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धूप में निखरोगे मेरी छाँव में जल जाओगे
इक पहेली हूँ, कहाँ तुम ढूंढने हल जाओगे

बर्फ़-सी ठंडक तो उसकी बात में होगी मगर
छू लिया जिस पल उसे उस पल ही तुम जल जाओगे

विषधरों के दंश का संकट भी झेलोगे ज़रूर
जब कभी लेने किसी जंगल से संदल जाओगे

धूप बनकर तुम दलानों में पसरते हो मगर
जब दरख्तों के तले आओगे तो ढल जाओगे

या तो तुम हमसे कोई रिश्ता रखोगे ही नहीं
या ज़माने की तरह तुम भी हमें छल जाओगे

✍️ चिराग़ जैन

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