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दशरथ

ना तो किसी रोग से टूटा
ना ही समरांगण में हारा
जिस राजा का शौर्य अमर था
उसको कोपभवन ने मारा
उसकी देह धराशायी थी, जिसका नाम स्वयं दशरथ था
तन पर कोई घाव नहीं था, पर अंतर्मन से लथपथ था

वाणी से विषबाण चलाकर, जीवन का अमरित ले बैठी
जिसने हर रण जीता उसको इक रानी की जिद ले बैठी
होनहार बलवान थी वरना
फूल छोड़, काँटे क्यों चुनती
रानी कान भरे बैठी थी
राजा की अनुनय क्या सुनती
अपने घर के उपवन में ही पीड़ादायक कंटकपथ था
तन पर कोई घाव नहीं था, पर अंतर्मन से लथपथ था

सपनों ने सत्कार न चाहा, बेटे ने अधिकार न चाहा
जो पत्नी सबसे प्यारी थी, उसने उस पल प्यार न चाहा
पत्नी बात नहीं सुनती थी
बेटा दर्द नहीं कहता था
मन पर इतना भार उठाए
राजा मन भर दुःख सहता था
वो जिनको अन्याय मिला था, उसका मौन अधिक घातक था
तन पर कोई घाव नहीं था, पर अंतर्मन से लथपथ था

जिस पर तन-मन वार दिया था, उसने मन पर वार किया था
वाणी से तलवार चलाकर, राजा का मन मार दिया था
एक पुराना पाप फला था
शीतल जल से कण्ठ जला था
जिससे निश्छल प्रेम किया था
उसने अवसर जान छला था
मन टूटा, फिर साँसें उखड़ीं, यश-वैभव सब क्षत-विक्षत था
तन पर कोई घाव नहीं था, पर अंतर्मन से लथपथ था

✍️ चिराग़ जैन

भाजपा की चुनावी रणनीति

जब खेलन देनउ नाय
तो हाय
जे खेल को ड्रामा काइं करनौ

बैटिंग करनेवालन के बल्ले ही तोड़ दए हैं
रन लेनेवालन के दोनूं जूते जोड़ दए हैं
सीमा कू चर गई गाय
आय हाय
जे खेल को ड्रामा काइं करनौ

कैसे फेंकें गेंद समूची पिच ही खोद रखी है
अपनी तीनों किल्ली तुमने भगवा पोत रखी हैं
भगवा कू कौन गिराय
मर जाय
जे खेल को ड्रामा काइं करनौ

जिधर जरा हरक़त हो गेंद उधर ही मुड़ सकती है
एम्पायर की अपनी ख़ुद की किल्ली उड़ सकती है
कोई कैसे हाथ हिलाय
रे हाय
जे खेल को ड्रामा काइं करनौ

✍️ चिराग़ जैन

मनमोहन सिंह के बयान पर सियासत

जिनको मौनी बाबा कह के चिढ़ाया
उन्हीं का बयान ले उड़े
पहले तुमको निहत्था बताया
फिर हाथ से कमान ले उड़े

कहने भर को पीएम थे पर बोल न पाए मनमोहन
हाथ हिलाना दूर, होंठ तक खोल न पाए मनमोहन
अपने ही घर में प्रतिभा का मोल न पाए मनमोहन
अपना ऑर्डिनेंस फटने पर डोल न पाए मनमोहन
उनके होंठों पे ताला लगाया
ये पूरा हिन्दुस्तान ले उड़े
जिनको मौनी बाबा कह के चिढ़ाया
उन्हीं का बयान ले उड़े

आंदोलन पर लाठी बरसी, कंघी बेची गंजे को
सीबीआई तोता बन गई ऐसा कसा शिकंजे को
अपनी ही बंदूक की गोली धांय लगी है पंजे को
जाने किस-किस बेचारे की हाय लगी है पंजे को
तुमने सोतों पे डंडा चलाया
ये सपनों की दुकान ले उड़े
जिनको मौनी बाबा कह के चिढ़ाया
उन्हीं का बयान ले उड़े

ऊंचाई का अहम न करते तो झुक जाना ना पड़ता
ठोकर पर संभले होते, घुटनों पर आना ना पड़ता
अपनों से मिलते-जुलते तो मान गंवाना ना पड़ता
दूर-दूर तक जनता के दर चलकर जाना ना पड़ता
अपने हाथों ही अवसर गंवाया
ये सत्ता का गुमान ले उड़े
जिनको मौनी बाबा कह के चिढ़ाया
उन्हीं का बयान ले उड़े

✍️ चिराग़ जैन

भाजपा और चुनाव

केलकूलेटर ने भी पकड़े हैं कान
ये जादू मन्तर कैसे सीखा
कहीं मिलते नहीं हाथों के निशान
ये जादू मन्तर कैसे सीखा

नगालैंड में ख़ुद प्रत्याशी वोट न करने आता
त्रिपुरा में वोटिंग पर्सेंटेज सौ से ऊपर जाता
सौ पर्सेंट से भी ज़्यादा मतदान
ये जादू मन्तर कैसे सीखा

प्रत्याशी के प्रस्तावक ही अंडर ग्राउण्ड हुए हैं
बाकी सभी लड़ाकों के भी पर्चे राउण्ड हुए हैं
सबकी सूरत पर है एक ही निशान
ये जादू मन्तर कैसे सीखा

बीजेपी की रैली, बाकी सबकी रेल बना दो
ऐसा करो चुनावों पर ही बुलडोजर चलवा दो
ना समस्या बचे ना ही समाधान
ये जादू मन्तर कैसे सीखा
✍️ चिराग़ जैन

ईद

ईद के चांद अगर हो तो बस इतना कर दे
फिर से इस मुल्क के लहजे में मिठास आ जाए

✍️ चिराग़ जैन

विजय का मंत्र

जो समर्पित हो गया मजबूर होकर
वह तुम्हारा हित करेगा; भूल जाओ
जो न अपने मन मुताबिक जी रहा हो
वह तुम्हारे हित मरेगा; भूल जाओ

कर्ण इक एहसान के वश में विवश थे
द्रोण इक प्रतिशोध के कारण खड़े थे
शल्य इक षड्यंत्र से आहत हुए थे
भीष्म इक प्रण की विवशता में लड़े थे
मन बचा पाया नहीं जो, शूर होकर
वह तुम्हारा ध्वज धरेगा; भूल जाओ

पाप बर्बर हो उठेगा जीत कर भी
तुम स्वयं की हार से भी प्यार करना
मूढ़ता संख्या जुटाती ही रहेगी
तुम निहत्थे मित्र का सत्कार करना
कृष्ण जिसके साथ हो, भरपूर होकर
वह किसी सूरत डरेगा; भूल जाओ

बैठ मत जाना थकन से चूर होकर
पास आएगी विजय; कुछ दूर होकर
जब निराशा टीस दे नासूर होकर
तब करो निर्माण; चकनाचूर होकर
स्वयं को स्वीकार ले जो क्रूर होकर
वह कभी दुःख से भरेगा; भूल जाओ

✍️ चिराग़ जैन

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