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तू भी सब-सा निकला

जो जितना भी सच्चा निकला
वो उतना ही तनहा निकला

सुख के छोटे-से क़तरे में
ग़म का पूरा दरिया निकला

कुछ के वरक़ ज़रा महंगे थे
माल सभी का हल्का निकला

मैंने तुझको ख़ुद-सा समझा
लेकिन तू भी सब-सा निकला

कौन यहाँ कह पाया सब कुछ
कम ही निकला जितना निकला

✍️ चिराग़ जैन

तुम महान हो

बीज ने वृक्ष से कहा-
“तुम महान हो”

वृक्ष ने उत्तर दिया-
“वृक्ष होने से पहले
मैं भी तुम जैसा ही था
जैसे तुम अब हो
मैं भी पहले ऐसा ही था”

…सुनकर
बीज धरती में गड़ गया
मिट्टी का एक आवरण उस पर चढ़ गया

फिर एक दिन
उसकी सीमाओं का खोल टूटा
उसमें से एक कोमल अंकुर फूटा
धूप-पानी पाकर
धीरे-धीरे वो अंकुर बड़ा हो गया
और एक दिन
मुस्कुराते हुए
वृक्ष के समकक्ष खड़ा हो गया

मनुष्य ने ईश्वर से कहा-
“तुम महान हो”
ईश्वर ने उत्तर दिया-
“ईश्वर होने से पहले
मैं भी तुम जैसा ही था
जैसे तुम अब हो
मैं भी पहले ऐसा ही था”

…सुनकर
मनुष्य इस सीधी-सादी बात के
गूढ़ अर्थ बूझने लगा
और जब कुछ नहीं सूझा
तो ईश्वर को पूजने लगा

✍️ चिराग़ जैन

हादसा थी ज़िन्दगी

हादसा थी ज़िन्दगी, होता रहा जो उम्र भर
दौलते-लमहात थी, खोता रहा जो उम्र भर

कौन समझे उसके अश्क़ों की ढलकती दास्तां
बस दरख़तों से लिपट, रोता रहा जो उम्र भर

अब तो कलियों से भी उसकी पीठ क़तराने लगी
पत्थरों को गुल समझ ढोता रहा जो उम्र भर

इक न इक दिन उसका घर अश्क़ों में डूबेगा ज़रूर
सबके आंगन में हँसी बोता रहा जो उम्र भर

मौत को देखा तो वो भी कसमसा कर रो दिया
ज़िन्दगी को बोझ-सा ढोता रहा जो उम्र भर

मौत ने आकर जगाया तो सुबककर रो पड़ा
ऑंख में सपने लिए सोता रहा जो उम्र भर

मौत जब आई तो मौक़ा देखते ही बेहिचक
उड़ गया पिंजरे में इक तोता रहा जो उम्र भर

✍️ चिराग़ जैन

नज़रिया

मुझे इन्सान चारों ओर नज़र आता है
अक्स अपना ही तो हर ओर नज़र आता है
ये दुनिया शायद आइनों की इक इमारत है
तुझे हर शख्स यहाँ चोर नज़र आता है

✍️ चिराग़ जैन

सूरज

फिर अंधेरा निगल गया सूरज
फिर चिराग़ों को खल गया सूरज

चंद पहरों की ज़िन्दगानी में
कितने चेह्रे बदल गया सूरज

गर हुआ ऑंख से ज़रा ओझल
लोग कहते हैं ढल गया सूरज

रात गहराई तो समझ आया
सारी दुनिया को छल गया सूरज

आज फिर रोज़ की तरह डूबा
कैसे कह दूँ सँभल गया सूरज

✍️ चिराग़ जैन

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