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संक्रमण काल

चौपालों पे कितने ठहाके गूंजा करते थे आज अधरों पे मुस्कान भी नहीं रही कभी स्वाभिमान तलवारों से दमकता था आज तलवार छोड़ो, म्यान भी नहीं रही पेड़ों से घरों की पहचान थी कभी पर अब पेड़ भी नहीं हैं पहचान भी नहीं रही नारियों के हाथ में भी आई न व्यवस्था और हद ये है पुरुष प्रधान...

चौरकर्म

फेसबुक के प्रयोक्ताओं को रोज़ कुछ अच्छा स्टेटस डालने का शौक तो चर्रा गया है, लेकिन इसके साथ अपनी सृजनात्मक क्षमता बढ़ाने की ललक नहीं जगी। ऐसे में दूसरों की प्रोफाइल से स्टेटस या स्टेटसांश कॉपी करके अपनी timeline पर पेस्ट करने की प्रवृत्ति बढ़ गयी है। इसमें कोई बुराई तो...

शरद पूर्णिमा

घर में आंगन न रहे, खीर के प्याले न रहे वो अंधेरे नहीं मिलते, वो उजाले न रहे चांद के पास अभी भी है ख़ज़ाना लेकिन वो लुटाए तो कहाँ, लूटने वाले न रहे ✍️ चिराग़...

राजनेता की ईमानदारी

सत्ता से चूक गए राजनेता की ईमानदारी उस चरित्रवती जवान विधवा की तरह है जिससे लताड़ खाने के बाद हर लौंडा कहता फिरता है- “खेत में हाथ पकड़ कर मो ते लिपट रही हती छिनाल, मैं धक्का दई के भाज आयो।” ✍️ चिराग़...

बँटवारा

आदमी की तरह जन्मते ही बँट जाते हैं भाव भी अलग-अलग जातियों में अलग-अलग धर्मों में। प्रसव की पीड़ा भावों की दुनिया में भी एक जैसी है। और वहां भी आ चुकी है कवि का पेट चीरकर सर्जिकल डिलीवरी की प्रक्रिया। बढ़िया ही है इस तकनीक में दर्द नहीं सहना पड़ता! देवनागरी की देह में क़ैद...
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