+91 8090904560 chiragblog@gmail.com

एलियन का यात्रा वृत्तांत

पृथ्वी पर बड़ी-बड़ी ज़मीनें हैं। जिन पर इंसानों की बड़ी-बड़ी बस्तियाँ हैं। इन बस्तियों को वे गाँव, क़स्बा, शहर, देश और दुनिया कहते हैं, जहाँ दो पैरों से चलनेवाले विचित्र प्राणियों के झुंड रहते हैं। झुंड का प्रत्येक सदस्य एक ऐसे झुंड में रहना चाहता है, जिसमें केवल उसकी बात मानी जाए और केवल उसकी सुविधाओं का ध्यान रखा जाए।
पृथ्वीवासी युगों-युगों से इन झुंडों में एक अदद इंसान तलाश रहे हैं। लेकिन आज तक किसी को कहीं कोई इंसान मिला ही नहीं, क्योंकि जब कोई पृथ्वीवासी ‘इंसान’ तलाशने निकलता है, तब केवल उतनी ही देर के लिए वह ख़ुद भी इंसान बन जाता है, और उस वक़्त के गुज़रते ही वह वापस अपने वर्चस्व वाला झुंड बनाने के लिए किसी झुंड में खो जाता है।
पृथ्वी के दो छोर हैं- उत्तरी ध्रुव और दक्षिणी ध्रुव। इन दोनों ध्रुवों पर प्रकृति ने जीवन जीने योग्य स्थितियाँ नहीं बनाईं, और बाक़ी पृथ्वी को इंसानों ने जीवन जीने लायक नहीं छोड़ा। प्रकृति ने नदियाँ बनाई थीं, लेकिन मनुष्य ने नदियों से जीवन लेते-लेते, नदियों का जीवन ले लिया। पर्यावरण की चिंता और ईश्वर का भय; ये दोनों ही प्रत्येक मनुष्य ने अपने अतिरिक्त सबके लिए आवश्यक बना रखे हैं। चूँकि मनुष्य की आँखें अपने गिरेबान में नहीं झाँक सकतीं, इसलिए एयरकंडीशन कमरे में बैठकर ग्लोबल वार्मिंग पर बात करने में कोई नैतिक संकट उत्पन्न नहीं होता।
हर झुंड के अपने कुछ नियम हैं, इन नियमों को बनाने का काम ‘सरकार’ का होता है। सरकार उन लोगों का समूह है जो अपनी बातों से ज़मीन पर रेंगते लोगों को आसमान के ख़्वाब दिखा सकें। सपने इतने सच्चे लगने चाहियें कि रेंगनेवालों को अपने कुचले जाने का पता न चल सके। सरकार बनाने के लिए हर झुंड में एक प्रतियोगिता होती है, जिसे ‘चुनाव’ कहते हैं। इस प्रतियोगिता में जो सबसे ज़्यादा झूठा, ढीठ, ढोंगी और बेशर्म साबित होता है उसे विजेता मान लिया जाता है। अपने कार्यकाल में जब ये विजेता लोग जनता को गिड़गिड़ाने और गाली देने तक विवश कर देते हैं तब अगली प्रतियोगिता में अन्य प्रतियोगियों के जीतने की संभावना बनती है। इससे प्रतियोगिता में रोचकता बनी रहती है। प्रतियोगिता के विजेता अन्य झुंडों के विजेताओं से मिलने-जुलने और लड़ने-भिड़ने में समय व्यतीत करते हैं। इन खर्चों को पूरा करने के लिए झुंड के बाक़ी लोग दिन-रात कठोर परिश्रम करके धन की व्यवस्था करते हैं। हर सरकार अपने झुंड के लोगों को बताती है कि उनके झुंड की दूसरे झुंडों के बीच इज़्ज़त बढ़ रही है। ऐसा सुनकर झुंड के लोग नाचने लगते हैं और सरकार के ख़र्चे उठाने के लिए ख़ुशी-ख़ुशी तैयार हो जाते हैं।
पृथ्वी का मनुष्य भोजन-पानी के बिना जीवित रह सकता है, किन्तु दूसरों के जीवन में ताका-झाँकी किये बिना नहीं जी सकता। किसके जीवन में क्या चल रहा है, किसकी किससे दोस्ती है, किसकी किससे दुश्मनी है, कौन क्या खाकर सोया है, कौन भूखा सोया है… इस प्रकार के लाखों प्रश्न जीवनयापन का कच्चा माल हैं। मनुष्य बड़ी लगन से इन प्रश्नों को जन्म देता है, फिर दिन-रात श्रम करके इनके उत्तर या तो खोज लेता है, या फिर गढ़ लेता है। उत्तर मिलते ही उन्हें लेकर वह दूसरे मनुष्य को पहले मनुष्य की समस्या और अपनी ज्ञानवत्ता से अवगत कराता है। इस प्रक्रिया में जो चर्चा होती है, वही चर्चा मानव जीवन का परम सुख है। सुख के उन्माद में यह चर्चा धीरे-धीरे झूठ और चरित्र-हत्या के हथियारों का पुलिंदा बनकर उस मनुष्य तक पहुँच जाती है जिसके विषय में चर्चा की जा रही थी। अब वह मनुष्य सक्रिय होता है और चर्चा का पीछा करते हुए चर्चा के जनक को तलाशने लगता हैं। चर्चा आगे बढ़ती जाती है और उसका नायक उसके सूत्रों में उलझकर पीछे होने लगता है। अंततः एक दिन वह जनक को तलाश लेता है और फिर कहासुनी, तू-तू-मैं-मैं, गाली-गलौज, झगड़ा, हाथापाई, मारपीट, भिड़ंत, मुठभेड़ और युद्ध तक कुछ भी हो सकता है। इस घटना के अंत में भी विजेता को धर्मात्मा और पराजित को अधर्मी मान लिया जाता है। फिर इस घटना की चर्चा चलती है। फिर युद्ध, फिर चर्चा, फिर युद्ध…. बस इसी तरह यह संसार-चक्र चलता रहता है।

