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एक घड़ी की परछाई

उत्सव की आँखें भीगी हैं, एक घड़ी विपदा लाई
हर उजियारे पर भरी है, एक घड़ी की परछाई

कैसे वर मांगे कैकयी ने, सिंहासन से राम छिने
काया से जीवन छीना है, आशा से आयाम छिने
नगर समूचा वन जैसा है, यश-वैभव वनवासी है
जिसने सबकी ख़ुशियाँ छीनीं, उसके द्वार उदासी है
भोली रानी ख़ुद की करनी, ख़ुद भी मेट नहीं पाई

एक ठहाका पांचाली का पूरे युग पर भार बना
एक वचन ही पूरे युग की चीखों का आधार बना
पुत्र गँवाए, लाज लुटाई, घर छूटा, वनवास सहा
एक ठहाके के बदले में जीवन भर संत्रास सहा
इतने पर भी कब संभव है, उस इक पल की भरपाई

एक घड़ी आवेश न आता, गणपति मानवमुख रहते
एक घड़ी अमृत न छलकता, सूरज-चांद न दुख सहते
एक घड़ी का दंभ न होता, वंश दशानन क्यों खोता
एक घड़ी चौसर टल जाती, युग वीरों पर क्यों रोता
ईश्वर से भी कब टल पाई, एक घड़ी वह दुखदाई
हर उजियारे पर भारी है, एक घड़ी की परछाई

✍️ चिराग़ जैन

समय का बारदाना

जब समय फंदा कसेगा
भूमि में पहिया धँसेगा
शाप सब पिछले डसेंगे
पार्थ नैतिकता तजेंगे
उस घड़ी तक जूझने का भ्रम निभाना है
सब समय का बारदाना है
नीतियों का ढोंग करतीं, सब सभाएँ मौन होंगी
न्याय की बातें बनातीं मन्त्रणाएँ मौन होंगी
जब प्रणय को भूलकर राघव निरे राजा बनेंगे
तब सिया के गीत गातीं प्रार्थनाएँ मौन होंगी
जो सदा रक्षक रहा हो
पुत्रवत सेवक रहा हो
उस लखन ने ही वनों में छोड़ आना है
सब समय का बारदाना है
द्यूत के उपरांत लज्जित शौर्य का वैभव रहेगा
श्वास ज्वाला में दहकता वीरता का शव रहेगा
व्यूह की रचना करेंगे द्रोण जब भीषण समर में
व्यूह भेदन का पुरोधा पार्थ तब ग़ायब रहेगा
आँख से आँसू झरेंगे
घात सब अपने करेंगे
अर्जुनों को बाद में बदला चुकाना है
सब समय का बारदाना है
ज़िन्दगी के हर मिलन का, हर विरह का क्रम नियत है
बाण की शैया मिलेगी या मधुर रेशम, नियत है
सब नियत है कब कहाँ किसको दबोचेगी पराजय
कब कहाँ उत्सव मनेगा, कब कहाँ मातम नियत है
न्याय का उपहास तय है
राम का वनवास तय है
कैकयी का कोप तो कोरा बहाना है
सब समय का बारदाना है
✍️ चिराग़ जैन

आशाओं पर आघात

पतझर का आना निश्चित था
पत्ते झर जाना निश्चित था
हरियाली की आशाओं पर, बादल ने आघात करा है
आँगन में जो ठूठ खड़ा है, वो सावन के हाथ मरा है

दुःशासन ने चीर हरा तो ठीक समय आ पहुँचे माधव
भीष्म काल बनकर बरसे तो तोड़ प्रतिज्ञा पहुँचे माधव
एकाकी होकर जूझा अभिमन्यु अकेला षड्यंत्रों से
आस रही होगी उसको भी, माधव के अभिनव तंत्रों से
उसका घिर जाना निश्चित था
भू पर गिर जाना निश्चित था
पर उस दिन जो वीर मरा है, उम्मीदों के साथ मरा है
आँगन में जो ठूठ खड़ा है, वो सावन के हाथ मरा है

जिस रानी ने जर्जर रथ की कील बना दी अपनी उंगली
दशरथ के रथ के पहिये के बीच फँसा दी अपनी उंगली
अंतर कभी नहीं रखती हो जो सौतन की संतानों में
ऐसी रानी रूठ गई तो क्या मांगेगी वरदानों में
राघव को वनवास; असंभव
रघुकुल को संत्रास; असंभव
पहले यह विश्वास मरा है, दशरथ उसके बाद मरा है
आँगन में जो ठूठ खड़ा है, वो सावन के हाथ मरा है

