+91 8090904560 chiragblog@gmail.com

उत्सव

मेले में भी पहुँचे साथ झमेले लेकर
उत्सव किस सूरत तुमको आकर्षित करते

बाँहें फैलाते होंगे जब खेल-खिलौने
कंगाली के दंश तुम्हें बिलखाते होंगे
आकर्षण उभरा होगा जब मुस्कानों का
लाभ-बचत का तब तुम गणित लगाते होंगे
द्वन्द वहाँ था आशा और निराशाओं का
तुम बढ़कर आशाओं को अपराजित करते

रामकथा से इतनी सीख न पाई तुमने
ठीक दिशा का बाण, अधम का अंत करेगा
अडिग रहो तुम शांत तथागत जैसे बनकर
तेज तुम्हारा हर डाकू को संत करेगा
अभिनय से जीवन का सार ग्रहण करना था
उलझन से ख़ुद को कुछ देर विभाजित करते

सरगम की पहली कक्षा से ऊब गए तो
अनहद का संगीत नहीं साधा जाएगा
धरती के प्राणी को अवरोधक माना तो
ईश्वर सा मनमीत नहीं साधा जाएगा
हर झूले की पींग तुम्हें ही लेकर उछले
ऐसी इच्छाओं को क्षण भर विस्मृत करते

✍️ चिराग़ जैन

102 नॉट आउट

ज़िन्दगी जीने का सबसे सही तरीका यही है कि उसे हर हाल जिया जाए। जीवन के इस दर्शन को पर्दे पर बेहद शानदार तरीके से उतारा गया है “102 नॉट आउट” में। ठहाकों और उल्लास के सूत्र में पिरोई गई कहानी इतनी रवाँ है कि कहीं कोई गाँठ दिखाई ही नहीं देती।
अमिताभ बच्चन और ऋषि कपूर की लाजवाब जुगलबंदी ने अभिनय का उम्दा उदाहरण प्रस्तुत किया है। संवाद अपने नयेपन के साथ अभिनेताओं की टाइमिंग से दोगुने प्रभावी बन गए हैं।
बुढ़ापे में ज़िन्दगी से भरे रहने का संदेश देती यह फ़िल्म जीवन की कठिनाइयों से परास्त मनुष्यों के लिए ग्लूकोज़ की तरह है। फ़िल्म का सबसे ख़ूबसूरत पक्ष है इसके संवादों की सहजता। 102 वर्ष की आयु में अमिताभ बच्चन बोलते हैं कि “मैं मरने के सख़्त ख़िलाफ़ हूँ, मैं अपनी ज़िंदगी में आज तक कभी नहीं मरा।” …जीवन का इतना बड़ा दर्शन एक ठहाके के साथ घटित हो जाता है। मनुष्य अपनी मृत्यु को भी सेलिब्रेट कर सकता है। वह मृत्यु के बाद भी अपने होने का आभास करा सकता है। और वह चाहे तो जीते जी मर भी सकता है।
अकेलेपन और संबंधों की त्रासदी झेल रहे लोगों के लिए यह फ़िल्म मरहम की तरह है। “औलाद जब नालायक निकल जाए तो उसका बचपन याद करना चाहिए।” -इस निचोड़ को बेहद ख़ूबसूरती से कहानी में बुना गया है। भावनात्मक शोषण से ठगे गए लोगों के लिए अपने आप को आज़ाद कराने का नुस्ख़ा है इस सिनेमा में। फ़िल्म में लाइन स्केच के मर्जर से दृश्यों का परिवर्तन एक सफल प्रयोग कहा जा सकता है।
अमित जी के जीवंत अभिनय पर कहीं कहीं ऋषि दा का वैविध्यपूर्ण अभिनय भारी पड़ा है। जिमित त्रिवेदी ने भी अपना क़िरदार बेहतरीन निभाया है।
दत्तात्रेय वखारिया और बाबूलाल वखारिया के शांति निवास में ज़िन्दगी जीने के दो अलग अलग तरीक़ों का लुत्फ़ लीजिये और अश्लीलता, फूहड़ता, कानफोड़ू संगीत, गाली-गलौज और विदेशी लोकेशन्स के दम पर फिल्में बनाते बॉलीवुड में सौम्य जोशी के एक नाटक पर आधारित इस साफ-सुथरी फ़िल्म का स्वागत कीजिये।

