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अपराजित

लो चलो आज निश्चित मानो मुझको मंज़िल मिलनी तय है अब ये तुम निर्धारित कर लो उस क्षण मेरी आँखों में तुम क्या चित्र देखना चाहोगे अपनत्व भरा इक तरल प्यार या फिर इक जलता तिरस्कार संघर्षों के तपते पथ पर, झुलसाती धूप बनोगे तुम या फिर तरुओं की छाया का दुलराता रूप बनोगे तुम तुम...

फिर से बीता इक और साल

फिर से बीता इक और साल कुछ दीवारों पर बदल गया टेबल पे कैलेण्डर बदल गया ऑफिस का रजिस्टर बदल गया लेकिन ऐसे बदलावों से कब तन बदला कब मन बदला ना सुख बदले ना दुःख बदले ना मानव का जीवन बदला इस बार नई उम्मीद जगे इस बार जगत सारा बदले आशाओं के उजियारे में अन्तस का अँधियारा बदले...

नींव की कमज़ोरी

साफ़-साफ़ दिख रही है नींव की कमज़ोरी दीवार की लीपापोती छुपा नहीं पा रही है भीतर की दरारें। एक भय-सा झाँक रहा है झरोखों से! अंधेरा ही अंधेरा छा गया है रौशनदान के आरपार सब समझ आ रहा है कि क्यों लटक गया है कंगूरों का चेहरा! ✍️ चिराग़...

एक काॅलम हादसा

कौन सोचे किन चनों के साथ कितना घुन पिसा जी रही है दामिनी या मर रही महरुन्निसा आज तो अख़बार की दरकार है केवल यही सात काॅलम सनसनी और एक काॅलम हादसा ✍️ चिराग़...

पेशावर की चीख़

ढेर सा है स्कूल के इक रूम में बच्चों के बस्तों का और उन बस्तों के बच्चों का! धूल में लथपथ कोई आदिल कभी जब स्कूल से घर लौटता था तो वो अम्मी की ढेरों गालियों से होके कमरे तक पहुँचता था आज वो आँगन में है और खून से लथपथ मगर अम्मी के होंठों से कोई अल्फाज़ गिरता ही नहीं है।...
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