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अस्तित्वों का महासमर

हम सब इस कारण ज़िन्दा हैं, शायद मर जाना दूभर है
दुनियादारी क्या है, केवल अस्तित्वों का महासमर है

जब तक सम्भव हो तब तक ये श्वास चलाने को ज़िन्दा हैं
तन को इंधन दे पाएँ, बस भूख मिटाने को ज़िन्दा है
शायद कुछ ऐसा कर जाएँ, दुनिया जिसको याद रखेगी
जीवन भर का जीवन जीकर, फिर मर जाने को ज़िन्दा हैं
कुछ लोगों का तन जर्जर है, कुछ लोगों का मन जर्जर है
दुनियादारी क्या है, केवल अस्तित्वों का महासमर है

सबको ऐसा भ्रम होता है, हम जग में अपवाद बनेंगे
अब तक मौन रही है दुनिया, फिर भी हम संवाद बनेंगे
लेकिन माली जान रहा है, बगिया के हर इक बिरवे को
सब कोंपल बनकर जन्मेंगे, मर जाने पर खाद बनेंगे
कब खिलना है, कब मुरझाना यह भी ऋतुओं पर निर्भर है
दुनियादारी क्या है, केवल अस्तित्वों का महासमर है

सबकी इतनी सी चाहत है, सुख का कुछ सामान जुटा लें
आँख मिली है सपने पालें, कण्ठ मिला है शोर मचा लें
एक ज़रा सी भूल हमारे है को है से थे कर देगी
ऐसे-वैसे जैसे भी हो, हम अपना अस्तित्व बचा लें
उस जीवन पर मुग्ध सभी हैं, जो पहले दिन से नश्वर है
दुनियादारी क्या है, केवल अस्तित्वों का महासमर है

✍️ चिराग़ जैन

उम्मीदों की राह चला हूँ

हर सन्नाटा मुखरित होगा, जब मैं स्वर लेकर पहुँचूँगा
उम्मीदों की राह चला हूँ, मैं ख़ुशियों के घर पहुँचूँगा

थक कर टूट नहीं सकता हूँ, मुझको श्रम का अर्थ पता है
बढ़ने की इच्छा कर देगी, हर मुश्क़िल को व्यर्थ पता है
मेरे हाथों की रेखाओं में इतनी कठिनाई क्यों है
निश्चित मानो, भाग्य विधाता को मेरा सामर्थ पता है
पीड़ा को उत्सव कर लूँगा, आँसू को गाकर पहुँचूँगा
उम्मीदों की राह चला हूँ, मैं ख़ुशियों के घर पहुँचूँगा

मेरे मग में संघर्षों के ठौर न आएँ; नामुम्किन है
अपना बनकर ठगने वाले और न आएँ; नामुम्किन है
फिर भी हर पतझर को पानी देता हूँ, विश्वास मुझे है
फाग उड़े और अमराई पर बौर न आए; नामुम्किन है
हर आँधी से जूझ रहा हूँ, हर सावन जीकर पहुँचूँगा
उम्मीदों की राह चला हूँ, मैं ख़ुशियों के घर पहुँचूँगा

जो औरों पर लद जाता हो, मैं ऐसा क़िरदार नहीं हूँ
अपमानित होकर मुस्काऊँ, इतना भी लाचार नहीं हूँ
जितने डग नापूंगा, उतनी धरती मेरे नाम रहेगी
अपने पैरों पर चलता हूँ, बैसाखी पर भार नहीं हूँ
जितना पहुँचूँगा अपने ही पैरों पर चलकर पहुँचूँगा
उम्मीदों की राह चला हूँ, मैं ख़ुशियों के घर पहुँचूँगा
✍️ चिराग़ जैन

हौसला सलामत है

जब तलक़ ज़मीं से ये राब्ता सलामत है
फिर बहार लाने का हौसला सलामत है

घर उजड़ गया उसका, उम्र कट गई सारी
जिसके हक़ में मुंसिफ़ का फ़ैसला सलामत है

इल्म भी नहीं होगा उड़ चुके परिंदों को
एक ठूंठ पर उनका घोंसला सलामत है

काट ली सज़ा जिसकी, हो चुका बरी जिससे
आज भी मेरे दिल में वो ख़ता सलामत है

मुद्दतों से चूल्हे की रोटियाँ नहीं खाईं
पर अभी ज़ुबां पर वो ज़ायक़ा सलामत है

✍️ चिराग़ जैन

हारने का डर

फूल, ख़ुश्बू, रंग तो मौसम चुरा ले जाएगा
कौन लेकिन बाग़बां का हौंसला ले जाएगा

हो गए बर्बाद तो फिर जश्न होना चाहिए
देखते हैं वक़्त हमसे और क्या ले जाएगा

जीतने की चाह छोड़ी, अब निभाकर दुश्मनी
हारने का डर मेरा दुश्मन लिवा ले जाएगा

दस्तख़त बेटे की ज़िद पे कर के बूढ़े ने कहा-
“क्या लुटा सकता था मैं, तू क्या लिखा ले जाएगा“

इल्म वाले बस तकल्लुफ़ में फँसे रह जाएंगे
ज़िन्दगी की मौज कोई सिरफिरा ले जाएगा

✍️ चिराग़ जैन

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