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मैं जी उठा

सूर्य जब-जब ले के अंगड़ाई उठा
पूजने सब चल पड़े थाली उठा

मुस्कुराकर आपने देखा मुझे
और कुछ ऐसा हुआ मैं जी उठा

क्या पता किस चांद के दीदार को
कब लहर की शक्ल में पानी उठा

सांझ ढलते ही हुआ सूरज निढाल
चांद पीकर रोशनी उसकी उठा

सोच अपनी सोच को कुछ इस तरह
लफ़्ज़ से हटकर नए मानी उठा

या तो तू सबकी तरह से बात कर
या फिर अपनी बात से आंधी उठा

✍️ चिराग़ जैन

मानव की तस्वीर

पंक्ति अक्षर-शरों भरी तूणीर दिखाई देती है
दर्द भरे दिल में दुनिया की पीर दिखाई देती है
हास्य कहो या व्यंग्य कहो, शृंगार कहो या शौर्य कहो
हर कविता में मानव की तस्वीर दिखाई देती है

✍️ चिराग़ जैन

तमन्ना

है तमन्ना यही प्यार जीता रहे
सबका जीवन गुनाहों से रीता रहे
भावना सब के दिल में यही जन्म ले
दुख मैं पीता रहूँ सुख तू पीता रहे

✍️ चिराग़ जैन

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