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कोई कैसे सच बोले

जब तक हमसे भाग्य हमारे खोटे होकर मिलते हैं
बस तब ही तक हम लोगों से छोटे होकर मिलते हैं

कोई कैसे सच बोले सबकी है अपनी लाचारी
अब तो दर्पण से भी लोग मुखोटे होकर मिलते हैं

जिनसे मतलब हो बस उनकी हाँ को हाँ कहते हैं जो
उनका क्या है; बिन पेंदी की लोटे होकर मिलते हैं

जब से ख़ुद्दारी गिरवी रख, हमने बेच दिया ईमान
तब से वही लिफ़ाफ़े हमको मोटे होकर मिलते हैं

हमरे कैसी करी तरक्क़ी, इमली, पीपल, बरगद सब
धरती से कट कर गमलों में छोटे होकर मिलते हैं

✍️ चिराग़ जैन

बेअसर हो जाएंगे

ग़र वो मेरे हमसफ़र हो जाएंगे
चार दिन यूँ ही बसर हो जाएंगे

आज जो बनकर मरीज़ आए यहाँ
कल ये सारे चारागर हो जाएंगे

झूठ के सब दाँव सच के नाम पर
एक पल में बेअसर हो जाएंगे

चांद का मजहब नहीं पूछो जनाब
वरना दंगे चांद पर हो जाएंगे

हमने कब सोचा था सच्ची बात पर
आप रुसवा इस क़दर हो जाएंगे

✍️ चिराग़ जैन

सियासत का ज़हर

सच के मंतर से सियासत का ज़हर काट दिया
हाँ, ज़रा रास्ता मुश्क़िल था, मगर काट दिया

वक्ते-रुख़सत तिरी ऑंखों की तरफ़ देखा था
फिर तो बस तेरे तख़य्युल में सफ़र काट दिया

फिर से कल रात मिरी मुफ़लिसी के ख़ंज़र ने
मिरे बच्चों की तमन्नाओं का पर काट दिया

सिर्फ़ शोपीस से कमरे को सजाने के लिए
हाय ख़ुदगर्ज़ ने खरगोश का सर काट दिया

एक छोटा-सा दिठौना मिरे माथे पे लगा
बद्दुआओं का मिरी माँ ने असर काट दिया

✍️ चिराग़ जैन

जीत की चाहत

चंद सस्ती ख्वाहिशों पर सब लुटाकर मर गईं
नेकियाँ ख़ुदगर्ज़ियों के पास आकर मर गईं

जिनके दम पर ज़िन्दगी जीते रहे हम उम्र भर
अंत में वो ख्वाहिशें भी डबडबाकर मर गईं

बदनसीबी, साज़िशें, दुश्वारियाँ, मातो-शिक़स्त
जीत की चाहत के आगे कसमसाकर मर गईं

मीरो-ग़ालिब रो रहे थे रात उनकी लाश पर
चंद ग़ज़लें चुटकुलों के बीच आकर मर गईं

वो लम्हा जब झूठ की महफ़िल में सच दाखिल हुआ
साज़िशें उस एक पल में हड़बड़ा कर मर गईं

क्या इसी पल के लिए करता था गुलशन इंतज़ार
जब बहार आई तो कलियाँ खिलखिला कर मर गईं

जिन दीयों में तेल कम था, उन दीयों की रोशनी
तेज़ चमकी और पल में डगमगा कर मर गईं

दिल कहे है- प्रेम में उतरी तो मीरा जी उठीं
अक्ल बोले- बावरी थीं, दिल लगाकर मर गईं

ये ज़माने की हक़ीक़त है, बदल सकती नहीं
बिल्लियाँ शेरों को सारे गुर सिखाकर मर गईं

✍️ चिराग़ जैन

तू भी सब-सा निकला

जो जितना भी सच्चा निकला
वो उतना ही तनहा निकला

सुख के छोटे-से क़तरे में
ग़म का पूरा दरिया निकला

कुछ के वरक़ ज़रा महंगे थे
माल सभी का हल्का निकला

मैंने तुझको ख़ुद-सा समझा
लेकिन तू भी सब-सा निकला

कौन यहाँ कह पाया सब कुछ
कम ही निकला जितना निकला

✍️ चिराग़ जैन

हमने देखे हैं कई साथ निभानेवाले

हमने देखे हैं कई साथ निभानेवाले
बरगला लेंगे तुझे भी ये ज़मानेवाले

बारिशों में ये नदी कैसा कहर ढाती है
ये बताएंगे तुझे इसके मुहानेवाले

धूप जिस पल मिरे आंगन में उतर आएगी
और जल जाएंगे दीवार उठानेवाले

मौत ने ईसा को शोहरत की बुलंदी बख्शी
ख़ाक़ में मिल गए सूली पे चढ़ानेवाले

रास्ते सच के बहुत तंग, बहुत मुश्क़िल हैं
सोच ले ये भी ज़रा जोश में आनेवाले

अपनी ऑंखों को भी सिखला ले हुनर धोखे का
झूठी बातों से हक़ीक़त को छिपानेवाले

✍️ चिराग़ जैन

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