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अच्छा लगता है

इतनी सारी व्यस्तताओं के बीच
निकाल ही लेता हूँ
कुछ लम्हे
कविता लिखने के लिए।

बहुत सारी
अधलिखी कविताओं को छोड़
चुरा ही लाता हूँ कुछ पल
तुमसे बतियाने के लिए।

अक्सर पूछ बैठता हूँ ख़ुद से
क्या मिलता है मुझे
कविता लिखने से?
क्या हासिल होता है
तुमसे बतियाने से?

अच्छा लगता है
…यही ना!

✍️ चिराग़ जैन

अनुचर

क़लम भी
कुछ कम नहीं है
कुदाल से।

…शायद
कुछ गहरी ही
चोट करती हो।

और यथार्थ
…यथार्थ तो
दास मात्र है
विचार का।

अनुचर है बेचारा
हाथ बांधे चलता है
विचार के पीछे-पीछे।

हिम्मत नहीं
कि एक क़दम भी
आगे निकल जाए!

…अवलम्बन चाहिए ससुरे को
विचार का।
✍️ चिराग़ जैन

अनकहा

सदियों से
तलाश रहा हूँ
एक ऐसा श्रोता
जो सुन सके
मेरी कविताओं का वह अंश
जो मैंने कहा ही नहीं

क्योंकि
‘बहुत कुछ’
कह देने की संतुष्टि से
कहीं बड़ी है
बेचैनी
‘कुछ’ न कह पाने की
✍️ चिराग़ जैन

शब्द शिव हैं

शब्द
शिव हैं।

जब कभी
बहती है भावना
उद्विग्न हो
मन के भीतर से

तो उलझा लेते हैं उसे
व्याकरण की जटाओं में।
रोक देते हैं
उसका सहज प्रवाह।
सीमित कर देते हैं
उसकी क्षमताएँ।

कविता वेग है
आवेग है
उद्वेग है।

वो तो
शब्दों ने उलझा लिया
वरना,
बहा ले जाती
सृष्टि के
सारे कचरे को।

शब्द ब्रह्म नहीं हैं,
शब्द शिव हैं।

✍️ चिराग़ जैन

पूरा बयां हो जाऊंगा

बस तुम्हीं तो हो मेरी हर बेगुनाही के गवाह
तुम भी गर इल्ज़ाम दोगे, बेज़ुबां हो जाऊँगा

शायद उसने इसलिए मुझको अता की है शिक़स्त
हर दफ़ा जीता तो इक दिन बदगुमां हो जाऊँगा

जी रहा हूँ बांध पर ठहरी नदी की धार-सा
कोई दरवाज़ा खुलेगा तो रवां हो जाऊंगा

जो हवा जलती है मुझमें साँस बनकर रात-दिन
वो हवा झोंका बनेगी तो धुआँ हो जाऊंगा

मैं वो क़िस्सा हूँ जिसे है चंद लफ़्ज़ों की तलाश
वक़्त आएगा तो मैं पूरा बयां हो जाऊंगा

✍️ चिराग़ जैन

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