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कितनी मुहब्बतें

नोएडा से एक फोन आया। फोन करनेवाला व्यक्ति स्वयं पॉजिटिव होकर अपने डेढ़ साल के बच्चे के साथ घर पर क़ैद था और उसकी पत्नी अस्पताल में कोविड से लड़ रही थी। बीमारी, चिंता, नन्हें बच्चे का लालन-पालन, अर्द्धांगिनी का रोग, अर्थ, अभाव…!
उस दिन मन बहुत उदास था। मदद की गुहार बढ़ती जा रही थीं और समाधान के स्रोत निचुड़ते जा रहे थे। अंधाधुंध फॉरवर्ड की समस्या के कारण अधिकतर नम्बर बन्द हो गए थे। न जाने कौन से डर के कारण प्लाज़्मा डोनर्स घर से निकलने को तैयार नहीं हो रहे थे। ऑक्सीजन भरनेवाले जो नम्बर्स हमारे पास थे वहाँ धीरे-धीरे निराशा छाने लगी थी। इस बीच कुछ नयी समस्याएँ भी सामने आने लगी थीं। कहीं किसी गाँव में कोई कोरोना पीड़ित परिवार ऑक्सिमीटर नहीं जुटा पा रहा था, तो कहीं किसी शहर में कोई ऑक्सीजन कन्सन्ट्रेटर होते हुए भी उसे ऑपरेट नहीं कर पा रहा था।
समस्याओं का वेग बढ़ने लगे और समाधान का द्वार खुल न पा रहा हो तो हिम्मत का बांध डगमगाने लगता है। ऐसी ही मनोदशा में मैंने एक आखि़री कोशिश के रूप में अपनी फेसबुक पर यह अपील की कि जो भी व्यक्ति, जिस भी क्षेत्र में, जो भी सहायता करने में सक्षम हो; वह मुझे इनबॉक्स में सम्पर्क करे। अपील पोस्ट करने के शुरुआती कुछ घण्टों में केवल इक्का-दुक्का मेसेज ही आए, लेकिन ये एकाध मेसेज मेरे टूटे मन को मज़बूती देने के लिये पर्याप्त थे। छत्तीसगढ़ से एक सज्जन ने बताया कि वे कोविड से गुज़रकर स्वस्थ हो चुके हैं लेकिन चाहते हैं कि उनका ऑक्सिमीटर किसी के काम आ जाए। एकाएक यह संदेश सामान्य लग सकता है, लेकिन इसे पढ़कर मुझे एहसास हुआ कि इस संक्रमण की त्रासदी से निकला परिवार यदि इतना आत्मविश्वास जुटा पाया है कि अब उसे ऑक्सिमीटर की ज़रूरत नहीं पड़ेगी; यदि वह स्वयं समस्या से निकलकर दूसरे परिवारों की इस मूलभूत समस्या का विचार कर सकता है तो इस देश में सद्भाव और आत्मविश्वास की फसल लहलहाने में अधिक समय शेष नहीं है।
वायरस के आतंक के बावजूद अगर कोई इतनी हिम्मत कर पा रहा है कि वह अपने शहर में किसी की भूख मिटाने जाना चाहता है, तो इस बात के लिए आश्वस्त हुआ जा सकता है कि स्वार्थ की परत के नीचे पनप रहा करुणा का अंकुर फूट आया है।
अपने घर में हुई मौत को भूलकर भी अगर कोई किसी की साँसों के लिए ‘कुछ सहायता’ करने के लिए हमसे जुड़ने की पेशकश करता है तो इस बात की आश्वस्ति होती है कि किसी भी परिस्थिति में नैराश्य का वायरस इस मुल्क को संक्रमित नहीं कर सकेगा।
बस ये सब संदेश मेरा मानसिक उपचार कर गए। मेरी निराशा हवा हो गयी। भीतर कोई क्रांति घटित हुई, जिसने एक तरफ़ अपील की प्रतिक्रिया में प्राप्त हो रहे संदेशों को व्यवस्थित करना शुरू किया, दूसरी तरफ़ ज़रूरतमंद लोगों के संदेशों की सूची बनाई। और एक बार फिर मददगारों तथा ज़रूरतमंदों के बीच समन्वय में जुट गया।
आज किसी ने मेरे फेसबुक पर टिप्पणी की कि ये दौर समाप्त होने के बाद वह एक पीपल का पेड़ लगाएगा, उसकी देखभाल करेगा और उसका नाम रखेगा ‘चिराग़’।
मुझे अहमद फ़राज़ साहब का एक शेर याद आ गया-

