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प्रीत का अवतरण

जब किसी राधिका ने सुरों को छुआ
लोक बस बाँसुरी में मगन हो गया
प्रेम ने फुसफुसा कर कहा जो कभी
अनहदी राग वह इक कथन हो गया

द्वार पर एक जोगी खड़ा भरतरी
एक पल में पराया किया प्रीत को
था कठिन द्वार पर भूल कर प्रेम को
पीठ पर लाद लाना किसी जीत को
पींगला की व्यथा आंख से बह चली
गोरखों को लगा आचमन हो गया

एक अनजान पथ पर बढ़ा जब कदम
दिल धड़कता रहा, पाँव कँपते रहे
अपशगुन इस घड़ी दिख न जाए हमें
आँख मूंदे हुए मन्त्र जपते रहे
प्रीत ने मुस्कुरा कर कहा- ‘बढ़ चलो!’
यूँ लगा ज्यों घटित इक शगन हो गया

था अनैतिक किसी ब्याहता के लिए
पर पुरुष से हृदय नेह को जोड़ना
नीतियाँ एक निर्णय पे सहमत हुईं
इस दिवानी को जीवित नहीं छोड़ना
हो गया जिससे मीरा का नैतिक पतन
अनुकरण योग्य वह आचरण हो गया

पीर अपनी सुनें और कविता लिखें
वक़्त इतना किसे मिल सका प्यार में
मन स्वयम् को अभी सुन नहीं पाएगा
व्यस्त है आज प्रियतम के सत्कार में
एक मन की ख़ुशी छंद में बंध गई
गीत में प्रीत अवतरण हो गया

✍️ चिराग़ जैन

मौन की गवाही

शब्द तो कह रहे हैं बहुत ख़ुश हो तुम
मौन लेकिन गवाही नहीं दे रहा
देखना चाहता जो शिखर पर तुम्हें
वो तुम्हें रास्ता ही नहीं दे रहा

एक अपनत्व का बोझ ढोते हुए
चाह को एक डर में डुबोते हुए
तुम सिहरती हो पलकें भिगोते हुए
दर्द को आसरा ही नहीं दे रहा

लक्ष्य से तीर भी चूकता है मगर
स्वप्न नगरी समय फूँकता है मगर
प्यास से कंठ तो सूखता है मगर
भाग्य बढ़ कर सुराही नहीं दे रहा

जग तुम्हारा पुरस्कार पोसा करे
कर्म तुमको सफलता परोसा करे
भाग्य तुम पर ज़रा सा भरोसा करे
ये इजाज़त सखा ही नहीं दे रहा

साधना पर निछावर न संबंध हो
किन्तु श्वासों पे कोई न प्रतिबंध हो
लक्ष्य औ‘ भावना में नहीं द्वन्द हो
मीत दिल से दुआ ही नहीं दे रहा

पत्थरों पर स्वयं को निछावर किया
आप अपने हुनर का अनादर किया
जिसको रौशन स्वयं को जलाकर किया
वो तुम्हें हौसला ही नहीं दे रहा

✍️ चिराग़ जैन

कल्पना का रंग

जानती है हर नदी
जिस राह पर मैं बढ़ रही हूँ
उस सफर का अंत खारा है
किन्तु कैसे रोक लूँ मैं पाँव अपने
इस सफर का रास्ता आकृष्ट करता है
घाट है रंगीन इसके और
हर इक गाम प्यारा है

छू गया सूरज मुझे जब
तो पिघल कर बह चली मैं
फिर कभी पर्वत नहीं मिल पाएगा अब
सत्य यह भी सह चली मैं।
मैं इसी अनुभूति के रोमांच से अभिभूत हूँ
जिस ठौर पर संतृप्त होती है किसी की प्यास
वो मेरा किनारा है।

पत्थरों की देह का घर्षण मिलेगा
दृढ़ नुकीली पीर से यह तन छिलेगा
किन्तु उन सब अड़चनों को लांघ कर
जिस क्षण किसी निश्छल कन्हैया की सताई
गोपिका मुझमें दुबक लरजाएगी
उस कल्पना का रंग न्यारा है।

✍️ चिराग़ जैन

परोक्ष

यूँ समझ लो हम किसी पर्वत शिखर पर आ गए हैं
जब कई झोंके हवा के आएंगे तो भय लगेगा
उस घड़ी तुम हारना मत
सिर्फ ये आभास करना
इस महापर्वत के अपराजित शिखर पर
श्वास लेते आदमी को देखने का
इन हवाओं को अभी अभ्यास कम है
ये समीरों का समर सामान्य ही है
ध्यान से देखो इन्हें तुम
है स्वयं की हार पर अचरज इन्हें ज़्यादा
तुम्हारी जीत पर विश्वास कम है

यूँ समझ लो
हम किसी बादल के ऊपर उड़ रहे हैं
जब कभी नीचे धरातल दिख पड़ेगा
भय लगेगा
उस घड़ी तुम काँपना मत
सिर्फ ये उल्लास करना
बादलों की पालकी पर तैरने के
स्वप्न को साकार होते देखने पर
विश्व को विश्वास कम है
ये धरा का मोहबल सामान्य ही है
ध्यान से देखो इसे तुम
क्षोभ है इसको स्वयं के स्वप्न पर ज़्यादा
पर तुम्हारी कामना की पूर्ति का संत्रास कम है

✍️ चिराग़ जैन

संकोच

मुस्कानों ने सूर्य उगाया
संकोचों ने अस्त कर दिया
आशाओं का महल नवेला
आशंका ने ध्वस्त कर दिया

मर्यादा की डोरी थामे
स्वीकृति का इंगित तो आया
किन्तु झुकी पलकों का मतलब
आशंकित मन समझ न पाया
ख़ुद ही मैंने हिम्मत जोड़ी
ख़ुद ही उसको नष्ट कर दिया

हलकी सी मुस्काई भी थीं
तुम दाँतों में होंठ दबाकर
फिर मीठे गुस्से से तुमने
देखा था मुझको झुँझलाकर
बिन बोले ही तुमने मेरी
दुविधा को आश्वस्त कर दिया

साथसदा रहने की ज़िद में
संगत का सौभाग्य गँवाऊं
तुम मिल जाओ इस चाहत में
मिलने तक को तरस न जाऊँ
मैं तो पग-पग पर कतराया
तुमने मार्ग प्रशस्त कर दिया

✍️ चिराग़ जैन

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