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जो है वही कहना

किसी भी चोट को सहना बड़ा दुश्वार होता है
जु़बां हो और चुप रहना बड़ा दुश्वार होता है
ये माना दर्द को अभिव्यक्त करना भी ज़रूरी है
मगर जो है वही कहना बड़ा दुश्वार होता है

✍️ चिराग़ जैन

कल की छोड़ो, कल का क्या है

ऐसा मत सोचो कि जब सब सोचेंगे तब सोचेंगे
पहले हम सोचेंगे तब ही तो इक दिन सब सोचेंगे

आख़िर बंदूकों से ही जब सारे काम निकलने हैं
आयत रटने से क्या हासिल अहले-मक़तब सोचेंगे

दो और दो को पाँच बनाने की तरक़ीबें क्या होंगीं
इस उलझन का हल कुर्सी पर बैठे साहब सोचेंगे

आज जिन्हें मीठी लगती हैं, मेरी कड़वी बातें भी
कल वो मीठी बातों के भी कड़वे मतलब सोचेंगे

कल की चिन्ताओं पर अपना आज निछावर क्या करना
कल की छोड़ो, कल का क्या है, आएगा तब सोचेंगे

✍️ चिराग़ जैन

क़ुसूर

सज़ाओं में मैं रियायत का तलबदार नहीं
क़ुसूरवार हूँ कोई गुनाह्गार नहीं
मैं जानता हूँ कि मेरा क़ुसूर कितना है
मुझे किसी के फ़ैसले का इंतज़ार नहीं

✍️ चिराग़ जैन

दुःख

वाह के मज़मों में
अक्सर मौज़ूद होती है आह भी।
जैसे बहुत कुछ पा लेने पर भी
नहीं मिट पाती है कसक
कुछ खो जाने की।

दुःख जन्मता है
ख़ुशियों की कुक्षि से
कदाचित् यही सिद्ध करने के लिये
जलती हैं खलिहानों में रखी फ़सलें
फटते हैं धरती पर उतरते अंतरिक्ष-यान
मरते हैं जवान बेटे
फुँकते हैं बसे हुए घर
और छीन ली जाती है
घास की रोटी भी
भूखे बच्चों की उंगलियों से।

दुःख फैला है
धरती के कण-कण में
अविनाशी-सा
विराट, अरूपी, अमूर्त, अनवरत
अंधियारे-सा
सूनसान सन्नाटे की तरह
क्षितिज के छोर तक
सागर के तल पर झिलमिलाती
सूरज की किरण के समान
विशाल, अखण्ड और अनुपयोगी भी।

दुःख महसूस होता है
हृदय को प्रताड़ित करता
एक अनजाना-अनकहा एहसास
जो उभर आता है
अक़्सर सुख के बीच
सुन्दर कन्या के गाल पर
मुँहासे की तरह।

दुःख अमर्यादित है
शायद इसीलिये नहीं बंध पाता
शब्दों की मर्यादा में
क्योंकि दुःख है
सिर्फ़ एक एहसास
जिसे नकारना असम्भव है
…सुख की तरह

✍️ चिराग़ जैन

दुश्मनों के सर

काली अमावस का अंधेरा होम करने को,
दीवाली के दीप सामधेनी बन जाएंगे
पीड़ा वाली ज्वालाएँ जहाँ प्रचण्ड होंगी, वहाँ
शांति-धार बरसाने प्रेम-घन जाएंगे
बलिदान हुए यदि कहीं तेरे लाडले तो
अरथी सजाने केसरी-सुमन जाएंगे
पर यदि तलवार चली रणबाँकुरों की,
शत्रुओं के शीश तेरी ही शरण आएंगे

चाहे कितने भी हथियार वे बटोर लाएँ,
लूट नहीं सकते हैं तेरी आन-बान माँ
बार-बार तूने घूँट कड़वे पिए हैं पर
अब नहीं करना पड़ेगा विषपान माँ
ऑंख भी उठाई यदि पापियों ने तेरी ओर,
कम पड़ जाएंगे कफ़न वाले थान माँ
दुष्ट असुरों का सर्वनाश करने के लिए
परमाणु-बमों का करेंगे संधान माँ

लाज तेरे पावन किरीट की बचाने हेतु
कर में किरिच औ त्रिशूल धर लेंगे हम
चामरों की सौम्य पवन का जिन्हें ज्ञान नहीं,
उन्हें समझाने को प्रलय-समर देंगे हम
अब नहीं तृषित रहेगी देवी रणचंडी,
शत्रुओं के श्रोणित से घट भर देंगे हम
सुमनों की क्या बिसात; माता भेंट में तू आज
मांग के तो देख दुश्मनों के सर देंगे हम

✍️ चिराग़ जैन

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