Chirag Jain Writings, Geet, Poetry, Unpublished Geet
पथराए हुए नयन बोले
देहरी बोली, आंगन बोले
फिर राम अयोध्या लौटे हैं
पुलकित होकर जन-जन बोले
साकेत स्वर्ग हो जाएगा, अब रामराज सम्भव होगा
जिसमें जन-जन हो शोकमुक्त, ऐसा समाज सम्भव होगा
अब नहीं कहीं कोई अबला, पत्थर बनकर दिन काटेगी
अब नहीं कहीं कोई रेखा, मानव-मानव को बाँटेगी
शबरी के बेर चखें राघव, फिर ये रिवाज सम्भव होगा
जिसमें जन-जन हो शोकमुक्त, ऐसा समाज सम्भव होगा
जिस धाम चुनौती उपजेगी, उस धाम उपाय निकालेंगे
नल-नील, गिलहरी सब मिलकर, सागर पर सेतु बना लेंगे
अपने सीमित संसाधन से हर कामकाज सम्भव होगा
जिसमें जन-जन हो शोकमुक्त, ऐसा समाज सम्भव होगा
अब कहीं किन्हीं सुग्रीवों के अन्तस् में क्षोभ नहीं होगा
अब युद्ध जीतने वाले को, लंका का लोभ नहीं होगा
अपनी-अपनी मर्यादा में, अब राजकाज सम्भव होगा
जिसमें जन-जन हो शोकमुक्त, ऐसा समाज सम्भव होगा
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Do Misron Ke Beech, Muktak, Poetry
आँखन में कजरा धर राधा ने श्याम के रूप को नैन बसायो
श्याम ने बाँसुरी होंठ लगाय के राधा के होंठों पे साज सजायो
राधा ने श्याम को श्याम ने राधा को होरी की भोरी ही रंग लगायो
देह से देह रही बिरहा पर नेह से नेह नहीं बिसरायो
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Do Misron Ke Beech, Muktak, Poetry
जो जीवन को तीर्थ बना ले तीर्थंकर हो जाता है
क्रोध चढ़े सिर पर तो मानव प्रलयंकर हो जाता है
जग की पीर पचाकर जग का हित कर पाना मुश्किल है
जो विष पीकर भी जीवित हो, वो शंकर हो जाता है
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Do Misron Ke Beech, Muktak, Poetry
सत्ता चाहे जिसकी भी हो, अहम् नहीं स्वीकार प्रजा को
कर्मकांड से कर्मयोग ने पल में लिया उबार प्रजा को
गोकुलवालो छोड़ो छलिया इंद्रदेव का पूजन करना
पर्वत ढोकर ही मिलता है, जीने का अधिकार प्रजा को
सत्ता की मनमानी का करना होगा प्रतिकार प्रजा को
चुप रहने से निर्भरता का होता व्याधि-विकार प्रजा को
श्रमजीवी भी दान-दया का पात्र बने तो युग कोसेगा
कर्म छोड़ कर कृपा निहारे तो सौ-सौ धिक्कार प्रजा को
✍️ चिराग़ जैन
Article, Chirag Jain Writings, Prose, Shabdon Ki Kunjgaliyaan
क्षमावाणी मनुष्य इतिहास का सर्वाधिक वैज्ञानिक पर्व है। यह मनुष्यता के लिए सबसे आवश्यक त्योहार है। ‘क्षमा’ मानव के चरित्र निर्माण का सर्वाधिक प्रबल यंत्र है।
क्षमादान कठिन है किन्तु क्षमायाचना उससे भी अधिक कठिन है। क्षमा करनेवाले के पास कहीं न कहीं बड़प्पन का कोई अहंकार हो सकता है, किंतु क्षमा याचना करनेवाला तो हर अहम् से मुक्त होता है। क्षमा मांगने के लिए अहम् को तिरोहित कर देना अपरिहार्य है। जिसने यह कर लिया वह उत्सव का अनुभव कर सकता है।
‘क्षमा’ – लिखना कठिन है, बोलना और भी कठिन है, अनुभूत करना इससे भी अधिक कठिन है और क्षमा कर पाना सबसे कठिन है। व्यवहारिक धरातल पर जब हम जीवन की चुनौतियों से जूझ रहे होते हैं, उस समय स्थितप्रज्ञ रहकर विपरीत परिस्थितियों में अपनी सहजता को अक्षुण्ण रखना बेहद दूभर होता है। कई बार आपकी क्षमाशीलता को आपकी दुर्बलता समझ कर विपरीत पक्ष आपको प्रतिक्रिया हेतु विवश करता है। ज्ञानी कहते हैं कि सामनेवाला कुछ भी करे, आपको क्षमाशील बने रहना है। किन्तु मेरा मत है कि मनुष्य ने जितने भी संबंध निर्मित किये हैं, उनमें ‘क्षमा’ का संबंध एक ऐसा संबंध है जिसका द्विपक्षीय होना अपरिहार्य है।
