Article, Bakodhyanam, Chirag Jain Writings, Prose
हमें बचपन से यह पढ़ाया गया है कि फलाने राजा ने ख़ुश होकर फलाने व्यक्ति को स्वर्ण मुद्राएँ दीं। बस यहीं से हमारे मस्तिष्क को कैप्चर करने का खेल शुरू हो गया। हम कलाकार हैं, तो अपनी कला से राजा को ख़ुश करने में लगे रहे। हम विद्वान हुए, तो अपनी विद्वत्ता से राजा को ख़ुश करते रहे। हम चतुर हुए, तो अपना समस्त चातुर्य राजा को ख़ुश करने में झोंक दिया। बुद्धिमान हुए, तो बुद्धिमत्ता राजा को ख़ुश करने में जुट गयी।
मतलब यह कि कला, विद्वत्ता, चातुर्य और बुद्धिमत्ता; राजा से स्वर्ण मुद्राएँ पाने की होड़ में व्यस्त हो गयीं और राजा इन सबको काम पर लगाकर शासन में अपनी मनमानी करके ख़ुश रहा।
इन्हीं कहानियों ने हमें यह भी बताया कि नगर की समस्त सुंदर कन्याओं का अंतिम उद्देश्य यही है कि राजकुमार उनके सौंदर्य पर मोहित हो जावे। इसलिए आज भी सत्ताधीशों के राजकुँवर सुन्दर कन्याओं पर आकृष्ट होकर उनका जीवन धन्य करते पकड़े जाते हैं।
हमें बचपन से यह पढ़ाया गया है कि फलाने राजा ने ख़ुश होकर फलाने व्यक्ति को स्वर्णमुद्राएँ दीं। बस यहीं से हमारे मस्तिष्क को कैप्चर करने का खेल शुरू हो गया। हम कलाकार हैं, तो अपनी कला से राजा को ख़ुश करने में लगे रहे। हम विद्वान हुए, तो अपनी विद्वत्ता से राजा को ख़ुश करते रहे। हम चतुर हुए, तो अपना समस्त चातुर्य राजा को ख़ुश करने में झोंक दिया। बुद्धिमान हुए, तो बुद्धिमत्ता राजा को ख़ुश करने में जुट गयी।
मतलब यह कि कला, विद्वत्ता, चातुर्य और बुद्धिमत्ता; राजा से स्वर्णमुद्राएँ पाने की होड़ में व्यस्त हो गयीं और राजा इन सबको काम पर लगाकर शासन में अपनी मनमानी करके ख़ुश रहा।
इन्हीं कहानियों ने हमें यह भी बताया कि नगर की समस्त सुंदर कन्याओं का अंतिम उद्देश्य यही है कि राजकुमार उनके सौंदर्य पर मोहित हो जाये। इसलिए आज भी सत्ताधीशों के राजकुँवर सुन्दर कन्याओं पर आकृष्ट होकर, उनका जीवन धन्य करते पकड़े जाते हैं।
इन कहानियों के अनुसार राजा के दो ही काम थे- प्रथम, अपने मंत्रियों से ऊल-जलूल सवाल पूछना और द्वितीय, आखेट करना। इन दोनों से जो समय बचता था, वह रूठी रानी को मनाने में व्यतीत हो जाता था।
मंत्रियों के भी दो ही काम थे। या तो वे सबसे होनहार मंत्री से ईर्ष्या करने में व्यस्त रहते थे या फिर राजा के बेसिरपैर के टास्क पूरे करने में लगे रहते थे। इन दोनों से चिढ़कर ही वे अक्सर राजा को शिकार के समय जंगल में अकेला छोड़कर जानबूझकर भटक जाते थे। लेकिन शिकार में भटकने के बावजूद बिना जीपीएस के ही राजा भटकता हुआ अपने महल पहुँच जाता था।
राजकुमारियाँ सखियों के साथ जलक्रीड़ा और वनभोज (पिकनिक) में व्यस्त रहती थीं। जहाँ कोई भूत-प्रेत या राजकुमार उनके रूप-लावण्य पर मोहित होने पहुँच ही जाता था। (इस सीन में कभी कोई जंगली जानवर नहीं आ सका, क्योंकि जंगली जानवर प्रोटोकॉल के बाहर कभी नहीं जाते।) सो, राजकुमार की एंट्री होते ही राजकुमारी उसके सफेद घोड़े पर सवार होकर दूरदेश चली जाती थी। अक्सर कहानी यहाँ ख़त्म हो जाती थी। राजकुमारी को दूरदेश ले जाकर राजकुमार ने उससे क्या व्यवहार किया; यह हमें किसी कहानी ने नहीं बताया।