और ‘फ़राज़’ चाहियें कितनी मुहब्बतें तुझे
माओं ने तेरे नाम पर बच्चों के नाम रख दिये

✍️ चिराग़ जैन

मददगारों के नाम पाती

सद्भावना युक्त मित्रो!
कोरोना की इस महामारी में आपके प्रयास स्तुत्य हैं। आपकी नीयत पर भी कोई संदेह नहीं है, लेकिन किसी को भी मदद भेजने से पहले कृपया निम्न बातों का ध्यान रखें-
1) संकट में फँसे व्यक्ति को केवल वही जानकारी भेजें, जिसकी आपकी टीम ने पिछले 24 घण्टे के भीतर स्वयं पड़ताल की है।
2) सोशल मीडिया पर चल रहे किसी भी फॉरवर्ड सन्देश को अग्रेषित करने से बचें, क्योंकि इन्हीं संदेशों की वायरल क्षमता का लाभ उठाकर ठग और मुनाफाखोर अपना काम कर रहे हैं।
3) यदि हर व्यक्ति स्वयं वेरिफाई करेगा तो वह नम्बर रेस्पॉन्स करना बंद कर देगा इसलिए इसके लिए अपनी टीम में एक व्यक्ति नियुक्त करें।
4) मरीज़ के साथ जीवन के लिए जूझ रहे लोग घबराए हुए हो सकते हैं, ऐसे में अपने विवेक को बचाए रखना आपकी ज़िम्मेदारी है। उनके रुदन से द्रवित होकर उतावलेपन में उन्हें अपुष्ट जानकारी भेजने की ग़लती न करें। उन्हें कहें कि आप अपने प्रयास जारी रखें, कोई कन्फर्म लीड मिलते ही आप उन्हें कॉल करेंगे।
5) अगर किसी अस्पताल की वैकेंसी के बारे में आपको जानकारी नहीं है तो भी किसी को उस अस्पताल का विकल्प बताते समय यह अवश्य बताएँ कि वहाँ क्या-क्या सुविधाएँ उपलब्ध हैं।
6) चिकित्सा करना आपके अधिकार क्षेत्र में नहीं है, इसलिए किसी के लाख बार कहने पर भी किसी को कोई चिकित्सकीय सलाह न दें। बल्कि उसके लिए फोन पर कोई डॉक्टर उपलब्ध कराने का प्रयास करें।
7) सोशल मीडिया पर कोई लीड पोस्ट न करें। जिसे आवश्यकता हो उसे वेरिफाइड लीड इनबॉक्स में ही दें।
8) अपेक्षित सहायता पहुँचने के बाद अपने सोशल मीडिया हैंडल से उसकी अपील डिलीट करना न भूलें। यह बेहद आवश्यक है।
9) यदि आप किसी को कोई मदद करने की स्थिति में नहीं हैं तो उसको मना करना सीखें।
10) जो व्यक्ति आपको अपुष्ट फारवर्ड भेज रहा है उसे ऐसा करने के लिए मना करें।

बिना देखे, सौ मील का सफ़र तय करने से बेहतर है कि देखकर दस क़दम चला जाए।
✍️ चिराग़ जैन

कोविड डायरी

अगर नल और नील सेतु-निर्माण में क्रेडिट-गेम खेलते रहे, तो सीता माता की प्रतीक्षा पथरा जाएगी!
जब सारी सेना थक जाये तब भी तलवार न छोड़नेवाला योद्धा ही याद रखा जाता है!
✍️ चिराग़ जैन

