Chirag Jain Writings, Ghazal, Koi Yoon Hi Nahin Chubhta, Poetry
दिल भी है इक ख़ूबसूरत से इदारे की तरह
लोग आते-जाते हैं, पानी के धारे की तरह
जब से ये संसार सारा हो गया है आसमां
तब से है इन्सानियत टूटे सितारे की तरह
चल सको तो तुम किसी के बन के उसके संग चलो
वरना इक दिन छूट जाओगे सहारे की तरह
दिल के रिश्तों को फ़रेबी उंगलियों से मत छुओ
जुड़ नहीं पाते, बिखर जाते हैं पारे की तरह
ज़िन्दगी तुम बिन भी यूँ तो ख़ूबसूरत झील थी
तुम मगर इस झील में उतरे शिकारे की तरह
आपका चेहरा भी मीठी ईद-सा ख़ुशरंग है
खिलखिलाहट चांद-तारे के नज़ारे की तरह
एक अरसा साथ रहकर भी पराए ही रहे
तुम समन्दर की तरह थे, हम किनारे की तरह
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Ghazal, Koi Yoon Hi Nahin Chubhta, Poetry
धूप में निखरोगे मेरी छाँव में जल जाओगे
इक पहेली हूँ, कहाँ तुम ढूंढने हल जाओगे
बर्फ़-सी ठंडक तो उसकी बात में होगी मगर
छू लिया जिस पल उसे उस पल ही तुम जल जाओगे
विषधरों के दंश का संकट भी झेलोगे ज़रूर
जब कभी लेने किसी जंगल से संदल जाओगे
धूप बनकर तुम दलानों में पसरते हो मगर
जब दरख्तों के तले आओगे तो ढल जाओगे
या तो तुम हमसे कोई रिश्ता रखोगे ही नहीं
या ज़माने की तरह तुम भी हमें छल जाओगे
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Doha, Koi Yoon Hi Nahin Chubhta, Poetry
तलवे याद न रख सकें, मिट्टी का अहसास
इतना ऊँचा मत रखो सपनों का आकाश
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Do Misron Ke Beech, Doha, Poetry
बात यहीं से हो शुरू, और यहीं हो बन्द
जीवन को कुछ यूँ जियो, जैसे दोहा छन्द
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Free Verse, Koi Yoon Hi Nahin Chubhta, Poetry
अन्तस् की पावन भोगभूमि
और मानस की पवित्र भावभूमि पर बसी
अधरों की सौम्यता।
लोचनयुगल में अनवरत प्रवाहमान
विश्वास की पारदर्शी भागीरथी
अनायास ही छलक पड़ती है
सागरमुक्ता-सी
दन्तपंक्ति के पार्श्व से प्रस्फुटित
निश्छल खिलखिलाहट के साथ।
और इस पल को
शब्दों में बांधने के
निरर्थक प्रयास करके
कसमसाकर रह जाता है शब्दकोश।
अप्रासंगिक लगने लगती हैं
सृष्टि की समस्त लौकिक-पारलौकिक उपमाएँ
क्योंकि
बहुत अन्तर होता है
उपमान और उपमेय में!
✍️ चिराग़ जैन