यदि दूसरा पक्ष क्षमा के सूत्र में बंधने को तैयार न हो, और हम इकतरफ़ा क्षमा करते रहें तो धीरे-धीरे क्षमा करने वाले व्यक्ति में स्वयं के महान होने का सूक्ष्म अहंकार जन्म लेने लगता है। इसके जन्मते ही वह दूसरे को पहले मूर्ख और फिर तुच्छ समझने लगता है। और आगे बढ़ने पर घृणा जन्म लेती है, और अंततः स्थिति पुनः कटुता की ओर बढ़ जाती है। इसलिए क्षमा के संबंध को साधना है तो इकतरफ़ा निबाह से काम नहीं चल सकता।
साँप के काटने पर अहिंसक रहनेवाले तथागत का उदाहरण हमें याद रखना चाहिए किन्तु सौ गालियाँ देने वाले शिशुपाल का उदाहरण भी हमें नहीं बिसारना चाहिए। यह केवल अपने लिए ही आवश्यक नहीं है, अपितु ‘क्षमाभाव’ के वैभव हेतु भी अपरिहार्य है। यदि थोड़ा-सा ध्यान करेंगे तो हमें ऐसी परिस्थितियों के अनेक उदाहरण अपनी ही ज़िन्दगी के आसपास मिल जाएंगे।
जिस शस्त्र से शत्रु को परास्त करना हो, उसकी साधना और उसकी पड़ताल बेहद आवश्यक हैं। हमने ‘मुआफ़ी‘; ‘सॉरी’; ‘क्षमा’ जैसे शब्दों को इतना बेमआनी बनाकर रख दिया है कि न तो बोलनेवाले को इससे कोई फ़र्क़ पड़ता है, न ही सुननेवाले को।
जैनियों के पर्युषण पर्व इस शब्द को प्राणवान करने की साधना है। दस दिन के ये पर्व अवचेतन तक क्षमा के पहुँचने का मार्ग हैं। पहले दिन क्षमा का अर्थ समझना होता है, उसके बाद मार्दव, आर्जव आदि के माध्यम से चित्त को क्षमा मांगने योग्य बनाया जाता है, तब कहीं जाकर क्षमा ‘वाणी’ में साकार होती है।
एक बार मुख पर क्षमा विराजित हुई कि त्योहार हो गया, एक बार जिव्हा ने क्षमा चख ली तो फिर मन इतना हल्का हो गया कि वह नाच उठा। फिर अलग से ढोल-नगाड़े नहीं बुलाने पड़ते। फिर तो भीतर का संगीत झूम उठता है। जिन ग्रंथियों ने मन को जकड़ रखा था, वे इस एक शब्द की गूँज से विलीन हो गईं।
यह प्रयोग बेहद सार्थक है। यह आपने भी यकीनन कभी न कभी आज़माया ही होगा। यदि न आज़माया होता तो आप आज जीवित न होते। क्षमा के अभाव में जीवित रहना असंभव है। क्षमा के बिना जीवन ऐसे ही है जैसे किसी झल्लीवाले की पीठ पर लगातार बोझा बढ़ता रहे और उसे उतारने का कोई उपाय ही न किया जाए। फिर अधिक देर तक पीठ बोझा उठा न सकेगी। यह तो कमर टूट जाएगी या लकवा मार जाएगा। बोझा उतारा न गया तो झल्लीवाला यकीनन मर जाएगा।
हमारा मानस संसार में खड़ा यही झल्लीवाला है। दिन-प्रतिदिन के व्यावहार में इस पर बोझा बढ़ता जाता है। क्षमा मन का बोझा उतार देने का उपाय है। भीतर सड़ांध मारती ग्रंथियों से मुक्त होकर जीवन की सुवास भोगने का ज़रिया है। यही कारण है क्षमादान उतना आवश्यक नहीं जान पड़ता, जितना आवश्यक क्षमा याचना है।
अपने भीतर जो कचरा भर गया है, उसे कचरा मानने के लिए तैयार होना कठिन है। उसकी पहचान करके यह स्वीकार कर पाना कि हमने अपने भीतर कचरा रख लिया था- यह आसान काम नहीं है। इस मूर्खता के लिए सबसे पहले स्वयं से क्षमा मांगनी पड़ती है। इस विद्रूपता के लिए अपने आप पर हँसना पड़ता है। यह आसान नहीं होता। दूसरे पर हँसना बहुत आसान है, किंतु अपने आप पर हँसना बड़ा श्रमसाध्य काम है। लेकिन इस सोपान के बिना क्षमा का सुख भोगना नामुमकिन होगा।
‘क्षमावाणी’ पर्व के अवसर पर एकांत में बैठकर अपनी ग़लतियों को याद करना। अपने भीतर भरे द्वेष और घृणा के कचरे की पहचान करने का प्रयास करना। जिसके प्रति क्षोभ या अपराध बोध हो, उसके साथ घटित हुई सर्वाधिक कड़वी घटना को याद करना और फिर जिससे मांगनी हो, उसे व्यक्तिगत रूप से संपर्क करके पूरे चैतन्य मन से क्षमा याचना करना। अगर आज भी रेडीमेड क्षमा मांग ली तो यह पर्व निरर्थक रह जाएगा। अगर आज भी प्राणहीन क्षमा कर के रह गए तो पीठ का बोझा न उतर सकेगा। अगर आज भी खोखली औपचारिकता में फँसे रह गए तो मन को निर्ग्रंथ करने का स्वर्णिम अवसर हाथ से जाता रहेगा।
✍️ चिराग़ जैन