स्वीकार
बरसों से बरसते हैं अब क्या असर करेंगे
बेबस ये बसेरे हैं कैसे बसर करेंगे
रुकती है नज़र जाकर चूते हुए छप्पर पे
छप्पर को भी गिरा दो खुलकर सबर करेंगे
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Do Misron Ke Beech, Muktak, Poetry
बरसों से बरसते हैं अब क्या असर करेंगे
बेबस ये बसेरे हैं कैसे बसर करेंगे
रुकती है नज़र जाकर चूते हुए छप्पर पे
छप्पर को भी गिरा दो खुलकर सबर करेंगे
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Do Misron Ke Beech, Ghazal, Poetry
फिर अंधेरा निगल गया सूरज
फिर चिराग़ों को खल गया सूरज
चंद पहरों की ज़िन्दगानी में
कितने चेह्रे बदल गया सूरज
गर हुआ ऑंख से ज़रा ओझल
लोग कहते हैं ढल गया सूरज
रात गहराई तो समझ आया
सारी दुनिया को छल गया सूरज
आज फिर रोज़ की तरह डूबा
कैसे कह दूँ सँभल गया सूरज
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Do Misron Ke Beech, Ghazal, Poetry
मिरी आँखों का मंज़र देख लेना
फिर इक पल को समन्दर देख लेना
सफ़र की मुश्क़िलें रोकेंगी लेकिन
पलटकर इक दफ़ा घर देख लेना
किसी को बेवफ़ा कहने से पहले
ज़रा मेरा मुक़द्दर देख लेना
बहुत तेज़ी से बदलेगा ज़माना
कभी दो पल ठहरकर देख लेना
हमेशा को ज़ुदा होने के पल में
घड़ी भर ऑंख भरकर देख लेना
मिरी बातों में राहें बोलती हैं
मिरी राहों पे चलकर देख लेना
न पूछो मुझसे कैसी है बुलन्दी
मैं जब लौटूँ मिरे पर देख लेना
मुझे बेताब कितना कर गया है
किसी का आह भरकर देख लेना
ज़माने की नज़र में भी हवस थी
तुम्हें भी तो मिरे परदे खले ना
मिरे दुश्मन के हाथों फैसला है
क़लम होगा मिरा सर देख लेना
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Ghazal, Koi Yoon Hi Nahin Chubhta, Poetry
दिल भी है इक ख़ूबसूरत से इदारे की तरह
लोग आते-जाते हैं, पानी के धारे की तरह
जब से ये संसार सारा हो गया है आसमां
तब से है इन्सानियत टूटे सितारे की तरह
चल सको तो तुम किसी के बन के उसके संग चलो
वरना इक दिन छूट जाओगे सहारे की तरह
दिल के रिश्तों को फ़रेबी उंगलियों से मत छुओ
जुड़ नहीं पाते, बिखर जाते हैं पारे की तरह
ज़िन्दगी तुम बिन भी यूँ तो ख़ूबसूरत झील थी
तुम मगर इस झील में उतरे शिकारे की तरह
आपका चेहरा भी मीठी ईद-सा ख़ुशरंग है
खिलखिलाहट चांद-तारे के नज़ारे की तरह
एक अरसा साथ रहकर भी पराए ही रहे
तुम समन्दर की तरह थे, हम किनारे की तरह
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Ghazal, Koi Yoon Hi Nahin Chubhta, Poetry
धूप में निखरोगे मेरी छाँव में जल जाओगे
इक पहेली हूँ, कहाँ तुम ढूंढने हल जाओगे
बर्फ़-सी ठंडक तो उसकी बात में होगी मगर
छू लिया जिस पल उसे उस पल ही तुम जल जाओगे
विषधरों के दंश का संकट भी झेलोगे ज़रूर
जब कभी लेने किसी जंगल से संदल जाओगे
धूप बनकर तुम दलानों में पसरते हो मगर
जब दरख्तों के तले आओगे तो ढल जाओगे
या तो तुम हमसे कोई रिश्ता रखोगे ही नहीं
या ज़माने की तरह तुम भी हमें छल जाओगे
✍️ चिराग़ जैन