Chirag Jain Writings, Geet, Poetry, Unpublished Geet
जिन डेरों ने उत्सव पूरा था रैना के आँचल में
भोर उन्हीं डेरों पर इक वीराना पाती है
अंधियारे में जीवन सबका रंग-रंगीला लगता है
पहली किरण उदासी का अफ़साना पाती है
जिनके बिन हर महफ़िल का सिंगार अधूरा होता है
उन फूलों का गुच्छा सुबह केवल घूरा होता है
जिसके दम पर महफ़िल अपना सिर ऊँचा कर लेती है
वो सब कुछ सुबह होने तक चूरा-चूरा होता है
झूठे रंग उतर जाते हैं रात गुज़रने से पहले
भोर महज सच का बदरंग ख़ज़ाना पाती है
साज पड़े होते हैं लेकिन सुर थक कर सो जाते हैं
देह पड़ी रह जाती है और प्राण कहीं खो जाते हैं
जिनका आकर्षण था उनसे दिल घबराने लगता है
जश्न सुबह की क्यारी में इक सन्नाटा बो जाते हैं
रात जवानी की बाँहों में रास रचाती फिरती है
और सुबह रंगरलियों से उकताना पाती है
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Geet, Poetry, Unpublished Geet
बाग की सब क्यारियों के हाथ पीले हो गए हैं
फूल की हर पाँखुरी के ओंठ गीले हो गए हैं
श्वास में सरगम सजाता साज आया है
लग रहा है द्वार पर ऋतुराज आया है
साँस में बहकी हवाओं का नशा सा घुल रहा है
प्रीति की बारिश हुई है, ज्ञान सारा धुल रहा है
पर्वतों को खुशबुओं ने प्यार से छू भर लिया है
वज्र सा अड़ियल हिमालय भी अभी हिल-डुल रहा है
ज्ञानियों के ज्ञान से मन बाज आया है
लग रहा है द्वार पर ऋतुराज आया है
दल भ्रमर का बूटियों के पास मंडराने लगा है
कोयलों ने गीत गाए, आम बौराने लगा है
ठूठ से लिपटी हुई है एक दीवानी लता तो
बाग का वीरान कोना, बाग कहलाने लगा है
दम्भ होकर प्रेम का मोहताज आया है
लग रहा है द्वार पर ऋतुराज आया है
गुनगुनी सी धूप के संग बेल-बूटों का प्रणय है
प्रेमियों को हर नियम के टूट जाने पर अभय है
ठंड से ठिठुरी धरा अंगड़ाइयां लेने लगी है
श्वेत छितरी बदलियों के बीच सूरज का उदय है
मोतियों के थाल में पुखराज आया है
लग रहा है द्वार पर ऋतुराज आया है
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Ghanakshari, Lapete Mein Netaji, Poetry
बार-बार हारने के बाद भी आखिरकार
राहुल जी जीतने लगे हैं हर चाल में
उन्नीस में थोड़ा देख-भालकर फेंकियेगा
खुद ही न फँस जाओ जुमलों के जाल में
कांग्रेसियों को भी संभलकर चलना है
डूबने न लग जाओ, अगले उछाल में
गाय, गधे, घोड़े छोड़कर अब यह सोचो
ऊँट किस करवट बैठे नए साल में
✍️ चिराग़ जैन
Blank Verse, Chirag Jain Writings, Lapete Mein Netaji, Poetry
दो हज़ार अठारह बीता देकर कितने सारे घाव
कालखंड की चौसर पर ज्यों मौत जीतती जाए दांव
साल अभी प्रारम्भ हुआ था काल दिलों को छील गया
दूर देश में एक हादसा श्रीदेवी को लील गया
अभिनय के घर मातम छाया, इस ग़म की सिसकी थमती
उससे पहले विदा हो गए श्री जयेंद्र जी सरस्वती
अगला सदमा लगा अचानक सूफी की कव्वाली को
विदा किया हमने धरती से प्यारेलाल वडाली को
तभी काव्य की गलियों की ख़ुशियों को पाला मार गया
हिंदी कविता का इक ध्रुवतारा टूटा केदार गया
काल साथ ले चला अचानक शोलों के सहभागी को
काव्य जगत ने खोया अपने बालकवि बैरागी को
इसके बाद कारवां गुज़रा गीतों के जादूगर का
धरती का नीरज बन बैठा अमर सितारा अम्बर का
राजनीति की गलियाँ रोईं दक्षिण के स्वर क्लान्त हुए
चेन्नई की धरती के बेटे करुणानिधि जी शांत हुए
जाने क्या विधि ने ठानी थी, कैसी थी उसकी मर्ज़ी
पाँच दिनों के बाद बिछुड़ गए सोमनाथ जी चटर्जी
ऐसा लगता था ईश्वर ने सारे गौहर बीन लिए
जब निर्मम होकर भारत से अटल बिहारी छीन लिए
एक एक कर हमसे छीने कितने जगमग दीप गए
पत्रकारिता जी भर रोई जब नैयर कुलदीप गए
कड़वे प्रवचन मौन हो गए, ओझल हुआ अमिट आलोक
सारे संत जगत पर छाया संत तरुण सागर का शोक
फिर नारायण दत्त तिवारी, और खुराना लाल मदन
इतने सारे हीरे खोए, घायल है अब अंतर्मन
ये आँसू का साल रहा है अब कोई संघर्ष न हो
ईश्वर से बस यही दुआ है अगला वर्ष हर्ष का हो
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Do Misron Ke Beech, Ghazal, Poetry
इस कलाई को हथेली की छुअन भी दे बहन
हर दफ़ा डाक से राखी नहीं अच्छी लगती
✍️ चिराग़ जैन