जनता इन कहानियों में कभी-कभार ही प्रकट होती थी। उसका उपयोग यही था कि वह कोई ‘समस्या’ लेकर लड़ते-झगड़ते राजदरबार में पहुँचे और राजा के शेष मंत्रियों की ईर्ष्या को धता बताकर सबसे चतुर मंत्री उनके झगड़े का कोई भी ऊल-जलूल समाधान देकर राजा को ख़ुश कर दे।
राजा के ख़ुश होते ही कहानी ख़त्म हो जाती है। फिर जनता की समस्या का समाधान जनता को भाये या न भाये- इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता। जनता का कहानी में कोई रोल है भी तो उससे यही पता चलता है कि जनता या तो कोई ठग है, जो अपनी चतुराई से राजदरबार का हिस्सा बन जाता है। या फिर कोई निर्धन ब्राह्मण है जिसकी गुणवती कन्या पर मोहित होकर राजा उसका दारिद्र्य दूर कर देता है। या फिर कोई व्यापारी है, जिसकी मिलावटखोरी को राजा के सिपाही पकड़ ही लेते हैं। राजा की सवारी निकलने पर सड़क के दोनों ओर सिर झुकाकर खड़ी भीड़ जनता है। या फिर राजा के कारनामों पर महल के बाहर इकट्ठी होकर राजा का जयजयकार करनेवाला समूह, जनता है।
इन सब संस्कारों को हम इक्कीसवीं सदी तक घसीट लाए हैं। संविधान ने हमें सिंहासन पर बैठा दिया था, लेकिन हमने अपनी आदत के अनुसार अपने लिए एक राजा चुना और उसके महल के बाहर खड़े होकर उसकी जय-जयकार करने लगे।
✍️ चिराग़ जैन
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एक एंकर स्टूडियो में नशा करके ख़बर पढ़ रहा था तो पूरे देश ने उसका मज़ाक़ बनाकर रख दिया। यह सरासर बदतमीज़ी है। ऐसे किसी का मज़ाक़ बनानेवाले समझ लें कि मज़ाक़ बनाने का अधिकार केवल मीडिया के पास है। वह लोकतंत्र, न्यायपालिका, जनभावना, चुनाव प्रक्रिया, राजनीति और यहाँ तक कि किसी की मुर्दनी तक का मज़ाक़ बनाने के लिए स्वतंत्र है।
रिया चक्रवर्ती की निजता, सुशांत राजपूत की आत्महत्या, आर्यन खान की गिरफ्तारी, शशि थरूर की निजी ज़िन्दगी, अभिषेक बच्चन की शादी, सुनील दत्त की शवयात्रा… सबको बेचकर खाने का अधिकार है मीडिया के पास।
कोसी नदी में कब बाढ़ आएगी और क्या तबाही मचाएगी इसको लेकर तीन-चार दिन तक शोर मचता है और फिर अगली ख़बर चलते ही कोसी का गला सूख जाता है। अब टकराएगा तूफान, ऐसे आएगा तूफान, यमुना की बाढ़ में डूब रही है दिल्ली, देश में केवल दो दिन का कोयला बचा है शेष, इतने बजे टकराएगा धूमकेतु, इस तारीख़ को तबाह हो जाएगी धरती… यह सब मज़ाक़ देश के मनोरंजन के लिए थोड़े ही किये जाते हैं। ये तो कवरिंग फायर की तरह चलने वाली ख़बरें हैं जिनकी आड़ में ‘जाने क्या क्या’ जनता की आँख में धूल झोंककर पार कर दिया जाता है।
