Chirag Jain Writings, Geet, Poetry, Unpublished Geet
शोर-शराबे में भी दिल की धड़कन सुन लेता हूँ
यूँ कविता बुन लेता हूँ
इस दुनिया के छोटे-छोटे हिस्से घूम रहे हैं
लोग नहीं हैं, दो पैरों पर किस्से घूम रहे हैं
होंठों पर मुस्कान दिखी, मस्तक ग़मगीन दिखे हैं
हर चेहरे को पढ़कर देखो, कितने सीन लिखे हैं
इस सारी सामग्री में से मोती चुन लेता हूँ
यूँ कविता बुन लेता हूँ, यूँ कविता बुन लेता हूँ
देह भले ठहरी है लेकिन मन में चहल-पहल है
मौन धरा है अधरों पर और भीतर कोलाहल है
जिन आँखों में झाँका, उनमें ही संवाद भरा है
जो जितना चुप, उसमें उतना अनहद नाद भरा है
इस सरगम से मैं अपने गीतों की धुन लेता हूँ
यूँ कविता बुन लेता हूँ, यूँ कविता बुन लेता हूँ
मीठी यादों के तकिये पर सिर रखकर सोती है
मन पिघले तो दो आँखों की कोरों को धोती है
ठिठकी हुई खड़ी मिलती है किसी नदी के तीरे
कभी स्वयं ही चलकर आती, मुझ तक धीरे-धीरे
दो शब्दों के बीच जड़ी चुप्पी को सुन लेता हूँ
यूँ कविता बुन लेता हूँ, यूँ कविता बुन लेता हूँ
✍️ चिराग़ जैन
Article, Chirag Jain Writings, Prose, Shabdon Ki Kunjgaliyaan
धर्म आत्मबल में वृद्धि करने का साधन है। साधना संहनन को सुदृढ़ करने का अभ्यास है। विपरीत परिस्थितियों में स्वयं को संयत रखने का उपाय ही व्रत है।
जैन आगम का प्रथमानुयोग, जीव के इसी नैतिक विकास का आधार तैयार करता है। प्रथमानुयोग हमें संकट के समय संयत रहने के अवलम्बन प्रदान करता है। जब हम विपत्ति से घिरे हों तब उस विपत्ति का कोई एक उदाहरण मस्तिष्क में कौंध जाए तो विपत्ति छोटी लगने लगती है। यही प्रेरणा मनुष्य के जीवन में कथाओं को उपयोगी बनाती है। यह प्रेरणा न हो तो तमाम कथाएँ राजा-रानी की कहानी की तरह बालक का मन बहलाने का उपकरण मात्र सिद्ध होंगी।
यदि थोड़ा सा विवेक जागृत कर लिया जावे तो शास्त्रों में पढ़ी गईं अनेक कहानियां हमें हमारे परिवेश में साकार होती दिखाई देंगी। जैन आगम की इन कथाओं को जब कभी अपने या अपनों के जीवन में घटित होते देखता हूँ तब-तब मुझे लगता है कि महावीर की प्रासंगिकता सिद्ध हो गयी।
ऐसा अनेक बार होता है कि जब हमारा कोई अपना लोभवश हमसे छल करके हमारा आर्थिक अहित कर रहा होता है। ऐसी स्थिति को जानने के बाद यदि हम उस सम्पत्ति से निर्मोह होकर चल देते हैं तो उस क्षण हम भरत को राज्य सौंप कर वन को जाते हुए बाहुबली सदृश हो जाते हैं।
ऐसा अनेक बार हुआ है कि यदि हमें ज्ञात हो जावे कि हमारी उपस्थिति से किसी महफ़िल का माहौल असहज हो जाएगा तो हम उस अवांछित परिस्थिति को टालने के लिए स्वयं को उस उत्सव से विलग कर लेते हैं। जब हम ऐसा करते हैं तब हम अपने अवचेतन में विद्यमान नेमिनाथ से प्रेरणा प्राप्त कर रहे होते हैं जिन्होंने स्वयं को हिंसा का कारण बनते देख उस उत्सव का ही परित्याग कर दिया जो उनके लिए संयोजित किया गया था।
