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विवशता

चुप-चुप देखती थीं राधिका कन्हैया जी को हौले-हौले उठ रहे शोर से विवश थी साँवरे के पास खींच लाती थी जो बार-बार प्रीत की अनोखी उस डोर से विवश थी इत होरी की उमंग, उत दुनिया से तंग फागुन में गोरी चहुँ ओर से विवश थी लोक-लाज तज भगी चली आई गोकुल में मनवा में उठती हिलोर से...

फागुन की शाम

फागुन की शाम कैसी हवा चली हाय राम जोगियों का दिल धक-धक करने लगा सारी सोच बूझ घास-फूस सी बिखर गई मन को खुमार चकमक करने लगा पीपल का पेड़ सारे पंछियों के संग मिल झूम-झूम मार बक-बक करने लगा और चुपचाप मेरा मानस भी हौले-हौले प्रेम के मृदंग पे धमक करने लगा ✍️ चिराग़...

एक जिल्द में बांध दो

एक संग आकर कहें, कातिक औ’ रमज़ान एक जिल्द में बांध दो, गीता और कुरान ✍️ चिराग़ जैन

परिवर्तन

जब से हम करने लगे बात-बात में जंग तब से फीके पड़ गए त्यौहारों के रंग धुआँ-धुआँ सा रह गया दीपों का त्यौहार शोर-शराबा बन गया होली का हुड़दंग ✍️ चिराग़...

सरस्वती वंदना

जगती को वरदान ये, दीजे माँ वागीश हर इक दीपक को मिले, सूरज से आशीष ✍️ चिराग़ जैन
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