✍️ चिराग़ जैन

सत्य

सत्य, जिसकी हम अभागे खोज करते फिर रहे हैं
वो युगों से वैभवों का दास बनकर जी रहा है
न्याय, जिसकी चाह में जीवन समर्पित कर चुके हैं
वो किसी दरबार में उपहास बनकर जी रहा है

पीर की सिसकी सुनी तो आँख का पानी पिलाया
दर्द बेघर था, उसे अपने बड़े दिल में बसाया
आह बेसुध थी, उसे सम्बल दिया अपनी भुजा का
हिचकियाँ बेचैन फिरती थीं, गले उनको लगाया
कष्ट की आँखें सजल पाकर उसे अपना कहा था
रंगमंचों पर वही, उल्लास बनकर जी रहा है

आपसी विश्वास, छल की छूट का पर्याय भर है
हर शपथ, मन में बसे इक झूठ का पर्याय भर है
धैर्य कड़वा घूँट है, कायर जनों का ढोंग कोरा
दान क्या है, आत्मा की लूट का पर्याय भर है
भाग्य जब हमसे मिला तो, ठूठ-सा था रूप उसका
आजकल वह बाग़ में मधुमास बनकर जी रहा है

ज्ञान, अपनी धूर्तता को, नीति कहने की कला है
धर्म, नियमों को नियति की रीति कहने की कला है
अर्थ है वह उपकरण जो पाप को भी पुण्य कर दे
प्रेम, कोरी वासना को प्रीति कहने की कला है
जो कथानक वास्तविकता के धरातल पर नहीं था
आजकल वह विश्व का इतिहास बनकर जी रहा है

✍️ चिराग़ जैन

अपशकुनों का दोष

सागर खारा, नदिया सूखी
ताल-तलैया में कीचड़ था
लेकिन प्यास नहीं बुझने का,
हर आरोप ओक ने झेला