कोई हमें परेशान किये जा रहा है और हम उसके उपद्रव पर ध्यान न देकर अपने कार्य में एकाग्रचित्त रह पाएं तो उस समय हमारा व्यक्तित्व कमठ का उपसर्ग झेलते पार्श्वनाथ से प्रेरणा पा रहा होता है। हमें मिली ख़राब चीज़ को भी यदि हम सँवार कर उपयोगी बना लेने का हौसला रखते हैं तो हम मैनासुन्दरी के किरदार को जीवंत कर देते हैं।
सेठ सुदर्शन, मुनि मानतुंग, मुनि सुखमाल, अंजनबाला, राजुल, अकलंक, निकलंक, सुकौशल मुनि, सनतकुमार मुनि, अकम्पनाचार्य और श्रीपाल जैसे दर्जनों चरित्र हमारे अवचेतन में विद्यमान हैं। जिन परिस्थितियों में ये सब उल्लेखनीय बन गए, उन्हीं परिस्थितियों में ये सब सामान्य भी सिद्ध हो सकते थे। ये सब कथाएँ हमें यह प्रेरणा प्रदान करती हैं कि अनुकूल परिस्थितियों में धर्म पालन करने से कोई विशेष नहीं होता। आपका उल्लेख तब किया जाता है जब आप प्रतिकूल परिस्थितियों में धर्म का पालन कर सकें।
हाल ही में मुझे शल्य चिकित्सा की प्रक्रिया से गुज़रना पड़ा। जब मुझे ऑपरेशन थियेटर में ले जाया जा रहा था उस समय मुझे यह विचार आया कि घर पर हर रोज़ समाधि मरण और बारह भावना की ऑडियो सीडी बजती है। यदि इस क्षण मैंने इन दोनों काव्यकृतियों में वर्णित उदाहरणों का चिंतन नहीं किया, यदि इस क्षण में मैं विकल हो गया तो बरसों से सुनी जा रही इन महनीय रचनाओं की महत्ता खण्डित होगी। फिर इनका श्रवण मधुर संगीत से अधिक उपयोगी सिद्ध न हो सकेगा। …जब तक एनेस्थीसिया ने मुझे पूर्णतया अवचेत न कर दिया तब तक मैं अनेक उदाहरण देते हुए लगातार स्वयं से यह प्रश्न पूछ रहा था कि – “तुमरे जिये कौन दुःख है?”
इस एक प्रश्न ने मेरे मन को उस भय से बचाए रखा, जो ऑपरेशन से पूर्व किसी को हो सकता है। यूँ भी देह और विदेह के पृथकत्व के लिए वह क्षण सर्वाधिक उपयुक्त है, जब आप स्वयं उस बिंदु पर खड़े हों। अन्यथा धर्म चर्चा परानुभूति के प्रवचन से अधिक कुछ नहीं है।
मैं पग-पग पर इन चरित्रों से प्रेरणा प्राप्त करता हूँ। सर्दी लगी तो दिगम्बरत्व का ध्यान कर लिया। गर्मी लगी तो सिर पर जलती सिगड़ी को भूलकर साधनारत रहे मुनि का स्मरण हो आया। परिवेश के व्यवधान किसी कार्य में विघ्न बनने लगे तो ध्यानमग्न बाहुबली के हाथ-पैरों पर लिपटी लताएँ ध्यान आ गयीं। अपने भाग्य पर क्रोध आया तो बेड़ियों में बंधी चंदनबाला ने हौसला दिया।
