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वैदेही वनवासी है

रघुपति राघव के चेहरे पर गहरी आज उदासी है
अवधपुरी में उत्सव है पर वैदेही वनवासी है

राजसूय के आयोजन का वैभव आज पधारा है
इक राघव के मन से बाहर हर कोना उजियारा है
गाजे-बाजे, ढोल-नगाड़े, शुभ-मंगल और छप्पन भोग
राम समझते हैं क्षणभंगुर हैं ये सब के सब संयोग
जनकसुता का प्रेम लब्ध है, बाकी सब आभासी है
अवधपुरी में उत्सव है पर वैदेही वनवासी है

रघुकुल राघव की जय-जय से धरती-नभ आच्छादित है
कीर्ति ध्वजा की सजधज लखकर जन-गण-मन आह्लादित है
किन्तु सियावर राम हृदय को यह उत्सव इक तर्पण है
प्राणप्रिया सीता पीड़ित है, धोबी को आमंत्रण है
बाहर राजा-सा दिखता है, भीतर इक संन्यासी है
अवधपुरी में उत्सव है पर वैदेही वनवासी है

पूजन में तो स्वर्णसिया से रीति निभा ली जाएगी
किन्तु हिया से नेह लुटाती प्रीति कहाँ से आएगी
उच्चारण होगा मंत्रों का, यज्ञ प्रखरता पाएगा
किन्तु वियोगी मन समिधा से पूर्व भस्म हो जाएगा
प्रियतम के बिन क्या उद्यापन, विरही मन उपवासी है
अवधपुरी में उत्सव है पर वैदेही वनवासी है

✍️ चिराग़ जैन

मोल केवल ध्येय का है

प्रश्न तो उद्देश्य का है, मोल केवल ध्येय का है
जो मिला आशीष बनकर, अर्थ उस पाथेय का है
मात्र जीने के लिए सब लोग जीकर मर रहे हैं
कर्म तो सब कर रहे हैं।
कर्म तो सब कर रहे हैं।

जो सहजता से नियत पथ पार कर उजियार देगी
बस उसी पहली किरण को अर्घ्य का वैभव मिलेगा
बादलों के द्वंद से भी दामिनी उत्पन्न होगी
किन्तु इस हठधर्मिता को मान वैसा कब मिलेगा
एक प्राची की उपज है, एक गर्जन की सहेली
एक को जग पूजता है, एक से सब डर रहे हैं
कर्म तो सब कर रहे हैं।
कर्म तो सब कर रहे हैं।

एक गोवर्द्धन उठाकर कृष्ण गिरधारी कहाए
द्रोणपर्वत हाथ पर धर लाए थे हनुमान सारा
किन्तु जब कैलाश को लंका लिवाने चल दिया तो
शक्ति के मद में पगा लंकेश का अभिमान हारा
एक जग कल्याण का था, एक निज अभिमान का था
एक मन भीतर विराजे, एक मन बाहर रहे हैं
कर्म तो सब कर रहे हैं।
कर्म तो सब कर रहे हैं।

कृष्ण ने जिस काल में युग के हृदय पर छत्र पाया
कंस ने उस ही समय में लोकनिंदा पाई जग से
जब युधिष्ठिर धर्म की सीमा समझकर लड़ रहे थे
तब सुयोधन कर रहा था, धूर्तता-चतुराई जग से
एक रावण का अहम था, एक राघव की सरलता
एक ने कुल को डुबोया, एक के पत्थर बहे हैं
कर्म तो सब कर रहे हैं
कर्म तो सब कर रहे हैं

✍️ चिराग़ जैन
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अवसान

सुबह उगे सूरज का ढलना निश्चित है हर शाम रे
फिर भी कब रुकते हैं पल भर इस दुनिया के काम रे

जिनका जीवन ग्रंथ हुआ था
जिनका कीना पंथ हुआ था
जो रावण का काल बन गए
मानवता का भाल बन गए
जिनने दीन अहिल्या तारी
जिनने युग की भूल सुधारी
जिनके चिन्ह क्षितिज पर ठहरे
जिनके तप से पत्थर तैरे
सरयू की लहरों में उतरे वो पुरुषोत्तम राम रे
फिर भी कब रुकते हैं पल भर इस दुनिया के काम रे

जिनकी कीर्ति युगों से ऊँची
आभारी थी सृष्टि समूची
गीता के उद्घोषक थे जो
पाण्डव दल के पोषक थे जो
यौवन पर उपकार रहे जो
कष्टों का उपचार रहे जो
भीषण रण के नायक थे जो
द्वापर के अधिनायक थे जो
केवल भ्रम की भेंट चढ़े थे वो माधव घनश्याम रे
फिर भी कब रुकते हैं पल भर इस दुनिया के काम रे