पेट अन्न को तरस रहा था
और शिरा में रक्त नहीं था
प्रेम व्यस्त था, प्रीत त्रस्त थी
आलिंगन का वक़्त नहीं था
चिंताओं की धूप धरा की उर्वरता को सोख चुकी थी
पर फिर भी बंध्या जीवन का, सारा दंश कोख़ ने झेला

मुस्कानों में आडम्बर थे
उत्सव थे कोरी मजबूरी
हवन बिना मन के होते थे
और अर्चना रही अधूरी
श्रम ने भाग्य भरोसे रहकर, कोशिश का अपमान किया था
लेकिन फिर भी अपशकुनों का, सारा दोष शोक ने झेला

इन्द्रासन, त्रैलोक्य, अमरता
शस्त्रों का संधान दे दिया
मंशा की अनदेखी करके
सबको ही वरदान दे दिया
निशदिन कठिन साधना करके, असुरों ने वरदान जुटाए
फिर इन सारे वरदानों का, हर अभिशाप लोक ने झेला

✍️ चिराग़ जैन

खेल-खिलवाड़

भारत जवान दिखने और खोई जवानी वापस पाने के विज्ञापन करता रह गया और दुनिया बूढ़ा दिखाने वाली फेसबुक एप्प पर मर मिटी। अपने आपको जवानी के बाद के अधेड़ या वृद्ध गेटअप में देखकर लोग बड़े ख़ुश हुए। हमें कभी इस तरह की किसी तकनीक की ज़रूरत ही नहीं पड़ी।
हमारे देश में ग़रीबी और बेरोज़गारी का आलम यह है कि अपनी आयु से दस-पाँच वर्ष अधिक तो सब लगते ही हैं। जिसे और अधिक बूढ़ा दिखने का चाव हो, वह सरकारी अस्पतालों और सरकारी दफ़्तरों से रिश्ता जोड़ ले। इससे भी अधिक बूढ़ा दिखना हो, तो उसके लिए सरकार ने थाने खोल दिये हैं। और जिसे यह जानना हो कि वह मरणासन्न होगा तो कैसा लगेगा, उसके लिए न्यायालय की व्यवस्था है। यहाँ तो संकट जवान रहने का था। बूढ़े होने के लिए तो हमें कुछ करना ही नहीं है। भारतीय संस्कृति में ये व्यवस्थाएँ पहले से मौजूद हैं, जिनको नए आविष्कार कहकर पश्चिम ढोल पीट रहा है।
बच्चे मोबाइल पर एक खेल खेलते हैं, ‘सब-वे सर्फ़र्स’। यह खेल भी कोई नया आविष्कार नहीं है। हमारे देश के हर नागरिक के साथ हमारा तंत्र यह खेल लगातार खेलता रहता है। जब तक भागते रहोगे, तब तक ज़िंदा रहोगे। तंत्र रास्ते में अड़चन पैदा करता रहेगा, लेकिन हमें उन सबसे बचकर भागते रहना है। अगर किसी अड़चन से टकराने की भूल की, वहीं चारों खाने चित्त कर दिए जाओगे। भागो और कमाओ। कमा-कमा कर बैंक में जोड़ो, फिर कहीं किसी से टकराने की चूक करो और निपट जाओ। जैसे ही आप निपटेंगे, बाक़ी के सबवे-सर्फ़र्स आपकी उठावनी में यह बोलकर आगे भाग जाएंगे कि- ‘किसके पीछे भागे बंदे, सब कुछ यहीं रह जाना है।’
हमारे पास जनसंख्या की बहुतायत है, इसलिए हमारा तंत्र जनता से खेलता है। उनके पास लोग कम हैं, धन अधिक। इसलिए वे लोग लूडो भी सोने की गोटियों से खेलते हैं। हम मोबाइल में देखकर उनकी नक़ल करने निकले हैं। जबकि हम तो वास्तव में असलवाले लोग हैं। वो खेल खेलते हैं, हम खिलवाड़ करते हैं। हमारी बराबरी करने में उनके पसीने छूट जाएंगे। उनकी वीडियोगेम में रेस पूरी करने के लिए रास्ते में आने वाली गाड़ी, मनुष्य, पुलिसमैन सबको उड़ाने की छूट होती है। यह खेल हमारे देश में सड़कों पर रोज़ देखने को मिलता है। कभी-कभी तो स्पष्ट नहीं होता कि हमारी सड़कों से वीडियोगेम ने क्रूरता और अभद्रता सीखी है या वीडियोगेम ने खेल-खेल में हमारी पीढ़ियों से करुणा और सभ्यता छीन ली हैं।
लट्टू खेलने वाले लड़के कील पर सलीके से नाड़ा लपेट कर गतिमान लट्टू को उंगली पर नचाने का संतुलन जानते थे तो उन्हें ‘लफंडर’ और आवारा कहा जाता था, लेकिन आज पाँच सौ रुपये का बेब्लेड चलाना बच्चे का स्टेटस सिंबल हो गया है। छुपम-छुपाई और आँख-मिचौनी खेलने वाली लड़कियाँ आवारा थीं, और फाइव स्टार में जाकर दस हज़ार रुपये की एंट्री टिकट में हाइड एंड सीक खेलने वाली मैडम मॉडर्न हैं। खो-खो गँवारों का खेल है और म्यूजिकल चेयर्स एडवांस्ड लोगों का। इमली के बीज घिसकर अष्टा-च्वंगा-पैं खेलना गुनाह था, लेकिन तंबोला और पोकर खेलना स्टाइल है। स्टापू, गिट्टे, पिट्ठू गरम, कबड्डी और गिल्ली-डंडा छीनकर हमारे मुहल्ले में जिम खोल दिया गया है। जिन हवाओं में पतंगें उड़ती थी वहाँ मोबाइल का नेटवर्क बिछ गया है। साथ ही मोबाइल डाटा भी ख़ूब सस्ता है। बिस्तर पर पड़े-पड़े मोबाइल पर गेम खेलते रहो ताकि गर्दन, आँखें सीधे और बाक़ी का शरीर परोक्ष रूपेण अस्वस्थ होता रहे। फिर उसी मोबाइल पर नियरेस्ट जिम ढूंढो ताकि फेसबुक पर लिख सको ‘बीइंग हेल्थ कॉन्शियस’!

