Chirag Jain Writings, Geet, Poetry, Unpublished Geet
ना तो किसी रोग से टूटा
ना ही समरांगण में हारा
जिस राजा का शौर्य अमर था
उसको कोपभवन ने मारा
उसकी देह धराशायी थी, जिसका नाम स्वयं दशरथ था
तन पर कोई घाव नहीं था, पर अंतर्मन से लथपथ था
वाणी से विषबाण चलाकर, जीवन का अमरित ले बैठी
जिसने हर रण जीता उसको इक रानी की जिद ले बैठी
होनहार बलवान थी वरना
फूल छोड़, काँटे क्यों चुनती
रानी कान भरे बैठी थी
राजा की अनुनय क्या सुनती
अपने घर के उपवन में ही पीड़ादायक कंटकपथ था
तन पर कोई घाव नहीं था, पर अंतर्मन से लथपथ था
सपनों ने सत्कार न चाहा, बेटे ने अधिकार न चाहा
जो पत्नी सबसे प्यारी थी, उसने उस पल प्यार न चाहा
पत्नी बात नहीं सुनती थी
बेटा दर्द नहीं कहता था
मन पर इतना भार उठाए
राजा मन भर दुःख सहता था
वो जिनको अन्याय मिला था, उसका मौन अधिक घातक था
तन पर कोई घाव नहीं था, पर अंतर्मन से लथपथ था
जिस पर तन-मन वार दिया था, उसने मन पर वार किया था
वाणी से तलवार चलाकर, राजा का मन मार दिया था
एक पुराना पाप फला था
शीतल जल से कण्ठ जला था
जिससे निश्छल प्रेम किया था
उसने अवसर जान छला था
मन टूटा, फिर साँसें उखड़ीं, यश-वैभव सब क्षत-विक्षत था
तन पर कोई घाव नहीं था, पर अंतर्मन से लथपथ था
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Geet, Lapete Mein Netaji, Poetry
जब खेलन देनउ नाय
तो हाय
जे खेल को ड्रामा काइं करनौ
बैटिंग करनेवालन के बल्ले ही तोड़ दए हैं
रन लेनेवालन के दोनूं जूते जोड़ दए हैं
सीमा कू चर गई गाय
आय हाय
जे खेल को ड्रामा काइं करनौ
कैसे फेंकें गेंद समूची पिच ही खोद रखी है
अपनी तीनों किल्ली तुमने भगवा पोत रखी हैं
भगवा कू कौन गिराय
मर जाय
जे खेल को ड्रामा काइं करनौ
जिधर जरा हरक़त हो गेंद उधर ही मुड़ सकती है
एम्पायर की अपनी ख़ुद की किल्ली उड़ सकती है
कोई कैसे हाथ हिलाय
रे हाय
जे खेल को ड्रामा काइं करनौ
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Geet, Lapete Mein Netaji, Poetry
जिनको मौनी बाबा कह के चिढ़ाया
उन्हीं का बयान ले उड़े
पहले तुमको निहत्था बताया
फिर हाथ से कमान ले उड़े
कहने भर को पीएम थे पर बोल न पाए मनमोहन
हाथ हिलाना दूर, होंठ तक खोल न पाए मनमोहन
अपने ही घर में प्रतिभा का मोल न पाए मनमोहन
अपना ऑर्डिनेंस फटने पर डोल न पाए मनमोहन
उनके होंठों पे ताला लगाया
ये पूरा हिन्दुस्तान ले उड़े
जिनको मौनी बाबा कह के चिढ़ाया
उन्हीं का बयान ले उड़े
आंदोलन पर लाठी बरसी, कंघी बेची गंजे को
सीबीआई तोता बन गई ऐसा कसा शिकंजे को
अपनी ही बंदूक की गोली धांय लगी है पंजे को
जाने किस-किस बेचारे की हाय लगी है पंजे को
तुमने सोतों पे डंडा चलाया
ये सपनों की दुकान ले उड़े
जिनको मौनी बाबा कह के चिढ़ाया
उन्हीं का बयान ले उड़े
ऊंचाई का अहम न करते तो झुक जाना ना पड़ता
ठोकर पर संभले होते, घुटनों पर आना ना पड़ता
अपनों से मिलते-जुलते तो मान गंवाना ना पड़ता
दूर-दूर तक जनता के दर चलकर जाना ना पड़ता
अपने हाथों ही अवसर गंवाया
ये सत्ता का गुमान ले उड़े
जिनको मौनी बाबा कह के चिढ़ाया
उन्हीं का बयान ले उड़े
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Geet, Lapete Mein Netaji, Poetry
केलकूलेटर ने भी पकड़े हैं कान
ये जादू मन्तर कैसे सीखा
कहीं मिलते नहीं हाथों के निशान
ये जादू मन्तर कैसे सीखा
नगालैंड में ख़ुद प्रत्याशी वोट न करने आता
त्रिपुरा में वोटिंग पर्सेंटेज सौ से ऊपर जाता
सौ पर्सेंट से भी ज़्यादा मतदान
ये जादू मन्तर कैसे सीखा
प्रत्याशी के प्रस्तावक ही अंडर ग्राउण्ड हुए हैं
बाकी सभी लड़ाकों के भी पर्चे राउण्ड हुए हैं
सबकी सूरत पर है एक ही निशान
ये जादू मन्तर कैसे सीखा
बीजेपी की रैली, बाकी सबकी रेल बना दो
ऐसा करो चुनावों पर ही बुलडोजर चलवा दो
ना समस्या बचे ना ही समाधान
ये जादू मन्तर कैसे सीखा
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Do Misron Ke Beech, Ghazal, Poetry
ईद के चांद अगर हो तो बस इतना कर दे
फिर से इस मुल्क के लहजे में मिठास आ जाए
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Geet, Poetry, Unpublished Geet
जो समर्पित हो गया मजबूर होकर
वह तुम्हारा हित करेगा; भूल जाओ
जो न अपने मन मुताबिक जी रहा हो
वह तुम्हारे हित मरेगा; भूल जाओ
कर्ण इक एहसान के वश में विवश थे
द्रोण इक प्रतिशोध के कारण खड़े थे
शल्य इक षड्यंत्र से आहत हुए थे
भीष्म इक प्रण की विवशता में लड़े थे
मन बचा पाया नहीं जो, शूर होकर
वह तुम्हारा ध्वज धरेगा; भूल जाओ
पाप बर्बर हो उठेगा जीत कर भी
तुम स्वयं की हार से भी प्यार करना
मूढ़ता संख्या जुटाती ही रहेगी
तुम निहत्थे मित्र का सत्कार करना
कृष्ण जिसके साथ हो, भरपूर होकर
वह किसी सूरत डरेगा; भूल जाओ
बैठ मत जाना थकन से चूर होकर
पास आएगी विजय; कुछ दूर होकर
जब निराशा टीस दे नासूर होकर
तब करो निर्माण; चकनाचूर होकर
स्वयं को स्वीकार ले जो क्रूर होकर
वह कभी दुःख से भरेगा; भूल जाओ
✍️ चिराग़ जैन