Chirag Jain Writings, Geet, Poetry, Unpublished Geet
सबकी नज़र पीर से सूखी, मेरी नज़र ख़ुशी से नम है
जिसको सबने घाव कहा है, वह नवजीवन का उद्गम है
क्या सोचा था, शाख कटेगी तो मैं माली को कोसूंगा
जो छिल-छिलकर क़लम बन गयी, मैं उस डाली को कोसूंगा
जिसके दम पर पूरा गुलशन स्वस्थ रहा है, पुष्ट रहा है
क्या सोचा था, इस गुलशन की उस रखवाली को कोसूंगा
कीचड़, मिट्टी, काँट-छँटाई -यह सब उपवन का अनुक्रम है
जिसको सबने घाव कहा है, वह नवजीवन का उद्गम है
खुरपी का संयोग मिले तो पौधा कुछ कुम्हला जाता है
लेकिन खुरपी के ही हाथों मधुबन में यौवन आता है
जिसकी जड़ ने ज़ख़्म सहे हैं, उसकी फुनगी आली होगी
जो परती से प्रेम करेगा, उस पर क्या ख़ुशहाली होगी
जिस पौधे ने जितना झेला, वह उतना ही सुंदरतम है
जिसको सबने घाव कहा है, वह नवजीवन का उद्गम है
‘इससे पहले’, ‘इसके पीछे’ – बस इस पल का खेल यही था
पीछे का सब सार यही था, आगे का सब मेल यही था
क्या मैं भी इस पल से डरकर माली पर कुछ प्रश्न उठाता
क्या मैं भी कण जैसा होकर, विधिना को कुछ ढंग सिखाता
आधा उगना, दुगुना उगना, यह सब कितना मनभावन है
जिसको सबने घाव कहा है, वह नवजीवन का उद्गम है
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Geet, Poetry, Unpublished Geet
ऐसा लगता था सब राहें
अब इसके आगे धूमिल हैं
जो भी है, जितनी भी है; बस
यह ही जीवन की मन्ज़िल है
लेकिन घबराकर हिम्मत की हत्या करना ठीक नहीं था
जब तक मौत नहीं आ जाती, तब तक मरना ठीक नहीं था
जाने कौन घड़ी, अगले पल जीवन को लाचार बना दे
जाने कौन घड़ी, पल भर में हर भय का उपचार बना दे
हर धड़कन रुक-कर चलती थी, हर आहट मन को छलती थी
दिल पिघला-पिघला जाता था, आँखें रह रहकर गलती थीं
पर जितने हालात डराएं, उतना डरना ठीक नहीं था
जब तक मौत नहीं आ जाती, तब तक मरना ठीक नहीं था
केवल दो राहें बाक़ी थीं, जूझें; या हथियार गिरा दें
या उम्मीदों को पोषण दें, या डरकर हर दीप बुझा दे
देहरी चढ़कर हार खड़ी थी, अपशकुनों की बरसातें थीं
मेरी और मेरे अपनों की हर धड़कन पर आघातें थीं
ऐसे समय किसी चेहरे का रंग उतरना ठीक नहीं था
जब तक मौत नहीं आ जाती, तब तक मरना ठीक नहीं था
यदि सब कुछ निर्धारित है, तो धड़कन बढ़ने से क्या होता
यदि सब बदला जा सकता है तो फिर डरने से क्या होता
अपना प्रसव स्वयं करना था, कोई और विकल्प नहीं था
हर इक नस में चीर-फाड़ थी, भय पल भर भी अल्प नहीं था
पीड़ा से अपने ही मन को विचलित करना ठीक नहीं था
जब तक मौत नहीं आ जाती, तब तक मरना ठीक नहीं था
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Geet, Poetry, Unpublished Geet
अब तक पथ पर फूल बिछे थे
नयन लुभावन चित्र खिंचे थे
अब इक कंकड़ चुभ जाने से, मैं रस्ते को दोष न दूंगा
जिस क्यारी को हाथ लगाया,
उसमें फूल खिले; क्या कम है?
जिस पगडण्डी को अपनाया,
उस पर मीत मिले; क्या कम है?
रेले-मेले, खेल-तमाशे, उत्सव के पल पाये यहाँ से
अब कुछ सन्नाटा छाने से, मैं रस्ते को दोष न दूंगा
झोली भरकर सुख पाया है
चुटकी भर दुःख पर क्या रोना
इस दुःख से सँवरेगा शायद
जीवन का इक सूना कोना
वटवृक्षों की छाँव मिली है, हर धारा पर नाव मिली है
सीने तक पानी आने से, मैं रस्ते को दोष न दूंगा
मेरा काम सफ़र करना है
पथ का निर्धारण उसका है
मैं अपना किरदार जिऊंगा
बाक़ी निर्देशन उसका है
शिखरों को छूने की इच्छा इन राहों ने पूरी की है
थोड़ी साँसें चढ़ जाने से
मैं रस्ते को दोष न दूंगा
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Diary, Ek Adad Kirdar, Prose
दिल में काफी बड़ा घोटाला पकड़ा गया है। जिस विभाग को शरीर में ख़ून वितरित करने का उत्तरदायित्व दिया गया था, वह पिछले 36 वर्ष से कुछ रक्त बचाकर दिल के भीतर फेंकता रहा है। इस भ्रष्टाचार की वजह से दिल का पूरा तंत्र कमज़ोर होता रहा और अब वह अपनी क्षमता का एक-चौथाई काम ही कर पा रहा है।
जाँच कमेटी ने उक्त विभाग को बदल देने की कड़ी सिफ़ारिश की है। काफ़ी देर तक पड़ताल के बाद जाँचकर्ताओं को पता चला कि दिल बड़ा है। यह सुनकर मुझे हँसी आ गयी। छोटा रहा होता, तो कविता कैसे लिख पाता!
बहरहाल, ज़िन्दगी ने मुझे यह अवसर दिया है कि अपना दिल चीर के दिखा सकूँ। देख लेना, कुछ नहीं निकलेगा इसमें। फिर मैं डंके की चोट कह सकूंगा कि मैं कोई बात दिल में नहीं रखता।
✍️ चिराग़ जैन
Chintan ke Swar, Chirag Jain Writings, Free Verse, Poetry
बचपन में
मेरी मजबूरियों ने
मुझसे कुछ सपने छीनकर
फेंक दिये थे
ज़मीन पर
कुछ समय तक
देखता रहा मैं उन्हें
दूर से ही
फिर उन पर
चढ़ गयीं कई परतें
…व्यस्तताओं की
…समय की
…और बेख्याली की
मुझे लगा
कि समा गये हैं
वे सब सपने
क़ब्र में।
लेकिन मैं ग़लत था
बीते कुछ दिन से
मेरे मन के ठीक नीचे
कुछ हलचल सी
महसूस होती थी
मैंने अपनी व्यस्तता की
परत हटाकर देखा
तो वे सब सपने
गहरे तक
फैला चुके थे अपनी जड़ें
विराट हो चुका था उनका स्वरूप
जिसे मैं क़ब्र समझ रहा था
वह क्यारी निकली
और जिन्हें मैं देह समझता रहा
वे बीज निकले।
✍️ चिराग़ जैन