दीपकों के लिए तेल बनो, हवा नहीं

परसों रात से ही ऐसे फोन आने लगे थे कि मरीज़ अस्पताल में तो एडमिट है लेकिन ऑक्सीजन न होने के कारण अस्पताल वालों ने बैड ख़ाली करने को कह दिया है। सुनकर दिल दहल गया। जिसे साँस ठीक से नहीं आ रही, वह अस्पताल से भी निकाल दिया गया तो कहाँ जाएगा! ऐसे मरीज़ों की मदद के लिये अस्पतालों में फोन करवाए तो डॉक्टर और अस्पताल प्रशासन के लोग रोते-बिलखते मिले। उनका कहना है कि जब हमारे पास ऑक्सीजन ख़त्म हो रही है तो हम मरीज़ को यहाँ रखकर क्या करें। वेंटिलेटर हैं, लेकिन उन्हें ऑपरेट करने वाले टेक्नीशियन नहीं हैं। जिन छोटे-छोटे नर्सिंग होम में मरीज़ भरे हुए हैं, वे सामान्यतया विज़िटिंग डॉक्टर्स के बेस पर बने हुए हैं और अब उनमें मरीज़ तो हैं लेकिन डॉक्टर्स की कमी है।
मरीज़ों के परिजन जब विकल हो जाते हैं तो उनका ग़ुस्सा डॉक्टर और अस्पताल प्रशासन पर उतरता है। विवशता ने इतना अमानवीय बना दिया है कि अस्पताल के बाहर पड़ा रोगी इंतज़ार कर रहा है कि भीतर किसी की साँसें रुक जाएँ तो मुझे बैड मिले!
इन परिस्थितियों में स्वयं को खड़ा करके सोचा तो डॉक्टर्स पर नाराज़ होते परिजन भी ग़लत नहीं लगे; मरीज़ के आगे लाचार खड़े डॉक्टर भी अपनी जगह किसी हद्द तक सही लगे; और अस्पताल के बाहर किसी के मरने की प्रतीक्षा करता रोगी भी पूरी तरह ग़लत नहीं लगा।
फिर ग़लत है कौन? इस सबका दोषी है कौन? राजनैतिक या कार्यपालिका के स्तर पर किसी से पूछो तो वह हमें ‘पब्लिक एडमिनिस्ट्रेशन’ का पाठ्यक्रम पढ़ाने लगता है। उसका फोकस समस्या का समाधान ढूंढने से ज़्यादा इस बात पर होता है कि इस समस्या का ठीकरा उसके सिर न फूट जाए। इन चारित्रिक दरिद्रों की स्थिति देखकर मेरा साधारण-सा प्रश्न यह है कि जब अभी तक यही स्पष्ट नहीं हो पाया है कि इस सिस्टम में किस काम के लिए उत्तरदायी कौन होगा, तो पिछले सात-आठ दशक से यह सिस्टम का भौंडा नाटक क्यों चल रहा था?
पूरे तंत्र में हर अधिकारी केवल अपनी टेबल से फाइल को किसी अन्य की टेबल पर स्थानांतरित करने का ‘काम’ कर रहा है।
बाढ़ आने के बाद पुल बनाने का ड्रामा सिस्टम के लिए शर्मनाक है। लेकिन जो गाँववाले बाढ़ आने के बाद बेतरतीबी से ही सही, डूबतों को बचाने के लिए दौड़ पड़ते हैं; वे स्तुत्य होते हैं। हमारे समाज में भी इस समय ऐसे लोगों की उपस्थिति है, जो ख़ुद घुटनों-घुटनों पानी में खड़े होकर किसी डूबते को बचाने के लिए हाथ बढ़ा रहे हैं। लेकिन हमारे समाज में ऐसे भी लोग मौजूद हैं जो इन हाथ बढ़ाते लोगों के पाँव डगमगाने के लिए प्रयासरत हैं।
कालाबाज़ारी और मुनाफाखोरी से ग्रसित इस समाज में यदि कोई सहृदय व्यक्ति किसी समस्या और समाधान के मध्य सेतु बनते हुए किसी का लिंक किसी पीड़ित को फॉरवर्ड कर देता है, और दुर्भाग्य से वह फोरवार्डिड लिंक किसी मुनाफाखोर का निकलता है तो इसमें उस व्यक्ति की क्या ग़लती है, जो लिंक फॉरवर्ड कर रहा है। लेकिन इस स्थिति में हमारा सिस्टम बड़ी जल्दी एक्टिव होने लगता है। वह असली मुनाफाखोर को पकड़ने से पहले इस बेचारे संवेदनशील व्यक्ति को ज़रूर धर दबोचेगा। ऐसा मैं नहीं कह रहा, ऐसा वे लोग बता रहे हैं जो सहायता करनेवालों के हौसले पस्त करना चाहते हैं।
सड़ांध मारते इस सिस्टम में अपराध करना आसान है लेकिन किसी की मदद करना बेहद मुश्किल है। ‘तू ज़्यादा समाजसेवी बन रहा है’; ‘दूसरों के फटे में टांग मत फँसा’; ‘फटी के ढोल ख़रीदे हैं तो बजाने तो पड़ेंगे’ और ‘अपने घर में चुपचाप बैठ, घणी नेतागिरी मत कर’ जैसे जुमलों ने सामाजिक परोपकार की भावना को नपुंसक करने का काम अनवरत किया है। हमारे घरों में भी इन जुमलों से प्रभावित अभिभावकों की पूरी पीढ़ी सक्रिय है।
सामाजिक मदद के लिए आगे बढ़नेवाले का उपहास गली-नुक्कड़ों से लेकर बन्द कमरों तक हर जगह स्थान पा लेता है। हमारे थाने और कचहरियाँ तो इन लोगों के जज़्बे को भौंथरा करने के लिए निर्मित ही किये गए हैं। गांधी, बिनोवा और भगतसिंह के देश में यदि जनसेवा की निष्काम भावना के साथ यही व्यवहार होता रहा तो स्वयं को ‘जनसेवक’ कहकर सत्ता हथियानेवालों के हाथ समाज बार-बार ऐसे ही छला जाता रहेगा कि जिन अस्पतालों में ज़िन्दगी को साँस मिलनी चाहिए थी, वे ख़ुद ऑक्सीजन के अभाव में दम तोड़ने लगेंगे और जिन डॉक्टरों की आँखों में तैरता आत्मविश्वास मरीज़ों के परिजनों को हौसला देता था, वे डॉक्टर ख़ुद आँखों में आँसू भरकर अपनी लाचारी का प्रेस्क्रिप्शन लिखते दिखाई देंगे।
एक बात साफ़ समझनी होगी कि जो मरहम लगाने वाले के मरहम को मिर्च कहकर भ्रांति फैला रहा है, उसकी अपनी चुटकी में मरहम तो दूर, मिर्च भी नहीं मिलेगी।