✍️ चिराग़ जैन

लाक्षागृह का अतिथि

लाक्षागृह का अतिथि आख़िर, कैसे प्राण बचाए
इससे वो ही बच पाया, जो औरों को मरवाए

न्याय भवन में जनहित का इक ढोंग चलाया जाता है
ऊँची-ऊँची बातें करके पास बुलाया जाता है
फिर धोखे से इस चौसर के पासे बदले जाते हैं
इस दलदल में धर्मराज तक अपराधी बन जाते हैं
सिंहासन तन-मन से अंधा, वीर पड़े मुँह बाए
लाक्षागृह का अतिथि आख़िर, कैसे प्राण बचाए

न्याय, मूर्ति बनकर बैठा है, षड्यंत्रों का मेला है
नियमों का इक चक्रव्यूह है, जिसमें सत्य अकेला है
आरोपी पर धाराओं के शस्त्र चलाए जाते हैं
नियमों का खिलवाड़ बनाकर वीर गिराए जाते हैं
सच के साथी प्रथम द्वार तक, पार नहीं कर पाए
लाक्षागृह का अतिथि आख़िर कैसे प्राण बचाए

वो जिसने आरोप लगाया, उससे प्रश्न करेगा कौन
ढोंग किसी का, क्षोभ किसी का, लेकिन मोल भरेगा कौन
राजभवन के जयकारों की क़ीमत कौन चुकाता है
सत्ता का अन्याय जगत् में मर्यादा कहलाता है
सच ख़ुद को साबित करता है, झूठ खड़ा इतराए
लाक्षागृह का अतिथि आख़िर कैसे प्राण बचाए

✍️ चिराग़ जैन

error: Content is protected !!