+91 8090904560 chiragblog@gmail.com

दिल की डायरी

दिल में काफी बड़ा घोटाला पकड़ा गया है। जिस विभाग को शरीर में ख़ून वितरित करने का उत्तरदायित्व दिया गया था, वह पिछले 36 वर्ष से कुछ रक्त बचाकर दिल के भीतर फेंकता रहा है। इस भ्रष्टाचार की वजह से दिल का पूरा तंत्र कमज़ोर होता रहा और अब वह अपनी क्षमता का एक-चौथाई काम ही कर पा रहा है।
जाँच कमेटी ने उक्त विभाग को बदल देने की कड़ी सिफ़ारिश की है। काफ़ी देर तक पड़ताल के बाद जाँचकर्ताओं को पता चला कि दिल बड़ा है। यह सुनकर मुझे हँसी आ गयी। छोटा रहा होता, तो कविता कैसे लिख पाता!
बहरहाल, ज़िन्दगी ने मुझे यह अवसर दिया है कि अपना दिल चीर के दिखा सकूँ। देख लेना, कुछ नहीं निकलेगा इसमें। फिर मैं डंके की चोट कह सकूंगा कि मैं कोई बात दिल में नहीं रखता।
✍️ चिराग़ जैन

सपने कभी नहीं मरते

बचपन में
मेरी मजबूरियों ने
मुझसे कुछ सपने छीनकर
फेंक दिये थे
ज़मीन पर

कुछ समय तक
देखता रहा मैं उन्हें
दूर से ही

फिर उन पर
चढ़ गयीं कई परतें
…व्यस्तताओं की
…समय की
…और बेख्याली की

मुझे लगा
कि समा गये हैं
वे सब सपने
क़ब्र में।

लेकिन मैं ग़लत था
बीते कुछ दिन से
मेरे मन के ठीक नीचे
कुछ हलचल सी
महसूस होती थी

मैंने अपनी व्यस्तता की
परत हटाकर देखा
तो वे सब सपने
गहरे तक
फैला चुके थे अपनी जड़ें
विराट हो चुका था उनका स्वरूप

जिसे मैं क़ब्र समझ रहा था
वह क्यारी निकली
और जिन्हें मैं देह समझता रहा
वे बीज निकले।

✍️ चिराग़ जैन

कितनी मुहब्बतें

नोएडा से एक फोन आया। फोन करनेवाला व्यक्ति स्वयं पॉजिटिव होकर अपने डेढ़ साल के बच्चे के साथ घर पर क़ैद था और उसकी पत्नी अस्पताल में कोविड से लड़ रही थी। बीमारी, चिंता, नन्हें बच्चे का लालन-पालन, अर्द्धांगिनी का रोग, अर्थ, अभाव…!
उस दिन मन बहुत उदास था। मदद की गुहार बढ़ती जा रही थीं और समाधान के स्रोत निचुड़ते जा रहे थे। अंधाधुंध फॉरवर्ड की समस्या के कारण अधिकतर नम्बर बन्द हो गए थे। न जाने कौन से डर के कारण प्लाज़्मा डोनर्स घर से निकलने को तैयार नहीं हो रहे थे। ऑक्सीजन भरनेवाले जो नम्बर्स हमारे पास थे वहाँ धीरे-धीरे निराशा छाने लगी थी। इस बीच कुछ नयी समस्याएँ भी सामने आने लगी थीं। कहीं किसी गाँव में कोई कोरोना पीड़ित परिवार ऑक्सिमीटर नहीं जुटा पा रहा था, तो कहीं किसी शहर में कोई ऑक्सीजन कन्सन्ट्रेटर होते हुए भी उसे ऑपरेट नहीं कर पा रहा था।
समस्याओं का वेग बढ़ने लगे और समाधान का द्वार खुल न पा रहा हो तो हिम्मत का बांध डगमगाने लगता है। ऐसी ही मनोदशा में मैंने एक आखि़री कोशिश के रूप में अपनी फेसबुक पर यह अपील की कि जो भी व्यक्ति, जिस भी क्षेत्र में, जो भी सहायता करने में सक्षम हो; वह मुझे इनबॉक्स में सम्पर्क करे। अपील पोस्ट करने के शुरुआती कुछ घण्टों में केवल इक्का-दुक्का मेसेज ही आए, लेकिन ये एकाध मेसेज मेरे टूटे मन को मज़बूती देने के लिये पर्याप्त थे। छत्तीसगढ़ से एक सज्जन ने बताया कि वे कोविड से गुज़रकर स्वस्थ हो चुके हैं लेकिन चाहते हैं कि उनका ऑक्सिमीटर किसी के काम आ जाए। एकाएक यह संदेश सामान्य लग सकता है, लेकिन इसे पढ़कर मुझे एहसास हुआ कि इस संक्रमण की त्रासदी से निकला परिवार यदि इतना आत्मविश्वास जुटा पाया है कि अब उसे ऑक्सिमीटर की ज़रूरत नहीं पड़ेगी; यदि वह स्वयं समस्या से निकलकर दूसरे परिवारों की इस मूलभूत समस्या का विचार कर सकता है तो इस देश में सद्भाव और आत्मविश्वास की फसल लहलहाने में अधिक समय शेष नहीं है।
वायरस के आतंक के बावजूद अगर कोई इतनी हिम्मत कर पा रहा है कि वह अपने शहर में किसी की भूख मिटाने जाना चाहता है, तो इस बात के लिए आश्वस्त हुआ जा सकता है कि स्वार्थ की परत के नीचे पनप रहा करुणा का अंकुर फूट आया है।
अपने घर में हुई मौत को भूलकर भी अगर कोई किसी की साँसों के लिए ‘कुछ सहायता’ करने के लिए हमसे जुड़ने की पेशकश करता है तो इस बात की आश्वस्ति होती है कि किसी भी परिस्थिति में नैराश्य का वायरस इस मुल्क को संक्रमित नहीं कर सकेगा।
बस ये सब संदेश मेरा मानसिक उपचार कर गए। मेरी निराशा हवा हो गयी। भीतर कोई क्रांति घटित हुई, जिसने एक तरफ़ अपील की प्रतिक्रिया में प्राप्त हो रहे संदेशों को व्यवस्थित करना शुरू किया, दूसरी तरफ़ ज़रूरतमंद लोगों के संदेशों की सूची बनाई। और एक बार फिर मददगारों तथा ज़रूरतमंदों के बीच समन्वय में जुट गया।
आज किसी ने मेरे फेसबुक पर टिप्पणी की कि ये दौर समाप्त होने के बाद वह एक पीपल का पेड़ लगाएगा, उसकी देखभाल करेगा और उसका नाम रखेगा ‘चिराग़’।
मुझे अहमद फ़राज़ साहब का एक शेर याद आ गया-

