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दुःख के दम पर पुजता है तू

दुनिया को भरमाने वाले
सारा खेल रचाने वाले
दुःख के दम पर पुजता है तू
सुख से तुझको डर लगता है

जग का कर्ता-धर्ता तू है, जग में कष्ट अपार भरे हैं
पहले तूने पापी भेजे, फिर तूने अवतार धरे हैं
पहले आग लगाने वाले
फिर पानी बरसाने वाले
तेरा, सुख देने के दावा
कोरा आडम्बर लगता है
दुःख के दम पर पुजता है तू
सुख से तुझको डर लगता है

सब कुछ सहज चले दुनिया में, यह तुझको स्वीकार न होगा
कष्ट नहीं हो तो दुनिया में, तेरा कारोबार न होगा
हँसते लोग रुलाने वाले
दुःख देकर इतराने वाले
सुख की मांग बढ़ाता फिरता
तू इक सौदागर लगता है
दुःख के दम पर पुजता है तू
सुख से तुझको डर लगता है

आँसू, पीड़ा, कष्ट, विवशता -इनसे रिश्वत लेता है तू
सुख के झोला देता है तो, उनमें दुःख रख देता है तू
सुख के स्वप्न दिखाने वाले
दुख के पेड़ लगाने वाले
सबके सुख के परिधानों में
क्यों दुःख का अस्तर लगता है
दुःख के दम पर पुजता है तू
सुख से तुझको डर लगता है

✍️ चिराग़ जैन

व्यवस्था : एक सर्कस

गांधी परिवार की सुरक्षा में कटौती हुई तो एनएसयूआई के कार्यकर्ता गृहमंत्री के घर के बाहर इकट्ठा हो गए। वकीलों पर आन पड़ी तो वकीलों ने पुलिस मुख्यालय का घेराव कर लिया। सरेआम कहा कि उन्हें थाने की कार्रवाई पर भरोसा नहीं है, इसलिए सीबीआई, विजिलेंस के साथ विशेष जाँच समिति बनवाई जाए।
पुलिस की छवि बचाने की नौबत आई तो शीर्ष नेतृत्व ने आँसू बहाकर बेचारे पुलिसवालों की पतवार थाम ली। इन सब मुआमलों के झरोखे में एक बार उस आम आदमी की भी सुधि ले लेनी चाहिए जिसके पास यह बताने का भी ज़रिया नहीं है कि वह असुरक्षित महसूस कर रहा है। वह सुरक्षा की झोली पसारे थाने चला जाए तो पुलिसवालों का रवैया और भाषा उसे अपमानित करने में कोई कसर नहीं रख छोड़ती। वह न्याय की उम्मीद लेकर न्यायालय पहुँचता है तो न्याय व्यवस्था की पेचीदगियाँ, न्याय प्रक्रिया की गति और न्याय तंत्र की लाचारियाँ उसके पूरे जीवन को कचहरी के चक्कर लगवाकर नष्ट कर डालती हैं।
किसी सरकारी दफ्तर में आपका काम पड़ जाए तो थोड़ी ही देर में आपके मन में इस देश की व्यवस्था के प्रति घृणा से भर उठता है। रेलवे आरक्षण केंद्र पर मशीनें ख़राब हैं, मैन्युअल टिकट बनाने वाली बीसियों खिड़कियाँ हैं, लेकिन उनमें से दो या तीन पर आदमी मौजूद है। हम सिस्टम से इतने डरे रहते हैं कि बाकी खिड़कियों पर अनुपस्थित कर्मचारी के विषय में प्रश्न करते ही झिड़क दिए जाते हैं। एयरपोर्ट पर अर्द्धसैनिक बल के जवान फ्रीस्किंग की सारी मशीनें चालू नहीं करते, लोग लंबी-लंबी लाइनों में लगे रहते हैं लेकिन बाकी के काउंटर ओपन करने को कह नहीं पाते।
अस्पतालों में डॉक्टर से डरते हैं, दफ़्तरों में क्लर्क से, बैंक में बैंकर से। बस में चढ़ो तो कंडक्टर डाँटता है, बस से उतरो तो ड्राइवर। रेल में टीटी से डर लगता है तो सड़क पर सारजेंट से। थाने और न्यायालय तो हैं ही डाँट-पीट के केंद्र। सरकारी नौकरियों में ज़िन्दगी के तीस-पैंतीस साल बितानेवाले कर्मचारी की पेंशन सरकारी ख़ज़ाने पर बोझ है, लेकिन दो-ढाई साल विधायकी भोगनेवाले लीडर को पालना सरकार की ज़िम्मेदारी है। किसी विवशता में किसी बीमार को बिना हेलमेट अस्पताल ले जाने लगो तो ट्रैफिक नियमों का उल्लंघन है, लेकिन किसी मुस्टंडे नेता की रैली में सैंकड़ों दुपहिए तीन-तीन सवारियाँ लादकर बिना हेलमेट अख़बार में छपें तो यह फ़ख़ की बात है।
किस ढोंग को हमने व्यवस्था मान लिया है? व्यवस्था के नाम पर एक सर्कस चल रहा है, जहाँ रंग-बिरंगे जोकर पहले से फिक्स स्क्रिप्ट के अनुसार अपना नकली पेट, नकली हाथ या नकली नाक गिरा देता है, बाकी जोकर उसका मज़ाक़ उड़ाते हैं। इस खेल में जनता यह भूल जाती है कि वह जनता है, और वह भी तालियाँ बजाकर मज़ाक़ उड़ा रहे जोकरों में शामिल हो जाती है।
कोई भी राजनैतिक दल इस देश के लिए कुछ नहीं कर रहा। सब अपना-अपना सर्कस सजाने में जुटे हैं। हमें लगता है कि हम जोकरों पर हँस रहे हैं, लेकिन वास्तव में हर शो के बाद सारे जोकर हम पर हँसते हैं कि आज फिर हमारी स्क्रिप्ट को सच समझकर लोग तालियाँ पीटते रहे।

