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देशगीत

नाम रहेगा शेष हमारा
सर्वोत्तम परिवेश हमारा
दुनिया का हर रंग यहाँ है
ऐसा अनुपम देश हमारा

आज़ादी के नग़मे गाकर, देशप्रेम की अलख जगाकर
स्वाभिमान हित जी लेते हैं, सिर्फ़ घास की रोटी खाकर
पल भर में तलवार हमारी हो सकती है खूं की प्यासी
पल भर में ही हो सकते हैं, शस्त्र त्यागकर हम सन्यासी
विष पीता अखिलेश हमारा
वज्र बना दरवेश हमारा
दुनिया का हर रंग यहाँ है
ऐसा अनुपम देश हमारा

ओज रुधिर में, रौद्र नयन में, रूप भयानक वैरी के हित
करुणा निर्दोषों के दुःख पर, पीठ बंधा वात्सल्य सुरक्षित
हमने सीखा ढंग से जीना, हमने सीखा ढंग से मरना
सुंदरता पर आँच हुई तो, हमने सीखा जौहर करना
शाश्वत सुख उद्देश हमारा
शांतिपरक निर्देश हमारा
दुनिया का हर रंग यहाँ है
ऐसा अनुपम देश हमारा

हम अनुनय की बोली बोलें, रस्ता मांगें हाथ पसारे
अभिमानी के लिए भरे हैं हमने आँखों में अंगारे
हम अपनी पर आ जाएँ तो सागर से अमृत चखते हैं
हम अपनी पर आ जाएँ तो पर्वत उंगली पर रखते हैं
सागर-सा आवेश हमारा
दास हुआ लंकेश हमारा
दुनिया का हर रंग यहाँ है
ऐसा अनुपम देश हमारा

मस्त फ़क़ीरों की धरती है, शांति-अहिंसा के अभिलाषी
वन्देमातरम गाते-गाते, रण में कूद पड़े संन्यासी
हमने सागर को लांघा है, पर्वत लेकर उड़े गगन में
एक वचन पूरा करने को, चैदह वर्ष बिताए वन में
सीधा-सादा वेश हमारा
प्रेम-त्याग संदेश हमारा
दुनिया का हर रंग यहाँ है
ऐसा अनुपम देश हमारा

आपस में लड़ते हैं तो क्या, दुःख में साथ खड़े होते हैं
हर मुश्किल के आगे हम ही, सीना तान अड़े होते हैं
जब संकट ने पाँव पसारे, जब भी कोई आफत आई
एक साथ मिलकर जूझे हैं, हिन्दू-मुस्लिम-सिख-ईसाई
शौर्य रहेगा शेष हमारा
मिट जाएगा क्लेश हमारा
दुनिया का हर रंग यहाँ है
ऐसा अनुपम देश हमारा

वनवासों को पूजा हमने, राजपाट हमने ठुकराया
जिससे मोह किया वो छूटा, जिसको त्याग दिया वो पाया
हम घर में रहकर वैरागी, हम वन में रहकर शासक हैं
योग-भोग दोनों के साधक, हम प्रियतम के आराधक हैं
मत मानो आदेश हमारा
पर समझो उपदेश हमारा
दुनिया का हर रंग यहाँ है
ऐसा अनुपम देश हमारा

✍️ चिराग़ जैन

महलों में वनवास

अकथ वेदना करती होगी रह-रहकर परिहास
उर्मिल ने बिन कारण भोगा महलों में वनवास

धीर धरो मैया वैदेही
अनगिन झेले कष्ट भले ही
मृग आकर्षण में अंकुर थे
स्वर्ण नगर की पीड़ा के ही
पल भर का सम्मोहन लाया जीवन भर का त्रास
उर्मिल ने बिन कारण भोगा महलों में वनवास

