुआ।।
अपने ही हाथों, अपना ही यश नष्ट कर,
अपने ही आप को बहुत अखरा हुआ।
रामजी ने हार-जीत की प्रथा निभायी बस,
रावण तो रण में गया ही था मरा हुआ।।

✍️ चिराग़ जैन

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