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अजीब सवाल है

हमारे यहाँ एक नया चलन चल पड़ा है कि जैसे ही आप कोई पर्व मनाने लगो तो कुछ लोग उसके लिए तर्कहीन प्रश्न उठाते हैं और दूध में खटाई डालकर स्वयं को लीक से हटकर चलता दिखाने की कोशिश में लग जाते हैं।
कल यही अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के साथ भी हुआ। जब सब लोग महिलाओं की उपलब्धि, महत्व, क्षमता और प्रतिभा की चर्चा कर रहे थे तब सोशल मीडिया पर लीक से हटकर चलने की होड़ में कुछ लोग हर वर्ष की तरह इस बार भी पूछ रहे थे कि महिला दिवस एक ही दिन क्यों?
अजीब सवाल है यार। हम पूरे वर्ष लक्ष्मी की आकांक्षा करते हैं किंतु दिवाली वर्ष में एक दिन ही क्यों आती है? हम पूरे वर्ष स्वतंत्र रहते हैं किंतु स्वतंत्रता दिवस एक ही दिन क्यों मनाते हैं? हम पूरे वर्ष अपनी बहन के प्रति स्नेहसिक्त रहते हैं किंतु रक्षाबंधन एक ही दिन क्यों मनाते हैं? संतति के शुभ के लिए मनाया जाने वाला अहोई अष्टमी और पति के सुख की कामना का पर्व करवा चौथ भी वर्ष में एक ही दिन मनाया जाता है! बेटियों के प्रति शुभेच्छा तो पूरे वर्ष रहती है, फिर हरियाली तीज एक ही दिन क्यों मनाई जाती है?
यह अनावश्यक असंतोष की प्रवृत्ति है, जो विवाद उत्पन्न करके उत्सव के उत्साह को भंग करती है। ऐसे सवाल हिन्दी दिवस पर भी उठते हैं। और जो लोग अपनी फेसबुक पर यह प्रश्न लिखकर स्वयं को क्रांतिकारी समझ रहे होते हैं उन्हें इतना भी भान नहीं है कि यह क्रांति इतनी बार हो चुकी है कि अब इससे प्रभाव नहीं, चिढ़ उत्पन्न होती है।
वर्ष के 365 दिन में से एक पूरा दिन जीवन के किसी एक पक्ष अथवा भाव को समर्पित करना ऐसा ही है, ज्यों लंबे सफ़र पर निकलते हुए पैट्रोल पम्प पर रुकना। गाड़ी पैट्रोल पम्प से ऊर्जा ग्रहण कर सैकड़ों किलोमीटर का सफ़र तय करती है। इस सफ़र में हर क्षण पैट्रोल गाड़ी की गति का कारक भी रहता है। किन्तु सफ़र में हर दस क़दम पर गाड़ी रोककर पैट्रोल का धन्यवाद ज्ञापन नहीं किया जाता।
ये महिला दिवस, ये हिंदी दिवस, ये हरियाली तीज जैसे पर्व वही पैट्रोल पम्प हैं जहाँ रुककर जीवन, किसी सम्बन्ध अथवा जीवनी शक्ति से स्वयं को इतना भर लेता है ताकि उस तत्व के साथ पूरे दमखम के साथ जीवन जिया जा सके।
देह को भोजन की आवश्यकता होती है, अतएव हम दिन में दो-तीन बार डाइनिंग टेबल पर बैठते हैं। अब कोई प्रश्न कर दे कि दस-पंद्रह मिनिट ही क्यों, आप पूरे दिन डाइनिंग टेबल पर क्यों नहीं बैठते? लीक से हटकर चलना हो तो यह विवाद खड़ा करके भोजन का आनन्द धूमिल किया जा सकता है किंतु अंततः इस प्रश्न के लिए ‘मूढ़ता’ से बढ़िया संज्ञा ढूंढ़ पाना असंभव होगा।
हाँ, यदि कोई व्यक्ति अन्न का अपमान करता हो, कोई भोजन को गाली देता हो अथवा दूसरों को भोजन करते देख उन्हें अपशब्द कहता हो तो ऐसे व्यक्ति को एक क्षण भी डायनिंग टेबल पर बैठने का अधिकार नहीं है। ऐसे व्यक्ति को एक कण भी भोजन नहीं मिले इसके लिए वैधानिक व्यवस्था होनी चाहिए। सो ऐसी व्यवस्था हमारे कानून में है। जो व्यक्ति महिलाओं के प्रति आपराधिक सोच रखता हो अथवा महिलाओं के प्रति किसी अपराध में संलग्न हो उसे हमारा न्यायालय दंड देता है।
यदि कहीं किसी महिला के साथ कोई अपराध हुआ हो तो इस हवाले से पूरे विश्व से महिला दिवस का उत्सव तो नहीं छीना जा सकता। किसी महिला ने कोई अपराध कर दिया तो भी महिला दिवस के उत्सव की भर्त्सना करना उचित नहीं हो सकता। किसी भाई ने अपनी बहन की हत्या कर दी, तो पूरे समाज से राखी थोड़े ही छीन ली जाएगी? बल्कि जब-जब रक्षाबंधन का पर्व आएगा तब-तब अपनी बहनों के प्रति किसी विद्वेष से भरे भाइयों के मन का कुछ कलुष धुलेगा ही।
जब-जब हिंदी दिवस आएगा तो सरकारी दफ्तरों में हिंदी में पत्राचार करनेवालों को कुछ नैतिक बल ही मिलेगा। जब-जब महिला दिवस मनाया जाएगा, तब-तब महिलाओं के प्रति रूढ़िवादी, अश्लील अथवा संकुचित सोच रखने वाले लोगों की नज़रें नीची ही होंगी।
साल में 365 दिन यदि बिखर-बिखरकर लोग महिलाओं के महत्व पर लिखेंगे तो वह छितराई हुई फुहार होगी जिससे कुछ विशेष प्रभाव नहीं पड़ेगा, किन्तु जब एक दिन ये सारी फुहारें एक साथ मिलकर बरसती हैं तो सोच पर जमी धूल और समाज में पड़े कचरे को बहा ले जाती हैं, धरती का मन तृप्त कर देती हैं और फिर पूरे बरस धरती पर हरियाली दिखाई देती है।
✍️ चिराग़ जैन

