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कोशिश

मैं ‘मन’ लिखने की
कोशिश करता हूँ
….सिर्फ़ कोशिश।

कभी इसका मन
कभी उसका मन
कभी सबका मन
…और कभी-कभी
अपना भी मन।

इतना ही समझ आता है मुझे
कि ‘कोशिश’
और ‘कामयाबी’
उर्दू ज़ूबान के
दो अलग-अलग अलफ़ाज़ हैं!
✍️ चिराग़ जैन

बेअदब

बड़ी अधूरी थी ये ज़िन्दगी जो अब न रही
तुम्हारा प्यार जो पाया तो कुछ तलब न रही

ग़ज़ल मैं तेरे अदब की मिसाल देता हूँ
तवायफ़ों के लबों पर भी बेअदब न रही

तुम्हारी ओर से भी नज़्ा्रे-इनायत तो हुई
मगर जब हमको ज़रूरत थी महज तब न रही

कोई उस जीत को पाकर भला करे भी क्या
जो जीत एक भी मुस्कान का सबब न रही

✍️ चिराग़ जैन

ज़माना दर्द देता है

बिना मांगे मुझे सब कुछ मिरा दातार देता है
वो दरिया है जो पत्थर को नया आकार देता है

सरे-महफ़िल मुझे जो बेवज़ह दुत्कार देता है
अकेले में वो मिलता है तो मुझको प्यार देता है

बताओ कौन है मुज़रिम, ग़रीबी या कि वो बापू
जो बच्चों की तमन्नाओं को हर दिन मार देता है

मिरे भीतर के शाइर को कोई व्यापार सिखलाए
ज़माना दर्द देता है तो ये अशआर देता है

फ़साना एक ही होता है शाइर और वीणा का
जो छेड़ो तो तड़पकर इक नई झनकार देता है

कोई कितना भी दुनिया में भटक ले, पर यही सच है
हमेशा आसरा अपना ही घर-परिवार देता है

✍️ चिराग़ जैन

कोई यूँ ही नहीं चुभता

मैंने कौन-सी कविता कैसे लिखी, इस प्रश्न का उत्तर देना मेरे लिए असंभव-प्रायः है। भावनाओं के सागर में उठे ज्वार ने अन्तस् की धरती पर कैसा रेणुका-चित्र अंकित किया -यह तो सबको दिखाई देता है, लेकिन इस चित्र के सृजन की त्वरित प्रक्रिया में लहर कैसे उठी; कैसे धरती पर न्यौछावर हुई; कैसे उसने रेत को काटा और कैसे वह वापस लौट गई – इन दृश्यों के साक्षी तो बहुत हैं, समीक्षक कोई नहीं।
मैंने अपने भीतर कविता के प्रस्फुटन को चाहे समझा न हो, देखा अवश्य है। सहज साक्षीभाव से सृजन की आकुलता को अनुभूत किया है। मन के भीतर गुंजायमान काव्य-ध्वनियों का दिन-रात पीछा किया है और अनुभूति से अभिव्यक्ति के बीच, यात्रा की जटिलताओं से साक्षात्कार किया है।
मुझे मालूम है कि मैं किसी कविता के अवतरण का माध्यम हो सकता हूँ, निमित्त हो सकता हूँ, रचयिता नहीं। इसी सत्य को जानते हुए, मैंने कभी कविता लिखने के लिए प्रयास नहीं किए। अभिव्यक्ति में बदलती अनुभूति की विधा के साथ कभी छेड़छाड़ करने की कोशिश नहीं की। बल्कि उद्वेलन की पराकाष्ठा पर पहुँचकर इन रचनाओं ने स्वयं ही अपने अवतरण का निमित्त बनाकर मुझे कृतार्थ किया है। मैंने तो अन्तस् में कहीं दूर गूंजती हुई ध्वनियों को सुनकर, गणपति भाव से उन्हें यथावत् काग़ज़ पर उतारने से अधिक कुछ भी नहीं किया।
जैसे मधुमास में लाल-लाल फूलों से लदने से पहले गुलमोहर के छोटे-छोटे पत्ते स्वतः ही झरने लगते हैं। ऊँचे-ऊँचे वृक्षों का आसन त्यागकर विराट धरातल पर आ उतरते हैं। ठीक उसी प्रकार, कविता भी एक अजीब सी मस्ती लिए स्वेच्छा से ही शब्दों का रूप धारण करती है। काव्य की यह मस्ती स्वयं काव्य को तो आह्लादित करती ही है, साथ ही साथ संसर्गियों के मन में भी एक पावन-सी ऊर्जा, एक सात्विक-सा रोमांच उत्पन्न करती है। इस परिस्थिति में शब्द तलाशने नहीं पड़ते; तुक मिलाने नहीं पड़ते; मात्राएँ गिननी नहीं पड़तीं और धुनें बनानी नहीं पड़ती! सब कुछ स्वतः घटित होता है, एकदम सहज… सत्य-सा…! और ध्यानस्थ योगी-सा कवि, नितान्त अकेला… अकिंचन…. रचना का अवलम्बन बनकर सुखसागर में गोते लगाता है।
अनहद नाद के समान अन्तस् में गूंजते इन काव्य स्वरों के पाश्र्व में, जो कारक विद्यमान होते हैं, उनके बूते ही अनुभूति से अभिव्यक्ति की दुर्गम यात्रा पूर्ण हो पाती है। सो, मैं आभारी हूँ उन स्थितियों, परिस्थितियों, योग तथा मनुष्यों का, जो किसी भी रूप में मेरी अनुभूति के कारक बने और अभिव्यक्ति के साक्षी रहे। साथ ही आभार व्यक्त करता हूँ, उन अपनों का जिनके स्नेहावलम्बन को पकड़ मेरा रचनाकार अब तक की यात्रा तय कर सका!
काव्य का दिव्य अवतरण मेरे माध्यम से यूँ ही काग़ज़ों पर होता रहे और माँ शारदे का आशीष सदैव मेरे अन्तस् में काव्य-प्रस्फुटन का रूप धरकर फलीभूत होता रहे!
✍️ चिराग़ जैन

ख़ुशियों को ज़ंजीर

लिखे किसी ने गीत तो समझो, मन को गहरी पीर मिली
सृजन हुआ उन्मुक्त तभी जब, ख़ुशियों को ज़ंजीर मिली
किस्से बने, कहानी फैली, चित्र सजे, कविता जन्मी
पर न मिली मजनू को लैला, ना रांझे को हीर मिली

✍️ चिराग़ जैन

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