यह मज़ाक़ देशहित में किया जाता है ताकि देश अनावश्यक तनाव से बचा रहे। इतने राष्ट्रभक्त पत्रकारों का मज़ाक़ उड़ाने का अधिकार किसी को नहीं दिया जा सकता।
नशा किया तो क्या अपराध हो गया। पहली बात तो यह कि अगले ने दिल्ली या यूपी में शराब पी थी। अगर बिहार या गुजरात में पी होती तब बोलते। तब कह सकते थे कि अपराध हुआ है। आपको भाई का डेडिकेशन ही समझ नहीं आता। इत्ती शराब पीने के बाद भी देश की ऐसी-तैसी करने के इस मौक़े पर भाई लड़खड़ाता हुआ स्टूडियो पहुँचा होगा। फिर सारे स्टाफ के सामने न्यूज़रूम में अपनी छाती ठोककर चिल्लाया होगा- ‘आज बुलेटिन तेरा भाई पढ़ेगा!’
ये होती है अपने काम के प्रति निष्ठा। सारे कांग्रेसी चमचे बेचारे राष्ट्रवादी पत्रकार के पीछे पड़ गए हैं। आर्यन की तरह ड्रग्स तो नहीं ली ना दीपक जी ने। आपने यह तो देख लिया कि वे लड़खड़ाती हुई ज़ुबान से विपिन रावत और वीके सिंह में अंतर नहीं कर पाए… अरे यही तो है सच्चा राष्ट्रवाद। देश का सैनिक हो, केंद्रीय मंत्री हो या फिर सीडीएस ही क्यों न हो… माननीय दीपक जी सबको एक नज़र से देखते हैं। और जो उनके माथा पकड़ने का झूठा प्रचार किया जा रहा है वह दरअस्ल सिर झुकाकर शहीदों को नमन किया जा रहा था। आप कांग्रेसी क्या समझेंगे इस भावना को कि सेल्यूट मारने के लिए दीपक जी ने एक नहीं दोनों हाथ अपने माथे तक उठा लिए और इस प्रक्रिया में उन्हें जैसे ही संस्कृति की याद आई उन्होंने दोनों हाथों से सेल्यूट मारते हुए सिर नीचे झुका लिया था। इसे कहते हैं सैनिकों का सम्मान। तुम क्या जानो इस भावना को।
तुम क्या चाहते हो कि इनकी जगह राहुल गांधी से न्यूज़ पढ़वाई जाए। उसे एक वाक्य तो ठीक से बोलना नहीं आता। उसको न्यूज़ स्टूडियो में बैठा दिया तो वो वहाँ भी कुर्ते की जेब फाड़ लेगा। अरे एहसान फरामोशों। अब से पहले ‘ड्रंक न्यूज़ एंकर’ सर्च करने पर गूगल में एक भी भारतीय चेहरा नहीं दिखता था, अब टॉप पर गूगल सर्च में दीपक जी छाए हुए हैं। राष्ट्र का नाम कितना ऊँचा हुआ है। पता-वता कुछ है नहीं; …चले आए हैं माननीय दीपक जी का मज़ाक़ बनानेवाले।
✍️ चिराग़ जैन
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‘आज तक में पेश हैं अभी तक की ख़बरें’ से शुरू हुआ ‘न्यूज़ एंकरिंग’ का सफ़र लड़खड़ाती हुई ज़ुबान में माथा पकड़कर ख़बर पढ़ते न्यूज़ एंकर तक पहुँच गया है।
टीवी पर समाचार पढ़नेवाले समाचार वाचक जब भावना शून्य चेहरे, सपाट स्वर, क्लीन्ड शेव, टाई, कोट जैसे सुनिश्चित गेट-अप में समाचार पढ़ते थे, तब दाढ़ी बढ़ाकर, ख़बर की संवेदना के साथ बदलती भाव भंगिमा और स्वर के उतार-चढ़ाव का कौशल प्रयोग करके सुरेन्द्र प्रताप सिंह ने पत्रकारिता में एक नयी विधा जोड़ दी थी। वे ख़बर को इतनी शिद्दत से महसूस करके पढ़ते थे कि उपहार सिनेमा के अग्निकांड की ख़बर पढ़ते हुए उन्हें हृदयाघात हो गया था। उस रात पत्रकारिता ने संवेदना से हाथ मिलाया था। ये थी ख़बरें आज तक, इंतज़ार कीजिये कल तक…!