✍️ चिराग़ जैन

मैं अयोध्या हूँ।

मैं अयोध्या हूँ।
मेरे स्वभाव में किसी परिस्थिति का सही अंत न तो केवल कौरवों के जीत है, न ही केवल पाण्डवों की जीत। मैंने राम को ख़ुशी-ख़ुशी वन जाते देखा है, मैंने देखा है कि जब राम वन से लौट कर आए तो भरत के मन में राज्य छिनने की पीड़ा नहीं थी, अपितु भाई के लौट आने का हर्ष था।
आज फिर सरयू के घाट पलकें बिछाए एक फैसले की राह देख रहे हैं। इस फैसले के बाद अगर राम और रहमान दोनों के घर घी के दीपक जगमगा गए तो यह राम के अस्तित्व की सबसे बड़ी गवाही होगी। लेकिन इस फ़ैसले से यदि एक भी मन खिन्न हुआ तो मैं अपने राम को बता दूंगी कि राम, तुम फिर से वन चले जाओ, क्योंकि नगरवासी कुरुक्षेत्र की ओर अग्रसर हो रहे हैं।

✍️ चिराग़ जैन

सागर मंथन

सीने में जलन, आँखों में तूफ़ान से क्यों हैं ….क्योंकि आप दिल्ली में है। जिया जले, जान जले रात भर धुआँ चले …क्योंकि आप दिल्ली में हैं। सागर मंथन से हलाहल उत्सर्जन की घटना प्रोडक्शन एक्सट्रेक्ट के प्रदूषण का सृष्टि का पहला उदाहरण है। यह साफ़ है कि जब भी प्रकृति का दोहन किया जाएगा, तब-तब प्रदूषण चरम पर जाएगा। इससे जीवन जीना कठिन हो रहा है। सतयुग में शिव ने कालकूट पी लिया था। उन्होंने विष को ग्रहण तो किया लेकिन वह विष उनके गले से नीचे नहीं उतरा।
हमारी स्थिति सतयुग से थोड़ी भिन्न है। हमें कालकूट पीना भी है और राजनेताओं की ढोंगी चिंता को गले से नीचे भी उतारना है। राजनीति चिंतित है। यह प्रदूषण पराली के कारण है या दीवाली के कारण; यह भाजपा के कारण है या आम आदमी पार्टी के कारण; यह केंद्र सरकार के कारण है या दिल्ली सरकार के कारण; अगले चुनाव में इसका लाभ अरविंद केजरीवाल को मिलेगा या मनोज तिवारी को -इन महत्वपूर्ण प्रश्नों को सुलझाना सरकार का पहला दायित्व है।