✍️ चिराग़ जैन

उत्सव के मधुघट

पीड़ा के सागर मंथन से
उत्सव के मधुघट पाएंगे
चाहे कण्ठ रुंधा हो फिर भी
हम जीवन भर मुस्काएँगे

यादों के जलते छालों पर
भावों का मरहम धर देंगे
जीवन के उघड़े घावों में
शब्दों की हल्दी भर देंगे
सरगम के छू लेने भर से
ग़म के फोड़े भर जाएंगे
चाहे कण्ठ रुंधा हो फिर भी
हम जीवन भर मुस्काएँगे

हालातों का गर्जन होगा
चिंता की बिजली कौंधेगी
शंका के तूफ़ान उठेंगे
आंधी सपनों को रौंदेगी
फिर भी धरती मुस्काएगी
नभ में मेघ अगर छाएंगे
चाहे कण्ठ रुंधा हो फिर भी
हम जीवन भर मुस्काएँगे

आँसू से धुलकर मुस्कानें
शायद और निखर जाएँगी
सूरज जलकर बुझ जाएगा
फिर भी भोर सँवर जाएँगी
पतझर के मारे ठूंठों पर
वासंती मौसम आएंगे
चाहे कण्ठ रुंधा हो फिर भी
हम जीवन भर मुस्काएँगे

गीत रचेंगी भीगी पलकें
अधरों का विस्तार बढ़ेगा
अन्तस् पिघलेगा पीड़ा से
मुस्कानों से प्यार बढ़ेगा
गाते-गाते जीने वाले
हँसते-हँसते मर जाएंगे
चाहे कण्ठ रुंधा हो फिर भी
हम जीवन भर मुस्काएँगे

✍️ चिराग़ जैन

ऐश और आराम

ऐश की ज़िंदगी जीने की लालसा है तो आराम को त्यागना ही होगा। ऐश और आराम परस्पर विरोधी परिस्थितियां हैं।

✍️ चिराग़ जैन

समय-चक्र

सदा कसा ही नहीं रहेगा, जीवन पर कष्टों का फंदा
सूरज तेरी यही रौशनी, ठंडी करके देगा चंदा

रिश्तों के अपनेपन का भी, पीड़ा रूप बदल जाती है
जिनके बिन जीवन मुश्किल था, उनकी संगत खल जाती है
जितना तेज़ तपेगा सूरज, उतना अधिक मेह बरसेगा
जितना ज्यादा विरह सहेंगे, उतना गहन नेह बरसेगा
पत्थर छैनी सहकर पुजता, लकड़ी झेल रही है रंदा
सूरज तेरी यही रौशनी, ठंडी करके देगा चंदा

शनि की महादशा झेली है, अब कष्टों से डरना कैसा
सपनों को मरते देखा है, इससे बढ़कर मरना कैसा
अंतर्दशा बदलने से ही, मन के पत्थर घुल जाते हैं
लग्न कुण्डली नहीं बदलती, लेकिन गोचर खुल जाते हैं
हर क्षण रूप बदलता रहता, ये किस्मत का गोरखधंधा
सूरज तेरी यही रौशनी, ठंडी करके देगा चंदा

जिसको भी अमरत्व मिलेगा, वह जग को नश्वर मानेगा
जिसको विष पीना आता है, उसको जग ईश्वर मानेगा
रावण हँसता है लंका में, राम बिलखते सिया विरह में
कंस राजसुख भोग रहा है, कृष्ण जन्मते बंदीगृह में
सारा जीवन कष्ट सहे जो, नाम उसी का आनंदकंदा
सूरज तेरी यही रौशनी, ठंडी करके देगा चंदा

✍️ चिराग़ जैन

error: Content is protected !!