Chirag Jain Writings, Geet, Poetry, Unpublished Geet
जिन ध्वनियों में सबसे पहले मैंने अपनों को पहचाना
गड्ड-मड्ड होकर जो सबसे पहले कानों से टकराईं
जिनमें लाड लड़ाकर माँ ने मुझे कलेजे से चिपकाया
जिनमें बुआ बलैया लेकर अस्पताल में भी इतराई
जिन ध्वनियों की हर स्वर-लहरी में अवलम्बन आशा का है
उन ध्वनियों का इक-इक अक्षर केवल हिन्दी भाषा का है
जिस भाषा के स्वर, बचपन में मेरे बहुत घनिष्ठ हो गए
जिस भाषा के व्यंजन, तुतली बोली में स्वादिष्ट हो गए
जब उसको लिखना सीखा तो अ अनार की पूँछ बना दी
ढ का पेट बड़ा कर डाला, क और ल की मूँछ बना दी
इतने पर भी कभी न जिसमें बादल घिरा निराशा का है
इतना बड़ा कलेजा शायद केवल हिन्दी भाषा का है
जब भावों में प्रीत सजी थी, अलकों में इक आस भरी थी
तब धड़कन ने काग़ज़ पर आ देवनागरी देह धरी थी
पीर, हर्ष, उल्लास, हताशा, भय, संदेह, समर्पण, आशा
हर उलझन के लिए शब्द है, कितनी धनी हमारी भाषा
जैसा रिश्ता दीपक-बाती, बादल और पिपासा का है
वैसा रिश्ता अभिव्यक्ति से मेरी हिन्दी भाषा का है
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Naavik ke teer, Prose, Quotation
सत्ता से चूक गए राजनेता की ईमानदारी उस चरित्रवती जवान विधवा की तरह है जिससे लताड़ खाने के बाद हर लौंडा कहता फिरता है- “खेत में हाथ पकड़ कर मो ते लिपट रही हती छिनाल, मैं धक्का दई के भाज आयो।”
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Free Verse, Mann To Gomukh Hai, Poetry
आदमी की तरह
जन्मते ही बँट जाते हैं
भाव भी
अलग-अलग जातियों में
अलग-अलग धर्मों में।
प्रसव की पीड़ा
भावों की दुनिया में भी
एक जैसी है।
और वहां भी
आ चुकी है
कवि का पेट चीरकर
सर्जिकल डिलीवरी की प्रक्रिया।
बढ़िया ही है
इस तकनीक में दर्द नहीं सहना पड़ता!
देवनागरी की देह में क़ैद भावों को
कई बार देखा है
फ़ारस और रोमन के डीएनए से मैच होते।
भावों में भी देखे गए हैं
अनैतिक सम्बन्ध
आदमी की तरह।
भाव भी मरते हैं
आदमी की तरह।
भावों ने बहुत कुछ सीखा है
आदमी से।
लेकिन आदमी
कभी नहीं सीख पाया
एक भाषा में रहते हुए
कई भाषाओं में
अनुवाद हो जाने की कला।
हम फैलाना चाहते हैं
बाइबल को
गीता को
कुरआन को
जातक को
आगम को।
लेकिन समेट लेना चाहते हैं
अपने ईसा
अपने कृष्ण
अपने पैगम्बर
अपने बुद्ध
अपने महावीर।
हमने शास्त्र बना दिया है
किताबों को
विस्तृत करके।
और इंसान बना दिया है
भगवान को
संकुचित कर के।
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Diary, Ek Adad Kirdar, Prose
मैंने आरएस पुरा बॉर्डर कई बार देखा है। सतवारी एयरपोर्ट से निकलकर धान के खेतों से गुज़रते हुए कई बार पहुंचा हूँ उस गेट तक जहां माइलस्टोन लगा हुआ है “सियालकोट 11 किलोमीटर”। ज़ीरो लाइन भी देखी है। “919 इण्डिया” का मार्क-स्टोन…. तिरंगे में रंगी भारतीय पोस्ट…. हरे रंग में रंगी पाकिस्तानी पोस्ट… “सारे जहां से अच्छा हिंदोस्तां हमारा” और “पाकिस्तान जिंदाबाद” के नारे…. सब देखे हैं। साथ ही देखी है एक लाचारी भरी दहशत, अपने गांववालों में…. एक हताशा भरा अविश्वास, अपने सैनिकों में…!
यूं ही पूछ लिया था एक सैनिक से मैंने -“सिंह साहब, बॉर्डर पर रहकर डर तो रहता होगा?”
उसने ठहर कर बताया था – “ज्जे पकिस्तानियो का कोई भ्रोसा नी ए साब।”
कई दिनों से टीवी पर न्यूज़ देखते हुए उस सैनिक के शब्द कानों में गूँजने लगते हैं।
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Free Verse, Mann To Gomukh Hai, Poetry
एक अजीब से रिश्ते में
उलाहना देते हुए कहा तुमने-
“आज बारिश हो रही है
मैं भीग रही हूँ बरसात में
तुम मत आना
तुम्हें तो
डर लगता है ना भीगने से।”
मैंने कहा-
“नहीं, भीगने से नहीं
भीगने के बाद सूखने से।”
✍️ चिराग़ जैन