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धरती के गहने हैं पेड़

रंग-बिरंगे पत्तोंवाले
धरती के गहने हैं पेड़
मिट्टी के मटमैले तन पर
पृथ्वी ने पहने हैं पेड़

क्यारी में ये फूल खिलाते
ठण्डी-ठण्डी हवा चलाते
धूप चुभे तो छाया लाते
बारिश में छतरी बन जाते

कभी फलों से लदती डाली
कभी फूल लाते ख़ुशहाली
साँस सुहाती गंध निराली
आँखों को भाती हरियाली

इनसे जंगल हर्षाते हैं
बाग़-बगीचे मुस्काते हैं
पेड़ प्रदूषण पी जाते हैं
इस कारण हम जी पाते हैं

✍️ चिराग़ जैन

बोनसाई

आदेशों का दास नहीं है शाखा का आकार कभी
ले तक सीमित मत करना पौधे का संसार कभी

जड़ के पाँव नहीं पसरे तो, छाँव कहाँ से पाओगे
जिस पर पंछी घर कर लें वो ठाँव कहाँ से लाओगे
बालकनी में बंध पाया क्या, बरगद का विस्तार कभी

कोंपल, बूटे, कलियाँ, डाली; ये सब कुछ आबाद रहे
तब ही आती है ख़ुशहाली, जब मौसम आज़ाद रहे
नभ में चहक नहीं भर सकता, पिंजरे का परिवार कभी

सीमा में जकड़े बिरवे की सहज सुगंध नदारद है
जो तितली की बाँह पकड़ ले, वो मकरंद नदारद है
नकली पेड़ों पर बरसा है, क्या बादल का प्यार कभी

नज़रों को दौड़ाना सीखो, विस्तारों को मत छाँटो
घर में चहक भरी रखने को, चिड़िया के पर मत काटो
पलकों में भर पाता है क्या, सूरज का उजियार कभी

✍️ चिराग़ जैन

बुनियादों की मज़बूती

धूप, कंगूरों की रंगत को चाट गई जब धीरे-धीरे
तब बुनियादों की मज़बूती दीवारों के काम आ गई

होठों पर ताले लटके थे, संवादों पर बर्फ़ जमी थी
आखर-आखर आतंकित था, हर आहट सहमी-सहमी थी
सबके अपने-अपने सुख थे, सबके अपने-अपने कमरे
तब छोटी-सी एक मुसीबत, परिवारों के काम आ गई
फिर बुनियादों की मज़बूती दीवारों के काम आ गई

अपनेपन का आलिंगन भी कुछ पल ही मन को भाता है
प्रेम घड़ी भर दूर नहीं हो, तो वह पिंजरा बन जाता है
बेमतलब की भावुकता का बोझ डुबो ही देता किश्ती
तब कुछ व्यवहारिक पतवारें, मझधारों के काम आ गई
फिर बुनियादों की मज़बूती दीवारों के काम आ गई

जड़ की अनदेखी करते हैं, फुनगी पर इतरानेवाले
फिर-फिर धरती पर आते हैं, उड़कर ऊपर जानेवाले
जब ख़ुद के ईश्वर होने से ईश्वर का मन ऊब गया है
तब कुछ इंसानी लीलाएँ, अवतारों के काम आ गई
फिर बुनियादों की मज़बूती दीवारों के काम आ गई

✍️ चिराग़ जैन

आँसू की आवाज़

जो रैली में पींग बढ़ाते नारों की
हालत देखो जाकर उन बेचारों की

इंसानों की बस्ती भूखी बैठी है
तुम बातें करते हो चाँद-सितारों की

आँसू की आवाज़ छुपाकर रख पाएँ
इतनी भी औक़ात कहाँ दीवारों की

लहरों से कश्ती का हाथ छुड़ाना है
हिम्मत बढ़ती जाती है पतवारों की

सिगरेट को इक बार बुझाना उंगली से
गर तासीर समझनी है अंगारों की

✍️ चिराग़ जैन

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