…इंतज़ार का वो कल फिर कभी नहीं आया। सुरेन्द्र प्रताप सिंह का यह सूर्यास्त न्यूज़ एंकरिंग की पूरी दुनिया को अंधकार में खड़ा छोड़ गया।
यहाँ से शुरू हुआ वह दौर, जिसने आज न्यूज़ एंकर्स को वीभत्स, अश्लील, असभ्य तथा अमर्यादित बनाकर छोड़ दिया है।
एस पी सिंह की आवाज़ ख़ामोश हुई तो उनके जैसी दाढ़ी बढ़ाकर उन जैसा दिखने का प्रयास करनेवालों ने उनकी तरह बोलने का अभिनय शुरू किया लेकिन मूल संवेदना के अभाव में यह अभिनय बहुत जल्दी ही भौंडा और उबाऊ लगने लगा।
स्वर का जो उतार-चढ़ाव एस पी सिंह के पास था, वह ख़बर की आत्मा से प्राप्त संवेदना से स्वतः उभरता था। लेकिन अंधेरे में खड़े दाढ़ीवान पत्रकारों ने इसे चीख-चिल्लाहट में बदल डाला।
बुलेटिन ‘एक्शन फिल्म’ की तरह रोमांचक बनते गए। टीवी डिबेट में ‘विषय’ के अतिरिक्त सब कुछ दिखने लगा। राजनैतिक दलों ने इन अंधेरे के वासियों को अपनी उंगली थमाई तो ये बेचारे उस उंगली पर झूल गए। अब ये अपने-अपने भाग्य में आई उंगली पर झूलते हुए ख़बर पढ़ने लगे। इस अवस्था में जब ये दल के पक्ष में पींग लेते हैं तो बेहद लिजलिजे दिखने लगते हैं, और जब झूला इनके राजनैतिक आका के विपक्ष में जाता है तो ये असभ्य हो जाते हैं।
पिछले दिनों हमने एक ऐसा भी पत्रकार देखा जिसे उसके राजनैतिक आका ने अपने पक्ष में झूले समेत ज़मीन से आठ-दस फीट ऊपर हवा में टाँक दिया था। और वह वहीं से स्वामिभक्ति का प्रदर्शन करता हुआ दो-ढाई फीट और उछलता हुआ ख़बरें पढ़ता रहा।
हमने ऐसी भी एंकर्स देखी हैं जो तीन सौ ग्राम लिपिस्टिक और एक धड़ी मेकअप पोतकर अपनी आयु से लगभग दोगुनी आयु के राजनेताओं से पूछती हैं कि ‘तुम होते कौन हो इस देश की राजनीति पर बात करनेवाले?’