✍️ चिराग़ जैन

विवेक का दामन न छोड़ें

कोविड के कारण स्थितियाँ निश्चित रूप से विकट हैं, किंतु इस समय में आपको और हमको अधिक उत्तरदायित्व तथा विवेक के साथ आचरण करने की आवश्यकता है। कुछ बातों का सब लोग ध्यान रखें तो स्थिति सामान्य होने में मदद मिलेगी –
1) यदि घर में कोई रुग्ण हो तो उसका ऑक्सीजन लेवल और तापमान मापते रहें, जब तक ऑक्सीजन लेवल 94 से नीचे न होवे तब तक घबराकर अस्पताल भागने से बचें।
2) किसी अप्रिय स्थिति के अंदेशे में दवाइयाँ और ऑक्सीजन सिलेंडर स्टॉक करके न रखें, यह आचरण शेष लोगों के लिए जानलेवा सिद्ध हो रहा है।
3) किसी भी स्थिति में कोविड सम्बन्धी कोई भी जानकारी सार्वजनिक करने से पूर्व उसकी पुष्टि अवश्य करें। एक ग़लत सूचना दर्जनों लोगों का समय नष्ट करके उन्हें मौत के मुँह में पहुँचा सकती है।
4) कोई भी उपयोगी फोन नम्बर सार्वजनिक करने की बजाय वह नम्बर ज़रूरतमंद को इनबॉक्स में दें, अन्यथा अनावश्यक कॉल अटैंड करके लोग परेशान हुए जा रहे हैं।
5) पैनिक न क्रिएट करें, किसी भी चुनौती में धैर्य तथा विवेक से ही समाधान निकल सकेगा। हड़बड़ाहट में काम बनने की बजाय बिगड़ते ही हैं।
6) डॉक्टर्स और अस्पतालों पर भरोसा करें। सामान्यतया कोई डॉक्टर जान-बूझकर अपने किसी मरीज़ को बचाने में कोई कसर नहीं छोड़ता। किन्तु यह भी ध्यान रखें कि डॉक्टर भी अंततः इंसान ही है। इसलिए ग़लती और अपराध के बीच अंतर करने की क्षमता विकसित करें।
आपका विवेक ही इस दौर का पहला उपचार है।

✍️ चिराग़ जैन

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