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आस का पत्ता

ताल की आँखें सजल हैं
गन्ध की पाँखें विकल हैं
पेड़ पत्थर से हुए हैं
ख़्वाब नश्तर ने छुए हैं
पर अभी भी आस का दामन नहीं छूटा
आखि़री पत्ता नहीं टूटा

मुस्कुराहट पर बनावट का असर दिखने लगा है
हर क़दम पर अब कोई अनजान डर दिखने लगा है
नित नए अनुभव हमारी आस को खलने लगे हैं
रेत पर कुछ भ्रम हमारी प्यास को छलने लगे हैं
कष्ट बढ़ते जा रहे हैं
प्रश्न चढ़ते आ रहे हैं
आँख से आराम का सपना नहीं रूठा
आखि़री पत्ता नहीं टूटा

आँख के आगे कोई घेरा घनेरा छा गया है
है निपट एकांत, साये पर अंधेरा छा गया है
हर उजाला लुट चुका है, हर सहारा लुट चुका है
जो दिशा का ज्ञान देता वो सितारा लुट चुका है
आह का स्वर घुँट गया है
चाह का घर लुट गया है
हौसले का वक़्त ने झोला नहीं लूटा
आखि़री पत्ता नहीं टूटा

इस प्रतीक्षा के परे फिर से अहल्या श्वास लेगी
और शबरी के चखे हर बेर की क़िस्मत जगेगी
जानकी के पास सागर लांघ आएगी अंगूठी
भोर से पहले उठा ले आएंगे हनुमान बूटी
कष्ट जब हद से बढ़ेगा
देव को आना पड़ेगा
ये अटल विश्वास हो सकता नहीं झूठा
आखि़री पत्ता नहीं टूटा

✍️ चिराग़ जैन

ख़रीददार

वेदियाँ बाज़ार में आ तो गई हैं किंतु फिर भी
सिर्फ़ दौलत से इन्हें पाना अभी मुम्किन नहीं है
हर गुज़रता शख़्स इनके दाम पूछेगा यक़ीनन
हर किसी के हाथ बिक जाना अभी मुम्किन नहीं है

हाथ में अमृत लिए धन्वंतरि आ ही गए हैं
पर अमरता के लिए संग्राम होना है ज़रूरी
हाँ, कई राजा उपस्थित हैं स्वयंवर की घड़ी में
किन्तु सीता के लिए तो राम होना है ज़रूरी
द्वार पर अकबर खड़ा संगीत की अरदास लेकर
कह दिया हरिदास ने गाना अभी मुम्किन नहीं है
हर किसी के हाथ बिक जाना अभी मुम्किन नहीं है

बाँसुरी का मोल करना है बहुत आसान लेकिन
श्वास को सरगम बनाने की कला अनमोल ही है
आरती की तान में शामिल हुआ तो पूज्य है अब
शंख वरना लिजलिजे से कीट का बस खोल ही है
प्यास से चातक बहुत बेचैन है लेकिन समझ लो
प्यास पोखर से बुझा आना अभी मुम्किन नहीं है
हर किसी के हाथ बिक जाना अभी मुम्किन नहीं है
✍️ चिराग़ जैन

वो निर्णय किस काम का

सब बातों पर ध्यान न देना
हर निंदा को कान न देना
इक पल की इच्छा पूरी कर
इक युग को अपमान न देना
धोबी ने कब आकर पूछा हाल अकेले राम का
जो जीवन भर की पीड़ा दे, वो निर्णय किस काम का

जग की निंदा से चिंतित हो, कोख जने को तज दोगे क्या
रश्मिरथी के उज्ज्वल पथ पर, मन भर पीड़ा रच दोगे क्या
वह पग-पग अपमान सहेगा जीवन भर चुपचाप दहेगा
किसके पापों से पीड़ित है इस सच से अनजान रहेगा
कुन्ती का मन दुःख झेलेगा, इस भीषण संग्राम का
जो जीवन भर की पीड़ा दे, वो निर्णय किस काम का

माता का आदेश सुना तो भिक्षा सम बाँटी पांचाली
अपनी चूक निभाने भर को, उस बेचारी को दी गाली
एक कथन को नहीं सुधारा इक नारी के मन को मारा
फिर उसका भी बीच सभा में वेश्या कहकर नाम पुकारा
इस पल में ही बीज पड़ा था, कुल के पूर्णविराम का
जो जीवन भर की पीड़ा दे, वो निर्णय किस काम का

कैकयी की हठ पूरी करके, ख़ुशियों को जंगल मत भेजो
झूठी शान दिखाना छोड़ो, जीवन भर का हर्ष सहेजो
कोई लौटे नाक कटाकर कोई मारे ध्यान बँटाकर
पूरा कुल अर्पण मत करना इक पल का आवेश दिखाकर
शूर्पनखा से कारण पूछो, लंका के परिणाम का
जो जीवन भर की पीड़ा दे, वो निर्णय किस काम का

✍️ चिराग़ जैन

हर सम्भव के साधन हैं

सपनों की आँखें पथराईं
हिम्मत की पाँखें कुम्हलाईं
संघर्षों की तेज पवन ने
प्राणों की शाखें दहलाईं
इन सारे झंझावातों से लोहा लिया ज़मीर ने
अमृत सोख लिया रावण का राघव के इक तीर ने

राजतिलक की शुभ वेला में राघव को वनवास मिला
स्वर्ण जड़ित आभूषण उतरे, जंगल का संत्रास मिला
लक्ष्मण, वैदेही, रघुराई
और न कोई संग सहाई
इतनी पीर सही तीनों ने
विधिना की आँखें भर आईं
फिर भी कब आँसू छलकाए, पुरुषोत्तम रघुबीर ने
अमृत सोख लिया रावण का राघव के इक तीर ने

किष्किंधा के द्वार खुले थे, किन्तु न नगर प्रवेश किया
निज अनुशासन की सीमा में, जीवन सकल निवेश किया
रघुकुल रीति सदा चलि आई
प्राण जाएँ पर वचन न जाई
दशकंधर से लंका जीती
और विभीषण को लौटाई
तीरों से कब मोह किया है, वीरों के तूणीर ने
अमृत सोख लिया रावण का राघव के इक तीर ने

हर चर्चा का सार बने हैं, जन-जन के अभिवादन हैं
आशा का आधार बने हैं, हर सम्भव के साधन हैं
केवट ने ली जो उतराई
शबरी जो झोली भर लाई
जो पूंजी जोड़ी रघुपति ने
उसकी चमक युगों पर छाई
सबकी दौलत ओछी कर दी, राघव की जागीर ने
अमृत सोख लिया रावण का राघव के इक तीर ने

✍️ चिराग़ जैन

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