कुल मिलाकर जीवन की स्लेट पर अनुभव ने जो इबारत लिखी है उसमें उन सब कथाओं का उजाला है, जो बचपन से लेकर अब तक आगम के प्रथम सोपान पर पढ़ी-सुनी हैं। कुल मिलाकर हम सबके जीवन में धर्म बार-बार अवसर लेकर आता है कि हमें उल्लेखनीय बनाया जा सके। कुल मिलाकर आत्मबल और विवेक के अभाव में हम उल्लेखनीय हो जाने के प्रत्येक अवसर पर सामान्य हो जाना सरल समझते हैं। कुल मिलाकर परिस्थितियों से जूझने में आगम को स्मरण रखने वाले लोग, आगम को नियमित रूपेण पूजने वाले लोगों से अधिक सम्यकदृष्टि हैं।
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Do Misron Ke Beech, Muktak, Poetry
अगर इंसान बनकर आए तो इंसान बोलेगा
ज़ुबां मिसरी सरीखी मीर का दीवान बोलेगा
अगर हैवानियत लेकर इधर आए तो फिर सुन लो
शिवाजी की ज़ुबां में सारा हिंदुस्तान बोलेगा
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Geet, Poetry, Unpublished Geet
जो प्रतीक्षा आँख में शबरी बसाए जी रही है
वह प्रतीक्षा राम के भी पाँव में निश्चित मिलेगी
धूप जैसी जिस विकलता को सुदामा ने जिया है
वह विकलता द्वारिका की छाँव में निश्चित मिलेगी
जो महल तक आ गयी होगी युगों का न्याय लेने
वह किसी वन में सिसकती इक शिला की आह होगी
जो युगों पहले घटे अन्याय के हित वन गयी है
वह किसी के मौन से पनपी कोई परवाह होगी
एक घटना जो नगर में कंकरी सी चुभ रही है
वह अहल्या के अछूते गाँव में निश्चित मिलेगी
द्रौपदी के चीर में बस द्रौपदी की लाज है क्या
उस अभागे वस्त्र के भीतर समूचा युग ढँका है
चीर लेकर जब स्वयं श्रीकृष्ण दौड़े हस्तिनापुर
तब मुरारी ने जगत् के ध्वंस पर अंकुश रखा है
जो घृणा सबको दिखाई दी सती के आँसुओं में
वह घृणा उस द्यूत के हर दाँव में निश्चित मिलेगी
हर कथानक में कथा का दूसरा आयाम भी है
सिर्फ़ राधा ही नहीं व्याकुल, विकल घनश्याम भी है
अपहृता होकर नहीं पीड़ित अकेली जानकी ही
प्रेम और दायित्व के घावों से पीड़ित राम भी है
धार का अस्तित्व जिस जल पर रहा निर्भर हमेशा
बस उसी जल पर पराश्रित नाव भी निश्चित मिलेगी
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Diary, Ek Adad Kirdar, Prose
अपने रोग का संज्ञान होने से लेकर अब तक की यात्रा में जो कुछ जीवन सीखने का अवसर मिला, उसके लिए यह सारा कष्ट बड़ा मोल नहीं है। पहली बार पता लगा कि लोगों की धूर्तता ही नहीं, बल्कि उनकी सहृदयता पर भी एक आवरण चढ़ा होता है, जो ऐसे ही समय में अनावृत होता है।
मोर्चे पर खड़े सिपाही को दुनिया बिल्कुल अलग रंग की दिखने लगती है। उसके लिए लोगों की मान्यता के अर्थ बदल जाते हैं। और लोगों की भी उसके प्रति धारणाएँ बदल जाती हैं।