अपना क्या अस्तित्व यहाँ पर
जंगल में इक कीट बराबर
हम कितने भोले-भाले हैं
दायित्वों का भ्रम पाले हैं
कितने आए, कितने बीते
जग के कीर्ति कलश कब रीते
छिटका कर कुछ दिन को छींटे
थोड़े हारे, थोड़े जीते
हम भी छोड़ चले जाएंगे जीवन का संग्राम रे
फिर भी कब रुकते हैं पल भर इस दुनिया के काम रे

✍️ चिराग़ जैन

देशप्रेम का क्रीम-पाऊडर

‘राजनीति महत्वाकांक्षी मस्तिष्कों का क्रीड़ाक्षेत्र है।’ -यह एक सूक्ति मात्र नहीं बल्कि मतदाताओं की उम्मीदों पर वज्रपात भी है। समाजसेवा और देशप्रेम का क्रीम-पाऊडर लगाकर कोई व्यक्ति जनता को मुँह दिखाने क़ाबिल बनता है। निरंतर ब्यूटी पार्लर भ्रमण करने के फलस्वरूप जनता एक दिन यह यक़ीन कर बैठती है कि चेहरे की यह चमक वास्तविक है। जैसे ही जनता को यह यक़ीन होता है उसी क्षण नया नेता भागकर किसी पार्टी के दफ़्तर में जाता है और अपने मेकअप पर हुए ख़र्चे की बोली लगाने का उपक्रम शुरू करता है।
पार्टी में बैठे पुराने घाघ नेता, फाउंडेशन के दम पर बनी उसकी पब्लिक फाउंडेशन का पार्टी के हित में आकलन करते हैं और एक कुशल गृहिणी की तरह आलू-प्याज की शैली में उससे उसकी औक़ात का मोलभाव करने लगते हैं। उचित मूल्य लग जाने के बाद नवनिर्मित नेताजी का चेहरा दो भागों में बाँट दिया जाता है। पार्टी कार्यालय के भीतर उनका आचरण ठीक वैसा होता है जैसा ग्राहक जुटा लेने के बाद किसी गणिका का अन्य गणिकाओं से होता है। पार्टी कार्यालय के बाहर वही गणिका अन्य ग्राहकों के सामने चरित्रवती बनकर लानत भेजने लगती है।
प्रत्येक गणिका के जीवन में एक समय ऐसा अवश्य आता है जब उसका आसामी उससे ऊब जाता है और उसे ग़ैरत की क़ीमत चुकाने में आनाकानी करने लगता है। इस परिस्थिति में हर गणिका यह समझ जाती है कि उसका ग्राहक अब ज़्यादा दिन उसे नहीं झेलेगा। मूर्ख गणिकाएँ ऐसी स्थिति को दिल से लगाकर आसामी को नपुंसक कहने लगती हैं और बिस्तर पर की गई उसकी हरक़तों को सार्वजनिक करके उसकी चरित्र हत्या का प्रयास करती हैं। किन्तु प्राणहीन की हत्या संभव कहाँ है?
समझदार और अनुभवी गणिकाएँ ऐसा नहीं करतीं। वे ग्राहक की ऊब को भाँपकर अतिरिक्त विनम्र हो उठती हैं। अन्यान्य उपायों से भरसक प्रयास करती हैं कि उसका आसामी उससे ख़ुश रह सके। किन्तु जब कोई उपाय नहीं दिखता तो वे एक दिन ग्राहक के भोजन में विष मिला देती हैं और उसकी लाश का अंगूठा कोरे काग़ज़ पर लगाकर उसकी संपत्ति का हरण कर लेती हैं। ये गणिकाएँ सर्वाेच्च पदों तक पहुँचने की क्षमता रखती हैं।
विभीषण जब रावण से अपमानित हुआ तो उसे राम याद आए। उसने राम को बताया कि मैं तो लंका में रहकर भी आप ही के नाम की उपासना करता था। सुनकर राम प्रसन्न हो गए और विभीषण को राज्यसभा भेजने का वचन दे दिया। अपनी राज्यसभा की सीट पक्की होते देख महात्मा विभीषण ने रावण की लंका, भाई-बहन और यहाँ तक कि अपने राष्ट्र से भी मुख़ालफ़त करने में हिचक न की। विभीषण के इस समर्पण से राम बहुत प्रसन्न हुए और उन्हें भक्त-शिरोमणि की उपाधि दी।
उधर सुग्रीव का भाई उसकी बदतमीज़ीयों से उकताकर उसे घर-निकाला दे चुका था। सुग्रीव में इतनी हिम्मत न थी कि भाई के कान पर दो टिका दे। दुःखी सुग्रीव ऋष्यमूक पर्वत पर बैठे सीताहरण लाइव देख रहे थे। उन्होंने रावण को ऐसा पाप करने से रोकना चाहा किन्तु उन्हें लगा कि सीता का पता बताने के बदले में मैं राम से सौदेबाज़ी कर सकता हूँ। उन्होंने सीताहरण होने दिया। राम जब विकल होकर पहुँचे तो सुग्रीव उतने ही प्रसन्न हुए जितने संजीव कुमार के हाथ काटकर गब्बर सिंह जी हुए थे। उन्होंने राम से कहा कि मैं आपकी केस स्टडी तो करना चाहता हूँ लेकिन ‘फोर्स्ड बैचलर’ होने के कारण कंसन्ट्रेट नहीं कर पा रहा हूँ। राम अब तक फोर्स्ड बैचलर की पीड़ा जान चुके थे। लक्ष्मण तो इस फील्ड में सीनियर फैलो थे ही। दोनों भाइयों ने मिलकर पीएसी की मीटिंग में बाली को धूल चटाने की योजना बनाई। इसके लिए सबसे पहले सुग्रीव को पार्टी से निलंबित किया गया। उसने बाली को गालियाँ देने का अधिकृत लाइसेंस पा लिया। कुछ दिन गालियों से अभिषेक करने के बाद सुग्रीव को वापस पार्टी की सदस्यता दे दी गई। इस स्टेप से बाली बौखला गया। उसकी बौखलाहट का लाभ उठाकर उसे पार्टीविरोधी सिद्ध करते हुए राम ने बाली की हत्या कर दी।
अंगद सबसे समझदार रहा। उसने चाचा को पटाए रखा। क्योंकि वह जानता था कि राजनीति में पासा कहीं भी पड़ सकता है। यदि चाचा जीता तो अंगद की स्वामिभक्ति उसकी राज्यसभा सीट का ग्राउंड बना देगी और अगर चाचा निबट गया तो इकलौता पुत्र होने के कारण उसका अपने पिता की संपत्ति पर अधिकार रहेगा ही रहेगा।
अब प्रश्न यह है कि इस सबके बीच जनता क्या करे। अरे भई, हरि का गुन गाओ…. राम का नाम भजो और अपनी दो जून की रोटी की चिंता करो। क्योंकि भूखे पेट न भजन गोपाला!