संविधान

धागेनातीनकगधिंन ताल चलती है, पर
सुर सारेगामापाधानीसा में समाय के
नूपुर छनन छन, घनन घनन घण्ट;
मृदंग बजत द्रुम द्रुम द्रुम गाय के
पंचम-निषाद तीव्र-कोमल से रंगे राग,
दुगुन-तिगुन ताल भेद समझाय के
विलग विलग स्वर गान बनते हैं,
जब सब एकरूप होते सम पर आय के

कभी सब त्याग वीतराग निज भान करे,
कभी योग हर रोग का निदान हो गया
कभी बुद्ध, कभी युद्ध, कभी रुद्ध, कभी शुद्ध;
कभी युद्ध जीतने के बाद ज्ञान हो गया
कभी ज्ञानियों का राजधानियों ने मान किया,
कभी प्रेम ज्ञानवान से महान हो गया
विषम-विषम मान्यताओं के समक्ष भी है
सम जो विधान वही संविधान हो गया

✍️ चिराग़ जैन

लॉकडाउन की दिवाली

मार्किट ठंडा
घर-घर मंदा
जेब सभी की ख़ाली है
चारों ओर दिवाला निकला
कैसी आई दिवाली है

कोरोना की दहशत ऐसी अबकी गिफ्ट नहीं आये
इसके डिब्बे उसके घर में होकर शिफ्ट नहीं आये
ख़ूब घुमंतू सोन पापड़ी घर पर बैठी ठाली है
चारों ओर दिवाला निकला
कैसी आई दिवाली है

कोरोना ने लक्ष्मी जी को कैसा क्वारंटाइन किया
धनतेरस के धन्वंतरि ने पूरा सिस्टम जॉइन किया
आतिशबाजी के जलने से पहले जली पराली है
चारों ओर दिवाला निकला
कैसी आई दिवाली है

एनजीटी ने पॉल्यूशन का बढ़ता ग्राफ दिखाया है
फ्यूल कॉस्ट ने महँगाई को रस्ता साफ़ दिखाया है
हेल्थ मिनिस्ट्री ने एक्टिव केसों की लिस्ट निकाली है
चारों ओर दिवाला निकला
कैसी आई दिवाली है
✍️ चिराग़ जैन

