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तेरा बाप डार्लिंग

तू तिल है, ताड़ सा है तेरा बाप डार्लिंग
ससुरा कबाड़-सा है तेरा बाप डार्लिंग

हर वक्त चर्र-चर्र, चपड़-चैं, चुकर-चुकर
टूटे किवाड़ सा है तेरा बाप डार्लिंग

यूँ तू तो किसी कुश्ती के मैडल की तरह है
धोबी पछाड़ सा है तेरा बाप डार्लिंग

हर एक दाँत का है अलग रंग, अलग शेड
पूरा जुगाड़ सा है तेरा बाप डार्लिंग

रेखा जी की आवाज़ में बच्चन के डायलॉग
ऐसी दहाड़ सा है तेरा बाप डार्लिंग

✍️ चिराग़ जैन

एक प्यादे से मात पलटेगी

हर नई रुत के साथ पलटेगी
ख़ुश्बू-ए-क़ायनात पलटेगी

ये सियासत है इस सियासत में
एक प्यादे से मात पलटेगी

किसकी बातों का क्या यक़ीन करें
पीठ पलटेगी, बात पलटेगी

रंग परछाई तक का बदलेगा
सुब्ह होगी तो रात पलटेगी

तुम सँभलकर बस अपनी चाल चलो
इक न इक दिन बिसात पलटेगी

वक़्त जब-जब भी करवटें लेगा
ज़िन्दगी साथ-साथ पलटेगी

✍️ चिराग़ जैन

दिल में आह बाक़ी है

जब तलक़ दिल में आह बाक़ी है
तब तलक़ वाह-वाह बाक़ी है

अब कहाँ कोई ज़ुल्म ढाता है
ये पुरानी कराह बाक़ी है

ख्वाब सारे फ़ना हुए लेकिन
देखिए ख्वाबगाह बाक़ी है

मैंने सब कुछ लुटा दिया लेकिन
अब भी इक ख़ैरख्वाह बाक़ी है

जिस्म को रूह छोड़ती ही नहीं
हो न हो कोई चाह बाक़ी है

ज़िन्दगानी भटक गई तो क्या
हर जगह एक राह बाक़ी है

कट चुका है शजर कभी का मगर
अब भी धरती पे छाह बाक़ी है

मिरे दिल को कचोटता है बहुत
मुझमें मेरा ग़ुनाह बाक़ी है

मिरी यादों के शामियाने में
एक भीगी निगाह बाक़ी है

✍️ चिराग़ जैन

हादसा थी ज़िन्दगी

हादसा थी ज़िन्दगी, होता रहा जो उम्र भर
दौलते-लमहात थी, खोता रहा जो उम्र भर

कौन समझे उसके अश्क़ों की ढलकती दास्तां
बस दरख़तों से लिपट, रोता रहा जो उम्र भर

अब तो कलियों से भी उसकी पीठ क़तराने लगी
पत्थरों को गुल समझ ढोता रहा जो उम्र भर

इक न इक दिन उसका घर अश्क़ों में डूबेगा ज़रूर
सबके आंगन में हँसी बोता रहा जो उम्र भर

मौत को देखा तो वो भी कसमसा कर रो दिया
ज़िन्दगी को बोझ-सा ढोता रहा जो उम्र भर

मौत ने आकर जगाया तो सुबककर रो पड़ा
ऑंख में सपने लिए सोता रहा जो उम्र भर

मौत जब आई तो मौक़ा देखते ही बेहिचक
उड़ गया पिंजरे में इक तोता रहा जो उम्र भर

✍️ चिराग़ जैन

अंदाज़ा न कर

पीर की ज़द का अंदाज़ा न कर
कल की आफ़त का अंदाज़ा न कर

ज़ख़्म गहरा है दर्द होगा ही
अब रियायत का अंदाज़ा न कर

वक़्त पर ख़ुद-ब-ख़ुद पनपती है
यूँ ही हिम्मत का अंदाज़ा न कर

बीज में पेड़ छिपा होता है
क़द से ताक़त का अंदाज़ा न कर

सिर्फ़ दो दिन की मुलाक़ातों से
उनकी आदत का अंदाज़ा न कर

हँस के मिलना तो उसकी आदत है
इससे उल्फ़त का अंदाज़ा न कर

इसमें मुमक़िन है हर कोई मंज़र
इस सियासत का अंदाज़ा न कर

सिर्फ़ जामे को देखकर उसकी
बादशाहत का अंदाज़ा न कर

चाहता हूँ तुझे मीरा होकर
तू इबादत का अंदाज़ा न कर

जिसने मांगा न हो कभी कुछ भी
उसकी चाहत का अंदाज़ा न कर

✍️ चिराग़ जैन

सूरज

फिर अंधेरा निगल गया सूरज
फिर चिराग़ों को खल गया सूरज

चंद पहरों की ज़िन्दगानी में
कितने चेह्रे बदल गया सूरज

गर हुआ ऑंख से ज़रा ओझल
लोग कहते हैं ढल गया सूरज

रात गहराई तो समझ आया
सारी दुनिया को छल गया सूरज

आज फिर रोज़ की तरह डूबा
कैसे कह दूँ सँभल गया सूरज

✍️ चिराग़ जैन

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