+91 8090904560 chiragblog@gmail.com

अभी घर से निकला। एक बुज़ुर्ग महिला सड़क किनारे एक ट्री-गार्ड को पकड़कर खड़ी थी। उन्हें शायद किसी सोसाइटी में जाना था लेकिन बिना सहारे के चलने की हिम्मत नहीं जुटा पा रही थीं और ट्री-गार्ड को पकड़े हुए आते-जाते लोगों की ओर कातर दृष्टि से निहार रही थीं।
सोसाइटी के बाहर इस समय बहुत तो नहीं, लेकिन थोड़ी चहल-पहल भी थी। पर अपनी-अपनी व्यस्तता लादे वहाँ से गुज़रनेवाला कोई शख़्स रुककर उस वृद्धा की सहायता न कर सका।
मैं फोन पर ऊबरवाले से कॉर्डिनेट कर रहा था। एक बार मैं भी अपनी कैब पकड़ने के चक्कर में उस कातर दृष्टि को अनदेखा करने की हिम्मत जुटा गया, लेकिन दो-तीन क़दम ही बढ़कर मुझे पलटना पड़ा।
मैंने उनकी ओर हाथ बढाते हुए धीरे से पूछा- ‘आंटी, कहीं छोड़ दूँ?’
उन्होंने मेरा वाक्य पूरा होने से पहले ही मेरी हथेली थाम ली और ट्री-गार्ड छोड़कर मेरी ओर बढ़ आईं। सामनेवाली सोसाइटी के गेट पर गार्ड ने उनका हाथ मेरे हाथ से अपने हाथ में लिया और मुझे कहा कि मैं अम्मा को घर छोड़ दूंगा, आप जाइये।
मैंने वृद्धा की ओर देखा तो उनके चेहरे की घबराहट एक आश्वस्ति में तब्दील हो चुकी थी। मैं आकर अपनी कैब में बैठ गया और सोचने लगा कि क्या कभी वह दुनिया वापस आएगी जब बुजुर्गों को सहायता के लिए कातर दृष्टि की नहीं, आवाज़ के रुआब का प्रयोग करना होगा।
मैंने यह घटना इसलिए नहीं लिखी कि मुझे स्वयं को महान सिद्ध करना है, बल्कि मैं अपने उन दो क़दमों के लिए स्वयं से मुख़ातिब हूँ, जो मैं अपनी व्यस्तता का बहाना करके बढ़ा चुका था।
हम सब अपनी व्यस्तताएँ ओढ़े हुए मनुष्यता की कातर दृष्टि से दो क़दम आगे बढ़ चुके हैं। यदि यहाँ से हम नहीं पलटे तो मनुष्यता किसी सड़क किनारे यूँ ही खड़ी रह जाएगी!
✍️ चिराग़ जैन

error: Content is protected !!