नवरात्रि और स्त्री सशक्तिकरण

नवरात्रि पर्व इस बात का प्रमाण है कि स्त्री सशक्तिकरण की अवधारणा का उद्गम सनातन जीवनशैली में ही हुआ। देवी के नवरूप की आराधना के साथ-साथ कन्या पूजन की परंपरा स्त्री की महत्ता को रेखांकित करने हेतु प्रतिष्ठित की गयी होगी। स्त्री को शक्तिस्वरूपा मानने के पीछे भी स्त्री के सशक्तिकरण की ही अवधारणा रही होगी।
किन्तु यह स्त्री, सशक्त होने के लिये उच्छृंखल होने के स्थान पर अपने स्त्रैण गुणों को पोषित करती दिखाई देती है। सशक्त होने के लिये वह पुरुष हो जाने को आतुर नहीं होती। पुरुष से समानता की हठ में वह अपनी स्त्री को बिसार देने की वक़ालत नहीं करती। ‘देेेखरेख’ और ‘रोकटोक’ दो अलग-अलग शब्द हैं। पुरुष को देखरेख की आड़ में अनावश्यक रोकटोक करने की परंपरा छोड़नी होगी और स्त्री को रोकटोक का विरोध करते समय देखरेख का विरोध करने से बचना होगा।
अनुचित के विद्रोह में हथियार तक धारण करनेवाली देवी भी आद्योपांत नारीत्व से परिपूर्ण है। सनातन परम्परा की इस अवधारणा का सामाजिक तथा मनोवैज्ञानिक अध्ययन करने पर आभास होता है कि स्त्री-सशक्तिकरण के समर्थन में इससे अधिक उपयुक्त कोई विचार हो ही नहीं सकता कि स्त्री के भीतर की स्त्री को बलवती किया जाये, न कि उसके भीतर की स्त्री पर किसी पुरुष के प्रति, स्पर्धा थोप दी जाये।
यह पर्व इंगित करता है कि स्त्री रहते हुए सशक्त होना ही स्त्री की वास्तविक विजय है। समाज के सम्यक संतुलन के लिये यह अतीव आवश्यक भी है कि स्त्री को भी अपने स्त्रीत्व के विकास का उतना अवसर अवश्य मिले, जितना पुरुष को उसके पौरुष के विकास का मिलता है। स्त्री को भी अनुचित के प्रतिकार की उतनी ही स्वतंत्रता मिले, जितनी किसी पुरुष को मिलती है।
शक्तिरूपेण संस्थिता देवी से यही प्रार्थना है कि होड़ में सशक्तिकरण ढूंढ़ रहे स्त्री समाज के आत्मबल के विकास का मार्ग प्रशस्त हो ताकि प्रत्येक स्त्री, स्वयं के स्त्री होने पर अभिमान कर सके। यही ‘अभिमान’, स्त्री को अबला सिद्ध करके पनपी कुरीतियों के षड्यंत्र के लिये मारकेश सिद्ध होगा।

✍️ चिराग़ जैन

राममंदिर का शिलान्यास

पथराए हुए नयन बोले
देहरी बोली, आंगन बोले
फिर राम अयोध्या लौटे हैं
पुलकित होकर जन-जन बोले
साकेत स्वर्ग हो जाएगा, अब रामराज सम्भव होगा
जिसमें जन-जन हो शोकमुक्त, ऐसा समाज सम्भव होगा

अब नहीं कहीं कोई अबला, पत्थर बनकर दिन काटेगी
अब नहीं कहीं कोई रेखा, मानव-मानव को बाँटेगी
शबरी के बेर चखें राघव, फिर ये रिवाज सम्भव होगा
जिसमें जन-जन हो शोकमुक्त, ऐसा समाज सम्भव होगा

जिस धाम चुनौती उपजेगी, उस धाम उपाय निकालेंगे
नल-नील, गिलहरी सब मिलकर, सागर पर सेतु बना लेंगे
अपने सीमित संसाधन से हर कामकाज सम्भव होगा
जिसमें जन-जन हो शोकमुक्त, ऐसा समाज सम्भव होगा

अब कहीं किन्हीं सुग्रीवों के अन्तस् में क्षोभ नहीं होगा
अब युद्ध जीतने वाले को, लंका का लोभ नहीं होगा
अपनी-अपनी मर्यादा में, अब राजकाज सम्भव होगा
जिसमें जन-जन हो शोकमुक्त, ऐसा समाज सम्भव होगा

✍️ चिराग़ जैन

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