✍️ चिराग़ जैन

जीतकर पछता रहे हैं

जब तलक संघर्ष में थे, व्यस्तता के हर्ष में थे
दृश्य कितने ही मनोरम, कल्पना के स्पर्श में थे
स्वप्न जबसे सच हुआ, उकता रहे हैं हम
जीतकर पछता रहे हैं हम

जब हमें हासिल न थी, मंज़िल लुभाती थी निरन्तर
बाँह फैलाए हमें हँसकर बुलाती थी निरन्तर
पर पहुँच कर जान पाए, है निरी रसहीन मंज़िल
राह गति की सहचरी है, हलचलों से हीन मंज़िल
हम सरीखे युग-विजेता हर जगह बिखरे पड़े हैं
हम स्वयं को ही बड़ा समझे, यहाँ कितने बड़े हैं
हर किसी की कीर्ति गाथा से हुई है त्रस्त मंज़िल
हर घड़ी तोरण सजाए, स्वागतों में व्यस्त मंज़िल
राह के जिस मोड़ से गुज़रे वहाँ बाक़ी रहे हम
किन्तु मंज़िल पर पहुँचकर नित्य एकाकी रहे हम
रास्तों को याद अब भी आ रहे हैं हम
जीतकर पछता रहे हैं हम

याद आता है दशानन किस तरह टूटा हुआ था
याद है अभिमान का हर एक प्रण झूठा हुआ था
गूँजता है कान में वह युद्ध का जयघोष भीषण
याद सागर को रहेगा राम का आक्रोश भीषण
क्या ज़माना था हमारे नाम से पत्थर तिरे थे
मौत से टकरा गए सब यार अपने सिरफिरे थे
प्रेम मीठे बेर चखकर रोज़ रखता था, समय था
वाटिका में प्रीत का बूटा महकता था, समय था
हम अगर छू लें, शिलाएँ बोल उठती थीं, समय था
नाम भर से पापियों की श्वास घुटती थी, समय था
जंगलों में भी कभी सत्कार होता था, समय था
हम जिधर भी चल दिये, त्यौहार होता था, समय था
मन पुरानी याद से बहला रहे हैं हम
जीतकर पछता रहे हैं

हम खड़े थे साथ जिसके, जय उसी के द्वार आई
हर प्रखर संकल्प अपना सृष्टि हम पर वार आई
शास्त्र को छूकर न जाना, पर महाभारत लड़ा था
युद्ध के मैदान में भी धर्म का पोथा पढ़ा था
काज जो सम्भव नहीं थे, वो हमीं ने कर दिखाए
पर्वतों की ओट लेकर इंद्र को ललकार आए
कालिया के दाह में हम कूद जाते थे अकेले
खेल में सुलझा दिए थे, विश्व के कितने झमेले
मित्रता की रीत के प्रतिमान हम ही ने गढ़े हैं
और पावन प्रीत के उपमान हम ही ने गढ़े हैं
बाँसुरी की तान पर यौवन थिरकता था हमीं से
जब सुदर्शन धार लें तो पाप कँपता था हमीं से
पदकमल से व्याल को भरमा रहे हैं हम
जीतकर पछता रहे हैं हम

✍️ चिराग़ जैन

सुख का आमंत्रण

पीड़ा की तैयारी कर लो, सुख का आमंत्रण आया है
जब-जब कंचन मृग देखा है, तब-तब इक रावण आया है

ईश्वर का अवतार जना है, माता को अभियोग मिलेगा
कान्हा जैसा लाल मिला है, आगे पुत्रवियोग मिलेगा
नारायण के बालसखा ने निर्धनता के कष्ट सहे हैं
वंशी के रसिया जीवनभर, समरांगण में व्यस्त रहे हैं
राधा के जीवन में दुख से पहले वृंदावन आया है
जब-जब कंचन मृग देखा है, तब-तब इक रावण आया है

वरदानों का सुख पाया तो, सुख का फल अभिशाप हुआ है
तप का पुण्य कुमारी कुंती के जीवन का पाप हुआ है
जो शाखा फैली है उसने कट जाने की पीर सही है
अर्जुन जैसा वर पाया, फिर बँट जाने की पीर सही है
पहले रानी बनने का सुख, पीछे चीरहरण आया है
जब-जब कंचन मृग देखा है, तब-तब इक रावण आया है

सुख के पीछे दुख आएगा, हर क़िस्से का सार यही है
जितनी घाटी, उतनी चोटी, पर्वत का विस्तार यही है
यौवन आने का मतलब है, आगे तन जर्जर होना है
जिस धारा ने निर्झर देखा, अब उसको मंथर होना है
नदियों में ताण्डव उफना है, जब घिरकर सावन आया है
जब-जब कंचन मृग देखा है, तब-तब इक रावण आया है

✍️ चिराग़ जैन

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