और ‘फ़राज़’ चाहियें कितनी मुहब्बतें तुझे
माओं ने तेरे नाम पर बच्चों के नाम रख दिये

✍️ चिराग़ जैन

मददगारों के नाम पाती

सद्भावना युक्त मित्रो!
कोरोना की इस महामारी में आपके प्रयास स्तुत्य हैं। आपकी नीयत पर भी कोई संदेह नहीं है, लेकिन किसी को भी मदद भेजने से पहले कृपया निम्न बातों का ध्यान रखें-
1) संकट में फँसे व्यक्ति को केवल वही जानकारी भेजें, जिसकी आपकी टीम ने पिछले 24 घण्टे के भीतर स्वयं पड़ताल की है।
2) सोशल मीडिया पर चल रहे किसी भी फॉरवर्ड सन्देश को अग्रेषित करने से बचें, क्योंकि इन्हीं संदेशों की वायरल क्षमता का लाभ उठाकर ठग और मुनाफाखोर अपना काम कर रहे हैं।
3) यदि हर व्यक्ति स्वयं वेरिफाई करेगा तो वह नम्बर रेस्पॉन्स करना बंद कर देगा इसलिए इसके लिए अपनी टीम में एक व्यक्ति नियुक्त करें।
4) मरीज़ के साथ जीवन के लिए जूझ रहे लोग घबराए हुए हो सकते हैं, ऐसे में अपने विवेक को बचाए रखना आपकी ज़िम्मेदारी है। उनके रुदन से द्रवित होकर उतावलेपन में उन्हें अपुष्ट जानकारी भेजने की ग़लती न करें। उन्हें कहें कि आप अपने प्रयास जारी रखें, कोई कन्फर्म लीड मिलते ही आप उन्हें कॉल करेंगे।
5) अगर किसी अस्पताल की वैकेंसी के बारे में आपको जानकारी नहीं है तो भी किसी को उस अस्पताल का विकल्प बताते समय यह अवश्य बताएँ कि वहाँ क्या-क्या सुविधाएँ उपलब्ध हैं।
6) चिकित्सा करना आपके अधिकार क्षेत्र में नहीं है, इसलिए किसी के लाख बार कहने पर भी किसी को कोई चिकित्सकीय सलाह न दें। बल्कि उसके लिए फोन पर कोई डॉक्टर उपलब्ध कराने का प्रयास करें।
7) सोशल मीडिया पर कोई लीड पोस्ट न करें। जिसे आवश्यकता हो उसे वेरिफाइड लीड इनबॉक्स में ही दें।
8) अपेक्षित सहायता पहुँचने के बाद अपने सोशल मीडिया हैंडल से उसकी अपील डिलीट करना न भूलें। यह बेहद आवश्यक है।
9) यदि आप किसी को कोई मदद करने की स्थिति में नहीं हैं तो उसको मना करना सीखें।
10) जो व्यक्ति आपको अपुष्ट फारवर्ड भेज रहा है उसे ऐसा करने के लिए मना करें।

बिना देखे, सौ मील का सफ़र तय करने से बेहतर है कि देखकर दस क़दम चला जाए।
✍️ चिराग़ जैन

कोविड डायरी

अगर नल और नील सेतु-निर्माण में क्रेडिट-गेम खेलते रहे, तो सीता माता की प्रतीक्षा पथरा जाएगी!
जब सारी सेना थक जाये तब भी तलवार न छोड़नेवाला योद्धा ही याद रखा जाता है!
✍️ चिराग़ जैन

error: Content is protected !!