अपने बुलेटिन को नम्बर वन बनाने की जुगत में किसी की चरित्र हत्या, किसी के सामाजिक अपमान में इन अंधकार-उलूकों को कोई हिचक नहीं होती। अफ़वाह को ‘ख़बर’ कहकर परोसने में इन्हें कोई संकोच नहीं होता। साम्प्रदायिक विद्वेष को हवा देना इनके बाएँ हाथ का खेल है। किसी की निजता में प्रवेश करने में इन्हें लज्जा नहीं आती। और अब तो देश के सर्वाेच्च सैनिक की श्रद्धांजलि की ख़बर पढ़ने की ललक में मद्यपान कर के स्टूडियो पहुँचने के कीर्तिमान भी स्थापित हो गये हैं। टीआरपी का घपला करते हुए ये पहले ही पकड़े जा चुके हैं। कार्यस्थल पर यौन-आचरण के इनके चैट और वीडियो वायरल होते ही रहते हैं। महानायक के घर के निजी उत्सव की कवरेज के समय इन्हें ‘बाक़ायदा’ वाचडॉग से डॉगवाच होते देखा जा चुका है। न जाने किसके इशारे पर ये पूरी प्रजाति एक साथ किसी ख़बर को टिपर से ही ग़ायब करने को तैयार हो जाती है। स्वार्थ और अवसरवाद की सीमा यहाँ तक है कि इनके साथ के ही किसी पत्रकार के साथ अन्याय हो तो भी ये चुपचाप अपने स्वामी की ओर मुँह उठाए पुंछ-ध्वज फहराते रहते हैं।
पत्रकारिता को पत्रकारिता बनाए रखने का दायित्व केवल पत्रकारों के कंधों पर नहीं है, बल्कि जिन दर्शकों की कृपा से इन भौंडे न्यूज़ बुलेटिन्स को नम्बर वन का खि़ताब मिल जाता है, वे भी इस अपराध में बराबर के भागीदार हैं। लेकिन फिर भी यह प्रश्न तो उठता ही है कि जनता की अभिरुचियों के अनुसार बुलेटिन ‘डिज़ाइन’ करते समय क्या कभी पत्रकारिता की आत्मा नहीं जागती।
…तो साहब, यह प्रश्न बेमआनी है। क्योंकि अगर पत्रकारिता के पास आत्मा होती तो राजनैतिक बेताल, विक्रम के सिर पर चढ़कर कहानी न सुना रहे होते।
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मध्यम वर्ग इस देश का सर्वाधिक दीन-हीन प्राणी है। उसका जन्म इसीलिए हुआ है कि वह शासन-प्रशासन से लेकर निजी कंपनियों तक के अर्थ-आखेट के काम आ सके।
जंगल में हिरन शिकार के ही काम आते हैं। शेर से बच गये तो लकड़बग्घों, तेंदुओं और सियारों तक की निगाह हिरनों पर रहती है। इन सबसे बच जाएँ तो किसी मनुष्य को अपने बंगले की दीवार पर हिरन का सिर लटकाने का शौक चर्रा जाता है।
हिरन अपने शिकार की कहीं शिकायत नहीं कर सकते। क्योंकि शिकायतनफ़ीस को भी हिरनों का शिकार करना अच्छा लगता है।
वर्तमान में दिल्ली के मध्यम वर्ग का आखेट करने का शौक लगा है निजी कैब कम्पनियों को। उच्च वर्ग को इन कम्पनियों की सेवा की ज़रूरत नहीं पड़ती और निम्न वर्ग इन सेवाओं को प्रयोग करने की ज़रूरत नहीं समझता। बच गया मध्यम वर्ग, वह इन कम्पनियों का टारगेट क्लाइंट है। प्रारम्भ में चूँकि इन कम्पनियों का युद्ध ऑटोचालकों और अन्य ट्रांसपोर्ट सेवाओं से था इसलिए इनकी विनम्रता तथा दरें आश्चर्यजनक रूप से आकर्षक थी। मध्यम वर्ग, जो मीटर से न चलने वाले ऑटोरिक्शा चालकों से प्रताड़ित था, वह इन सेवाओं का उपभोक्ता बन गया। लेकिन सियारों से बचाने जो लकड़बग्घे आए थे, उन्होंने सियारों को भगाकर ख़ुद ही हिरनों का शिकार करना शुरू कर दिया।
