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आदेशों का दास नहीं है शाखा का आकार कभी
ले तक सीमित मत करना पौधे का संसार कभी

जड़ के पाँव नहीं पसरे तो, छाँव कहाँ से पाओगे
जिस पर पंछी घर कर लें वो ठाँव कहाँ से लाओगे
बालकनी में बंध पाया क्या, बरगद का विस्तार कभी

कोंपल, बूटे, कलियाँ, डाली; ये सब कुछ आबाद रहे
तब ही आती है ख़ुशहाली, जब मौसम आज़ाद रहे
नभ में चहक नहीं भर सकता, पिंजरे का परिवार कभी

सीमा में जकड़े बिरवे की सहज सुगंध नदारद है
जो तितली की बाँह पकड़ ले, वो मकरंद नदारद है
नकली पेड़ों पर बरसा है, क्या बादल का प्यार कभी

नज़रों को दौड़ाना सीखो, विस्तारों को मत छाँटो
घर में चहक भरी रखने को, चिड़िया के पर मत काटो
पलकों में भर पाता है क्या, सूरज का उजियार कभी

✍️ चिराग़ जैन

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