Chirag Jain Writings, Geet, Poetry, Unpublished Geet
तो क्या हुआ, अगर जीवन में थोड़ा-सा संत्रास लिखा है
जिसने जितनी पीड़ा झेली, उतना ही इतिहास लिखा है
जिस काया में गर्भ विराजे उसकी रंगत खो जाती है
अन्न उपजना होता है तो धरती छलनी हो जाती है
जो डाली फलती है उसको बोझा भी ढोना पड़ता है
भोर अगर नम होती है, तो रातों को रोना पड़ता है
पत्ता-पत्ता झरना सीखा, तब जाकर मधुमास लिखा है
जिसने जितनी पीड़ा झेली, उतना ही इतिहास लिखा है
फूल लदी डालों से जो तूफान भिड़े, वो महक उठे हैं
साजिंदे की उंगली से जो साज छिड़े, वो चहक उठे हैं
जिस राघव ने घर छोड़ा था, उसने पूरा युग जीता है
जिस रानी ने सुख मांगा था, उसका अंतर्मन रीता है
कैकेयी ने तो ख़ुद अपने ही जीवन में वनवास लिखा है
जिसने जितनी पीड़ा झेली, उतना ही इतिहास लिखा है
खोने को तो पांचाली के पाँच सुतों ने जीवन खोया
लेकिन जो रण में जूझा था युग उसके ही शव पर रोया
काया वज्र बनानी है तो तय मानो, लोहा पीना है
उत्सव के हर इक कारण को एकाकी जीवन जीना है
शबरी ने जीवन भर आँसू भोगे, तब उल्लास लिखा है
जिसने जितनी पीड़ा झेली, उतना ही इतिहास लिखा है
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Do Misron Ke Beech, Muktak, Poetry
उनको जाने क्या-क्या सहना पड़ता है
ख़ुद से आँख चुराकर रहना पड़ता है
हम तो केवल सच से काम चलाते हैं
उनको थोड़ा झूठ भी कहना पड़ता है
✍️ चिराग़ जैन
Article, Chirag Jain Writings, Kohra Ghanaa Hai, Prose
एक अभिनेत्री ने कुछ ऐसे बयान दिये हैं, जो तथ्यात्मक रूप से मिथ्या हो सकते हैं, लेकिन इन बयानों का विरोध करनेवालों की भाषा तथा तर्कशक्ति ने अभिनेत्री के मिथ्या भाषण से ध्यान भंग करने में महती भूमिका अदा की है। ‘कम कपड़े पहनकर फिल्मी पर्दे पर आनेवाली नचनिया हमें बताएगी कि आज़ादी क्या होती है!’ -यह वाक्य पढ़कर मुझे लगा कि कुतर्क तथा तर्कहीनता इस देश की किसी भी बहस का अंग बन चुका है। क्यों भाई, यदि किसी अभिनेता/अभिनेत्री ने किसी फिल्म में नकारात्मक भूमिका निर्वाह की है तो क्या इससे उसका चरित्र आंका जाएगा? क्या कम कपड़े पहननेवाले इस देश के नागरिक नहीं हैं?
कोई ‘क्या’ कह रहा है -इस मुद्दे पर बहस को केंद्रित करने की बजाय हम उसके परिधान, उसकी जाति, उसके धर्म, उसके व्यवसाय, उसकी पारिवारिक स्थिति और उसकी निजता को क्यों टटोलने लगते हैं?