हर इक सुविधा द्वार पड़ी थी
प्राण बिना इक देह खड़ी थी
माँ सीता की आँखें नम थीं
पर उर्मिल की पीर बड़ी थी
भीतर-भीतर घुलकर सींचा प्रियतम का विश्वास
उर्मिल ने बिन कारण भोगा महलों में वनवास

अश्रु बहाने पर अंकुश था
पीर जताने पर अंकुश था
अगन सेज पर इक लक्कड़ को
धधक बताने पर अंकुश था
वरना सबको हो जाएगा, पीड़ा का आभास
उर्मिल ने बिन कारण भोगा महलों में वनवास

हमें बताया रामायण ने
भीषण पाप किया रावण ने
किन्तु देह की पर्णकुटी से
जिसका हरण किया लक्ष्मण ने
उस बेचारी ने कब की थी कंचन मृग की आस
उर्मिल ने बिन कारण भोगा महलों में वनवास

✍️ चिराग़ जैन

पुनर्समीक्षा

किस पर्वत से पत्थर आया, कैसे रूप धरा पत्थर ने
बस इतने भर से मूरत की, प्राण प्रतिष्ठा करनी होगी
पूछ लिया यदि उत्सुक होकर, शिल्पी की घायल उंगली से
तो फिर इस पूरे मंदिर की पुनः समीक्षा करनी होगी

रामकथा लिखना चाहो तो, केवट का किस्सा सुन लेना
कैसे त्याग गए पल भर में, शासन का हिस्सा सुन लेना
सागर से सुनना यश गाथा, जिसको क्रोध दिखा राघव का
शबरी और निषाद कहेंगे, जिनको शोध दिखा राघव का
वह पत्थर गाथा गाएगा परस जिसे इंसान किया था
उन ऋषियों के दल से पूछो जिन सबका कल्याण किया था
लिखना, कैसा युद्ध हुआ था राघव का दम्भी रावण से
पूछ नहीं लेना भूले से, परित्यक्ता सीता के मन से
अगर सिया ने मन खोला तो बहुत प्रतीक्षा करनी होगी
तो फिर इस पूरे मन्दिर की पुनः समीक्षा करनी होगी

बस यह लिखना कैसे निर्धन ब्राह्मण से संबंध निभाया
बस यह लिखना किस कौशल से कालयवन का अंत कराया
बस यह लिखना उस नटवर का रणकौशल में यश कितना था
बस यह लिखना पूरे युग पर मधुसूदन का वश कितना था
गौवर्द्धन पर्वत बोलेगा जिसको उंगली पर रखा था
भीष्म-धनंजय की सुन लेना, जिनने रूप विराट लखा था
गीता के श्लोकों को पढ़कर, श्रद्धा का लेखा भर देना
राधा के बिरही यौवन को, बिल्कुल अनदेखा कर देना
राधा से उद्धव उलझे तो विस्मृत शिक्षा करनी होगी
फिर इस पूरे ही मंदिर की पुनः समीक्षा करनी होगी

बोधगया के वन बोलेंगे कितने थे विद्वान तथागत
नालंदा जगकर बोलेगा क्या थे दिव्य महान तथागत
ईश्वर का अवतार वही था, नगरवधू का मन बोलेगा
शांति-अहिंसा का गायक था, धरती का कण-कण बोलेगा
मुख पर कैसी दिव्य प्रभा थी, शिष्यों की टोली बोलेगी
इक दिन यह सारी मानवता उनकी ही बोली बोलेगी
तप की इक अनुपम शैली से युग के पन्ने मोड़ गए थे
राहुल से मत चर्चा करना, उसको सोता छोड़ गए थे
परित्यक्ता के अधर खुले तो खंडित निष्ठा करनी होगी
फिर इस पूरे ही मन्दिर की पुनः समीक्षा करनी होगी