मध्यम वर्ग के शिकार के लिए कैब सर्विस के हथकण्डे:
1) सर्ज के नाम पर आधिकारिक रूप से तीन-चार गुना तक किराया वसूला जाता है। सरकारें इन कम्पनियों से यह पूछने की ज़ुर्रत नहीं कर पातीं कि समान दूरी के लिए वही गाड़ी इतनी महंगी क्यों पड़ रही है, जबकि जाम में फँसने की स्थिति में प्रति मिनिट किरायेवाला मीटर चालू रहता है।
2) इतना किराया देने के बावजूद कैब बुक होने पर ड्राइवर आपका इंटरव्यू लेता है। कहाँ जाएंगे, पेटीएम की पेमेंट है तो नहीं जाऊंगा, गुड़गांव नहीं जाऊंगा, नोएडा नहीं जाऊंगा, शाहदरा नहीं जाऊंगा…; एक्स्ट्रा पैसे देने होंगे… इत्यादि। इस साक्षात्कार में अनुत्तीर्ण होने के बाद आप ड्राइवर से कहते हैं कि वह राइड कैंसिल कर दे। यह अनुरोध करने के बाद आप मोबाइल देखते रहते हैं लेकिन वह राइड कैंसिल नहीं करता। आप उसे दोबारा फोन करते हैं तो वह फोन भी नहीं उठाता। थक-हारकर आप मजबूरी में अपनी ओर से राइड कैंसिल करते हैं और कम्पनी आपके नाम चालीस रुपये का बिल फाड़ देती है।
3) चूँकि मध्यम वर्ग के पास ऐसे सीन में कम्प्लेंट करने का पर्याप्त समय होता है, इसलिए कम्पनियों ने अपनी एप्लिकेशन में कोई फोन नम्बर ही उपलब्ध नहीं कराया है। आप अधिक से अधिक लिखित में शिकायत दर्ज करा सकते हैं, जिसमें शिकायत के विकल्प कम्पनी ने स्वयं निर्धारित कर रखे हैं।
4) आजकल इन ड्राइवर्स का नाम हाथापाई और ईव-टीज़िंग तक के मुआमलात में थानों के स्वर्णिम रजिस्टरों में दर्ज होने लगा है, लेकिन थानों की कछुआ शैली का लाभ उठाकर खरगोशों का अपराध का ग्राफ बढ़ता जा रहा है।
हिरन सरकार से अनुरोध करते हैं कि वह इन लकड़बग्घों के गले में कानून की ज़ंजीर डाले। अनुरोध पढ़कर सरकार ज़ंजीर बनवाने का टेंडर पास करती है। ज़ंजीर की खनक सुनकर हिरन उत्साहित होने लगते हैं। सरकार सोशल डिस्टेंसिंग के पालन हेतु बसों और मेट्रो में सख्ती लागू कर देती है। डीजल की गाड़ियों पर बैन लगा देती है। पॉल्यूशन का चालान दस हज़ार का कर देती है। और लकड़बग्घों के लिए तैयार की गयी ज़ंजीर में हिरनों को बांधकर लकड़बग्घों के आगे पटक देती है।
हिरन सरकार की ओर कातर दृष्टि से देखते हैं और लकड़बग्घों की सहृदयता के लिए उन्हें नमन करते हैं कि अब से पहले कम से कम हमें बसों, मेट्रो और निजी वाहनों की स्वतंत्रता तो प्राप्त थी।
दिल्ली के सारे हिरन देखते रहते हैं कि सरकार हाथियों के लिए गन्ने की व्यवस्था कर रही है। हिरनों के नाम से जुटाई गयी घास खरगोशों में बाँटी जा रही है। लकड़बग्घों को हिरन परोस दिए गए हैं। और पूरी दिल्ली को व्यवस्थित करने के बाद अब सरकार पंजाब के हिरनों से वादा कर रही है कि चुनाव जीतने के बाद उन्हें मुलायम सरकारी घास खिलाई जाएगी।