आज़ादी भीख में मिलनेवाली बात कोई साड़ी-ब्लाउज़ या सूट-शलवार पहनकर कहे तो क्या यह सत्य हो जाएगी? हमें लम्बे समय से मूल मुद्दे को भटकाने के संस्कार दिए गए हैं। टीवी पर होने वाली बहसें यह ट्रेनिंग देने में सफल हुई हैं।
प्रश्न पूर्व का पूछा जाएगा तो उत्तरदाता उसे उठाकर दक्षिण में पटक देगा और फिर दक्षिणवाले उस प्रश्न को अनर्गल साबित कर देंगे। इतना हो हल्ला होगा कि कुछ घड़ी बाद ख़ुद प्रश्न भी यह भूल चुका होगा कि मेरा जन्म क्यों हुआ था।
कोई वर्तमान का प्रश्न करे, तो उसे इतिहास दिखाने लगो। कोई इतिहास पर तुम्हारी ज़ुबान पकड़ ले तो उसे धर्म-जाति के मेले में ग़ुम कर दो। कोई धर्म-जाति पर प्रश्न लेकर खड़ा हो तो उसे आस्था आहत करने के आरोप में राष्ट्रद्रोही और धर्मद्रोही करार दे दो। और यहाँ से भी वह बच जाए तो उसके निजी जीवन, उसके पहनावे, उसके भाषाई उच्चारण दोष, उसके खानपान जैसे विषयों पर बिना बात की बहस छेड़ दो।
नरेंद्र मोदी चलते-चलते संसद की सीढ़ियों पर लड़खड़ा गये और हम इस घटना से उनको नालायक साबित करने लगे। नरेंद्र मोदी बेध्यानी में राष्ट्रगान की धुन पर सावधान न हुए और हम उस क्लिप को लेकर ठट्ठा करने लगे। नरेंद्र मोदी ने बताया कि उनका सीना छप्पन इंच का है और हम इस आधार पर उन्हें महान मानने लगे। चुनाव रैली में राहुल गांधी ने कुर्ते की फटी जेब दिखाई और हम राहुल गांधी को मूर्ख कहने लगे। किसी बयान में योगी आदित्यनाथ के मुँह से लक्ष्मण की जगह भरत निकल गया और हमने हंगामा उठा लिया।
क्यों भाई? हमें राजनेताओं से देश चलवाना है या भागवत सुननी है? किसी की जेब फटी होगी तो उससे उसके राजनैतिक निर्णय पर क्या फर्क पड़ जाएगा? हमें नरेंद्र मोदी से देश चलवाना है या भारोत्तोलन करवाना है? राष्ट्रगान पर सावधान खड़े रहना चाहिए, यह बात तो प्राथमिक विद्यालयों में पढ़ा दी जाती है। लेकिन अगर कभी किसी से कोई चूक हो जाए तो उसे उसकी राष्ट्रभक्ति से जोड़कर क्यों देखा जाए?
कोई राजनेता अपनी पत्नी से अलग रह रहा है तो यह उसका व्यक्तिगत मुआमला है। इस पर प्रश्न उठाने का अधिकार उसकी पत्नी के अतिरिक्त किसी को भी क्यों हो? कोई राजनेता विवाह नहीं कर रहा तो यह भी उसका निजी निर्णय है? इससे उसके राजनैतिक निर्णयों के आकलन कैसे किया जा सकता है?
कभी विचार करके देखें तो हम पाएंगे कि अपने राजनीतिज्ञों को यह बात हमने ही सिखाई है कि असल राजनीति को छोड़कर इधर-उधर के ड्रामे करते रहो तो जनता ज़्यादा वोट देगी। अन्यथा हर काम वोट के लिए करनेवाले लोग ऐसे कार्यों का प्रोपेगैंडा क्यों करते, जिनका ‘राज्य की नीतियों’ से कोई लेना-देना नहीं हो।
कोई वैष्णोदेवी जाए तो जाने दो। कोई केदारनाथ जाए तो यह उसकी निजी आस्था है। कोई अजमेर में चादर चढ़ाए तो उस उसका पर्सनल मुआमला है। कोई मंदिर में झाड़ू लगाए तो यह उसकी मर्ज़ी है। कोई राममंदिर में दीये जलाए तो यह उसका अपना मत है। हम इन सब कार्यों को उनकी राजनैतिक स्थिति का मापदण्ड क्यों बनाते हैं? हम ऐसा क्यों मान बैठे हैं कि धर्मस्थल पर जानेवाला व्यक्ति भ्रष्टाचारी हो हो नहीं सकता; वह भी तब जब हमारे देश के न्यायालयों में धर्मस्थलों पर हुए कदाचार के सैंकड़ो मुआमले लम्बित हैं।