जनता मुँह पर मास्क पहनकर घूम रही है। मास्क बनानेवाली कम्पनियाँ कह सकती हैं कि जिस सागर मंथन से दिल्लीवालों को कालकूट मिला है, उसी सागर मंथन से मास्क मैन्युफैक्चरिंग कम्पनियों को लक्ष्मी मिली है। धन्वंतरि जी भी इन दिनों खूब चांदी काट रहे हैं। दिल्ली सरकार के ऑड-ईवन फॉर्मूले से ओला-ऊबर को कल्पवृक्ष मिल गया है। कामधेनु भाजपा ले उड़ी है। हाथी पर मायावती का पेटेंट है। घोड़े, रंभा, कौस्तुभमणि और वारुणी के लिए राजनैतिक दल चुनाव लड़ रहे हैं। शारंग आउटडेटेड हो गया है क्योंकि हमने विदेशों से शस्त्र ख़रीदने की कला सीख ली है। जो भी पाञ्चजन्य फूंकता है उसे ध्वनि प्रदूषण फैलाने के जुर्म में पुलिस पकड़ रही है। गंधर्वों के गले चोक हो गए हैं। जनता अमृत मिलने के आश्वासन पर ख़ुशी-ख़ुशी विषपान कर रही है।
दिल्लीवाले बड़े सख़्तजान हैं। जिनको राजनैतिक और सामाजिक प्रदूषण प्रभावित न कर पाया, उन्हें ये धुँए की चादर क्या हिला पाएगी। किसी दिन कोई राजनेता ढिठाई से कह देगा कि दिल्ली गैस चेम्बर बन गई है, तो इसमें बुरा क्या है? लोग चिल्लाते रहते हैं कि गैस महंगी हो रही है। हमने दिल्लीवालों को इस महंगाई से मुक्ति दिला दी है। गैस के लिए अपनी गाड़ी कमाई मत ख़र्चाे, हवा में पाइप लगाओ और मस्ती से खाना पकाओ।
मीडिया किसी इवेंट की तरह इस स्थिति की रिपोर्टिंग कर रही है। सिस्टम और राजनेता, मीडिया को उसी स्टाइल में बयान दे रहे हैं जैसे प्याज़ के दाम बढ़ने पर देते हैं। मीडिया, सिस्टम और सरकारें तत्वज्ञान प्राप्त कर चुके हैं कि जो लोग इस धुँए से बच सकते हैं, वे अगला मुद्दा आते ही इस मुद्दे को भूल जाएंगे; और जो इस धुँए से मर जाएंगे, वे सवाल पूछने नहीं आएंगे। कुछ दिनों में यह धुआँ भी धुआँ हो जाएगा। …सब धुआँ हो जाएगा, एक वाक़या रह जाएगा।

✍️ चिराग़ जैन

गौवर्द्धन पर्व

सत्ता चाहे जिसकी भी हो, अहम् नहीं स्वीकार प्रजा को
कर्मकांड से कर्मयोग ने पल में लिया उबार प्रजा को
गोकुलवालो छोड़ो छलिया इंद्रदेव का पूजन करना
पर्वत ढोकर ही मिलता है, जीने का अधिकार प्रजा को

सत्ता की मनमानी का करना होगा प्रतिकार प्रजा को
चुप रहने से निर्भरता का होता व्याधि-विकार प्रजा को
श्रमजीवी भी दान-दया का पात्र बने तो युग कोसेगा
कर्म छोड़ कर कृपा निहारे तो सौ-सौ धिक्कार प्रजा को

✍️ चिराग़ जैन

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