जो तरु जग को फल देता है उसकी जड़ें उमस सहती है
जो घाटों की प्यास बुझा दे, वह नदिया प्यासी रहती है
अक्सर दीपक के भीतर ही गहन अंधेरा छुप जाता है
तेज दुपहरी की आभा में, मौन सवेरा छुप जाता है
जिस पर्वत में करुणा जागी उसके जल को बहना होगा
अमृत घट उपजाकर भी सागर को खारा रहना होगा
जग की भूख मिटानी है तो हल की चुभन सहन कर लेना
उजियारा फैलाना है तो निज को पूर्ण दहन कर लेना
हर पूजित को दायित्वों की कठिन परीक्षा करनी होगी
इतिहासों को हर मन्दिर की पुनः समीक्षा करनी होगी

✍️ चिराग़ जैन

समय-चक्र

सदा कसा ही नहीं रहेगा, जीवन पर कष्टों का फंदा
सूरज तेरी यही रौशनी, ठंडी करके देगा चंदा

रिश्तों के अपनेपन का भी, पीड़ा रूप बदल जाती है
जिनके बिन जीवन मुश्किल था, उनकी संगत खल जाती है
जितना तेज़ तपेगा सूरज, उतना अधिक मेह बरसेगा
जितना ज्यादा विरह सहेंगे, उतना गहन नेह बरसेगा
पत्थर छैनी सहकर पुजता, लकड़ी झेल रही है रंदा
सूरज तेरी यही रौशनी, ठंडी करके देगा चंदा

शनि की महादशा झेली है, अब कष्टों से डरना कैसा
सपनों को मरते देखा है, इससे बढ़कर मरना कैसा
अंतर्दशा बदलने से ही, मन के पत्थर घुल जाते हैं
लग्न कुण्डली नहीं बदलती, लेकिन गोचर खुल जाते हैं
हर क्षण रूप बदलता रहता, ये किस्मत का गोरखधंधा
सूरज तेरी यही रौशनी, ठंडी करके देगा चंदा

जिसको भी अमरत्व मिलेगा, वह जग को नश्वर मानेगा
जिसको विष पीना आता है, उसको जग ईश्वर मानेगा
रावण हँसता है लंका में, राम बिलखते सिया विरह में
कंस राजसुख भोग रहा है, कृष्ण जन्मते बंदीगृह में
सारा जीवन कष्ट सहे जो, नाम उसी का आनंदकंदा
सूरज तेरी यही रौशनी, ठंडी करके देगा चंदा

✍️ चिराग़ जैन

प्रह्लाद जीवित है

हार भी है, जीत भी है
पीर भी है, प्रीत भी है
अनवरत इक शोर भी है
आपदा घनघोर भी है
किन्तु अन्तस् में अमर आह्लाद जीवित है
होलिका की गोद में प्रह्लाद जीवित है

मानता हूँ उत्सवों का दौर थोड़ा कम हुआ है
आंधियों से आम्रवन का बौर थोड़ा कम हुआ है
किन्तु कलरव ने चहकने की प्रथा त्यागी नहीं है
मांगलिक वेला अभी सब हार कर भागी नहीं है
कोयलों का आम से संवाद जीवित है
होलिका की गोद में प्रह्लाद जीवित है

दृष्टि की सीमा तलक अनजान वीराना पड़ा है
कान के उस पार सीमाहीन सन्नाटा खड़ा है
किन्तु हाथों पर तनिक रंगीन-सा एहसास भी है
‘पीर का भी अंत होगा’ -एक ये उल्लास भी है
मौन का आनंद अंतर्नाद जीवित है
होलिका की गोद में प्रह्लाद जीवित है

धीर टूटेगा लखन की चेतना को लुप्त पाकर
मन विकल होगा किसी अभिमन्यु को समिधा बनाकर
किन्तु द्रोणाचल किसी संजीवनी को जन्म देगा
शौर्य को अमरत्व युग-युग तक समूचा धर्म देगा
सत्य का यश मौत के भी बाद जीवित है
होलिका की गोद में प्रह्लाद जीवित है

✍️ चिराग़ जैन

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