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विचारधारा

विचारधारा वह बोझा है, जो योग्य पात्रों पर लादकर कुम्हार हाथ हिलाते हुए ‘इधर-उधर’ विचरते रहते हैं। ✍️ चिराग़...

कोरोना में अवसर

कोरोना की दूसरी लहर बीत चुकी है, लेकिन राजनीति में ख़ुशी की लहर नहीं आई। वे अब भी आपस में लड़ रहे हैं। जब देश में कोरोना का ताण्डव चल रहा था तो पॉलिटिकल पार्टियों में इस बात पर लड़ाई थी कि ये जनता तुम्हारी है, इसे तुम बचाओ। अब जब ताण्डव शान्त हुआ है तो हर पार्टी यह...

वो सुबह कभी न आए!

उस दिन सुबह जब आँख खुली तो पैरों के नीचे से ज़मीन खिसक गयी। मोबाइल पर आदित्य जी की मृत्यु का समाचार था। तब सोशल मीडिया इतना एक्टिव नहीं था। सो, परस्पर फोन से ही सूचनाएँ मिल पाती थीं। कुछ कवियों को फोन मिला तो पता चला कि दुनिया लुट चुकी है। रात को जो कवि-कुनबा उत्सवों...

मशहूर कविता, गुमनाम कवि

रचना और रचनाकार का सम्बन्ध पिता और सन्तति का सम्बन्ध होता है। यह किसी रचनाकार की सफलता का उत्कर्ष है कि उसकी कोई पंक्ति जनभाषा के मुहावरे में शुमार हो जाये। ‘अक्कड़-बक्कड़ बम्बे बो’ से लेकर ‘पोशम्पा भई पोशम्पा’ तक का हमारा बचपन ऐसी ही सौभाग्यशाली कविताओं की उंगली थामकर...

तहख़ाना

विचारों के भाजी बाज़ार से दूर, मस्तिष्क के पिछवाड़े वाले तहख़ाने में भरे पड़े हैं ऐसे हज़ारों बिम्ब जिन्हें आँखों ने चित्त के शिकंजे से बचाकर यहाँ छिपा दिया था। जब कभी सहजता की सवारी करके प्रिविष्ट हुआ हूँ इस तहख़ाने में बस तभी बटोर लाया हूँ …ढेर सारे बिम्ब …ढेर...

गंगा और शव

कौन कहता है कि गंगा में लाशें बह रही हैं अब तो लाशों में गंगा बह रही है। कौन कहता है कि प्रशासन साम्प्रदायिक भेदभाव करता है प्रशासन तो सब लाशों से एक जैसा बर्ताव करता है। कौन कहता है नदी किनारे मानव सभ्यता पनपती है अब तो नदी तट पर मानवता की रूह दहलती है। साहेब! एक बात...
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