मैं ज़ंजीर में बंधा हुआ 2.3 गुना सर्ज की निजी कैब में बैठा हूँ और बस स्टैंड पर लगा होर्डिंग पढ़ रहा हूँ जिसमें अन्योक्ति अलंकार में यह लिखा है कि- ‘दिल्ली सँवारी, अब पंजाब की बारी।’
✍️ चिराग़ जैन
Article, Chirag Jain Writings, Ek Adad Kirdar, Prose
भारतीय शौर्य का शीर्ष लहूलुहान है। एक उड़न-खटोले के ध्वंस ने माँ भारती की गोद को छलनी कर दिया। मृत्यु का यह क्रूर ताण्डव एक क्षण में दर्जन भर शेरों को मिट्टी बना गया।
यह दुर्घटना देश को ठगे जाने के एहसास से भर गयी है। ऐसा लग रहा है कि जिन वृक्षों को सींचकर जेठ की धूप के लिए घना किया जा रहा था, उन्हें यकायक पूस का पाला मार गया। जिन्होंने अपने जीवन का दाँव लगाकर देश को सुरक्षित रखने की शपथ उठाई थी, वे अनमोल जीवन बिना कारण ही ख़र्च हो गये। जिनके कन्धों पर देश की सुरक्षा की पालकी रखकर हम निश्चिंत थे, वे अचानक कन्धों पर सवार हो गए।
देव पर चढ़ने जा रहे मोतियों को मार्ग में ही कोई कौआ चुग गया। यह घटना पुलवामा की याद ताज़ा कर गयी है। जो देश की सुरक्षा के उत्तरदायी हैं, उनकी सुरक्षा का दायित्व किस पर है -यह प्रश्न फिर से मुँह उठाकर खड़ा हो गया है।
रावत साहब! आपका यह सेल्यूट स्वीकार नहीं हो पा रहा है। आप वीरों को लेकर स्वर्ग चले गए हैं और हम जीवित विजेता की तरह ठगे खड़े हैं। समस्याओं की शरशैया पर पड़े भीष्म की बिंधी हुई देह में दर्जन भर तीर और उतर गये हैं। वीरप्रसूता भारती की कोख कभी बांझ तो नहीं होती लेकिन जब भी उसका कोई लाल ‘ऐसे’ काल के गाल में समाता है तो उसका कलेजा ज़रूर फटता है।
यद्यपि यह शोक का समय है, तथापि घर के बुजुर्गों की एक सीख याद आ रही है कि यात्रा के समय धन को अलग-अलग जेबों में बाँटकर रखना चाहिए, ताकि कोई गिरहकट यदि जेब काट ले तो भी किसी न किसी जेब में घर लौटने का किराया बचा रह जाए।
ट्विटर और फेसबुक पर इस महाशोक के लिए सम्वेदनाओं की धारा बह रही है। इस बार कोई उत्तरदायी नहीं है तो सम्वेदना व्यक्त करनेवालों के आचरण में राष्ट्रभक्ति और राष्ट्रद्रोह के चिह्न तलाशे जा रहे हैं। मुझे लगता है कि राष्ट्रप्रेम के नारों के बीच, मौन ओढ़कर सो चुके इन मंत्रों को कुछ देर के लिए यह आश्वस्ति तो दी ही जानी चाहिए कि अपने-अपने वाद में जकड़े उनके देशवासी किसी अवसर को तो अपनी आवाज़ ऊँची करने का अवसर मानने से परहेज कर लेते हैं।
हर किसी की मृत्यु को राजनैतिक कहासुनी का अवसर माननेवालों को कुछ समय के लिए ही सही लेकिन मौन होकर माँ भारती के आँसुओं की आवाज़ सुनने का धैर्य जुटाना सीखना होगा।
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Do Misron Ke Beech, Muktak, Poetry
मुश्किलो, और बढ़ो, और बिछाओ काँटे
राह में, पाँव में, दामन में सजाओ काँटे
दर्द कम होगा तो आराम की याद आएगी
दूर मन्ज़िल है अभी, ढूंढ के लाओ काँटे
✍️ चिराग़ जैन