हम निजी जीवन और सार्वजनिक जीवन को अलग-अलग करके क्यों नहीं देख पाते।
सीता का परित्याग करने वाले राम आदर्श राजा हैं। राधा को बिरह देने वाले कृष्ण सर्वश्रेष्ठ राजनीतिज्ञ हैं। यशोधरा और राहुल को सोता छोड़कर जानेवाले तथागत सर्वाेत्कृष्ट ज्ञानी हैं। क्या इन कथाओं से भी हम यह नहीं सीख सकते कि जब कोई व्यक्ति सार्वजनिक प्रश्नों के सटीक उत्तर दे रहा हो तो उस समय उसे निजता के कठघरे में घसीटकर प्रश्नावली नहीं बदलनी चाहिए।
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Naavik ke teer, Prose, Quotation
जीवन के तमाम प्रश्नचिन्हों के मध्य भी अपने भीतर के कबीर और तुलसी को बचाए रखनेवाले रचनाकार, वर्तमान के ऐसे विस्मयादिबोधक हैं, जिन्हें युग का सम्बोधनकारक बनने के लिए केवल युग के प्रारम्भ की घोषणा करनी है।
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Do Misron Ke Beech, Muktak, Poetry
जिनका कोई अर्थ नहीं है, उन पर क़लम चलाना छोड़ें
जो चर्चा को दूषित कर दें, उन सबको समझाना छोड़ें
हमें ओस के कण चुन-चुनकर, अपने सपने सच करने हैं
अपनी ओस बचाना सीखें, उनके पेड़ हिलाना छोड़ें
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Diary, Ek Adad Kirdar, Prose
अभी घर से निकला। एक बुज़ुर्ग महिला सड़क किनारे एक ट्री-गार्ड को पकड़कर खड़ी थी। उन्हें शायद किसी सोसाइटी में जाना था लेकिन बिना सहारे के चलने की हिम्मत नहीं जुटा पा रही थीं और ट्री-गार्ड को पकड़े हुए आते-जाते लोगों की ओर कातर दृष्टि से निहार रही थीं।
सोसाइटी के बाहर इस समय बहुत तो नहीं, लेकिन थोड़ी चहल-पहल भी थी। पर अपनी-अपनी व्यस्तता लादे वहाँ से गुज़रनेवाला कोई शख़्स रुककर उस वृद्धा की सहायता न कर सका।
मैं फोन पर ऊबरवाले से कॉर्डिनेट कर रहा था। एक बार मैं भी अपनी कैब पकड़ने के चक्कर में उस कातर दृष्टि को अनदेखा करने की हिम्मत जुटा गया, लेकिन दो-तीन क़दम ही बढ़कर मुझे पलटना पड़ा।
मैंने उनकी ओर हाथ बढाते हुए धीरे से पूछा- ‘आंटी, कहीं छोड़ दूँ?’
उन्होंने मेरा वाक्य पूरा होने से पहले ही मेरी हथेली थाम ली और ट्री-गार्ड छोड़कर मेरी ओर बढ़ आईं। सामनेवाली सोसाइटी के गेट पर गार्ड ने उनका हाथ मेरे हाथ से अपने हाथ में लिया और मुझे कहा कि मैं अम्मा को घर छोड़ दूंगा, आप जाइये।
मैंने वृद्धा की ओर देखा तो उनके चेहरे की घबराहट एक आश्वस्ति में तब्दील हो चुकी थी। मैं आकर अपनी कैब में बैठ गया और सोचने लगा कि क्या कभी वह दुनिया वापस आएगी जब बुजुर्गों को सहायता के लिए कातर दृष्टि की नहीं, आवाज़ के रुआब का प्रयोग करना होगा।
मैंने यह घटना इसलिए नहीं लिखी कि मुझे स्वयं को महान सिद्ध करना है, बल्कि मैं अपने उन दो क़दमों के लिए स्वयं से मुख़ातिब हूँ, जो मैं अपनी व्यस्तता का बहाना करके बढ़ा चुका था।
हम सब अपनी व्यस्तताएँ ओढ़े हुए मनुष्यता की कातर दृष्टि से दो क़दम आगे बढ़ चुके हैं। यदि यहाँ से हम नहीं पलटे तो मनुष्यता किसी सड़क किनारे यूँ ही खड़ी रह जाएगी!
✍️ चिराग़ जैन