✍️ चिराग़ जैन

स्त्री के साथ हुए दुर्व्यवहार की उत्तरदायी स्त्री नहीं है

सिचुएशन 1 : राधा कृष्ण से प्रेम करती थीं। कृष्ण भी उनसे प्रेम करते थे। दोनों अविवाहित थे किंतु इस प्रेम पर किसी को कोई आपत्ति नहीं। निष्कर्ष : परस्पर सहमति पर आधारित संबंध स्वीकार्य है।

सिचुएशन 2 : कर्ण को द्रौपदी के स्वयंवर में भाग नहीं लेने दिया गया। रावण सीता स्वयंवर में भाग नहीं ले पाए। कर्ण ने सुयोधन के बल पर स्वयंवर के अपमान का प्रतिशोध लेने का प्रयास किया। रावण ने सीता का अपहरण करके अपनी आसक्ति की तुष्टि का प्रयास किया। रावण, कर्ण, सुयोधन, सुशासन आदि सभी लोकनिंद्य होकर युद्ध में खेत हुए। निष्कर्ष : स्त्री को प्रतिशोध की अग्नि शांत करने का “सामान” समझना भयावह भूल है।

सिचुएशन 3 : शूर्पनखा लक्ष्मण पर आसक्त हुई और लक्ष्मण की असहमति के बावजूद उस पर दबाव बनाने का प्रयास किया। लक्ष्मण ने शूर्पनखा की नाक काट दी। निष्कर्ष : पुरुष की सहमति को महत्वहीन समझना स्त्री के अपमान का कारण हो सकता है।

सिचुएशन 4 : अहिल्या पर आसक्ति इंद्र का अपराध था। गौतम ऋषि को भ्रमित कर अहिल्या का बलात्कार करने की घटना में अहिल्या निर्दोष थी फिर भी गौतम ऋषि ने अहिल्या का परित्याग किया। राम ने स्वयं अहिल्या के साथ हुए अन्याय का निदान किया। निष्कर्ष : स्त्री के साथ हुए दुर्व्यवहार की उत्तरदायी स्त्री नहीं है। इस पोस्ट से हमें यह शिक्षा मिलती है कि शास्त्र पूजने की नहीं, पढ़ने की चीज़ हैं।

✍️ चिराग़ जैन

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