मैंने पिछले एक महीने में इन अनुभूतियों को गहरे तक महसूस किया है। दुःख-सुख, अच्छे-बुरे, नैतिक-अनैतिक के आकलन से परे सब कुछ आश्चर्यबोध से युक्त था। पीड़ा का उद्वेग मन को सतह से कुछ नीचे अवश्य ले जाता है; बस इसी स्थान पर सतह की मरीचिका अदृश्य होने लगती है। इस स्थान पर पहुँचकर जब सतह पर किसी को सतही आचरण करते देखो तो उसके कलापों को देखकर क्षोभ नहीं, आनंद होता है।
एक छोटा-मोटा सा तुरीयावस्था योगी मन के भीतर बैठा ‘तमाशा-ए-अहले-करम’ देखता रहता है। उसे पता है कि दुआ और ढिंढोरे का कोई आपसी मेल नहीं है। वह समझता है कि भीगी हुई कोरों के होंठों का रंग मुस्कानी होता है। वह जानता है कि ‘जल्दी आ जा यार’ जैसा वाक्य बोलते हुए मुस्कुराहट कितना सारा दर्द एक साथ छिपा लेती है।
उस रात, जब मुझे ऑपरेशन थियेटर में ले जाया जा रहा था तब मैं यह समझ पा रहा था कि यहाँ से कहानी आगे न बढ़ी तो इसी को इतिश्री मानना होगा। यद्यपि एक रात पहले एंजियोग्राफी में ऐसा ही ऑपरेशन थियेटर देख चुका था लेकिन फिर भी उस रात का एहसास थोड़ा विशेष था।
कुछ डॉक्टर्स मुझे पहचानने लगे थे, सो ऑपरेशन की तैयारियों के दौरान वहीं एक डॉक्टर ने दिनकर की रश्मिरथी शुरू कर दी। मैंने भी ऑपरेशन टेबल पर लेटे-लेते छोटा-मोटा काव्यपाठ किया।
अचानक दाहिने हाथ में थोड़ा मोटा इंजेक्शन लगने जैसा अनुभव हुआ और उसके बाद मुझे सुनाई दिया कि कोई मेरे गाल पर चपत लगाकर ‘चिराग़ जैन… चिराग़ जैन’ बोल रहा था। मेरी आँखें न खुल सकीं थीं लेकिन मैं महसूस कर पा रहा था कि मेरी नाक और गले में से नलियाँ गयी हुई हैं, मुझे बहुत भयंकर प्यास लगी है और कोई बेचैन होकर मुझसे मेरा नाम पूछ रहा है। ढेर सारी ऊर्जा बटोरकर मैंने अपना नाम बताया तो पूछनेवाले के स्वर में हर्ष घुल गया।
उसने मुझसे पूछा- ‘तुम्हें कुछ याद है?’ …मैंने कुछ शास्त्रीय कविताओं के अंश दोहराकर स्वयं को आश्वस्त किया।
उसने कहा, ग्रेट। ऑपरेशन बढ़िया हुआ। अब हम वेंटिलेटर निकालेंगे। थोड़ा दर्द होगा, बर्दाश्त करना। जब तक मैं कुछ समझ पाता तब तक उस व्यक्ति ने गले में घुसी हुई नली को अच्छे से हिलाकर बाहर खींच दिया। प्यास से बेचैन कण्ठ में यह घर्षण एक आह में घुटकर रह गया। मैं पानी को तरसता रहा लेकिन तीन-चार घण्टे तक होंठ गीले करने से ज़्यादा पानी मेरे लिए उचित नहीं था।
उस क्षण से अब तक लगातार समझ रहा हूँ कि उस रात रश्मिरथी के पाठ के बाद क्या हुआ होगा। पेट में से चार-पाँच जगह नलियाँ गयी हुई थीं, जो डॉक्टर्स ने एक-एक करके धीरे-धीरे निकालीं। कल जब टाँके काटे गये तो एक बार मोक्ष जैसी अनुभूति हुई। यद्यपि इतने बड़े परिवर्तन को स्वीकार करने में देह को अभी कुछ सप्ताह लगेंगे, लेकिन यह महसूस होने लगा है कि खानपान और मान्यताओं के स्तर पर मैं मैंने एक सविवेक मस्तिष्क के साथ सद्यजात होने का अनुभव पा लिया है।
✍️ चिराग़ जैन