Chirag Jain Writings, Free Verse, Mann To Gomukh Hai, Poetry
तुम्हारी अनुपस्थिति में
राह भटक जाती हैं
अभिव्यक्तियाँ!
अक्सर ऐसा होता है
कि उपलब्धि मिलने पर
होठों पर मुस्कान लिए
मेरी निग़ाह तलाशती है
इक चेहरा
अपने आस-पास।
और जब
विफल होने लगती है तलाश
तो झट से
आँखों की कोरों पर
आ ठहरती है
अधरों की मुस्कान।
और दु:ख की घड़ियों में
तुम्हें आसपास न पाकर
मुस्कुराकर रह जाते हैं होंठ!
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Free Verse, Mann To Gomukh Hai, Poetry
अजीब सी
पशोपेश में रहता हूँ आजकल
तुम
और कविता
दोनों ही मांगती हैं वक़्त!
मैं घण्टों बतियाता हूँ
तुमसे
और भीतर ही भीतर
घुटती रहती है कविता।
आज अचानक
पूछ लिया तुमने-
“क्या बात है
बहुत दिनों से
कोई
नई कविता नहीं सुनाई?”
मैंने कहा-
“कल सुनाऊंगा।
आज ही किसी ने
दिल दुखाया है।”
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Free Verse, Mann To Gomukh Hai, Poetry
अपनों से मिलने वाला दर्द
जन्म देता है
अच्छी कविता को।
शायद इसी कारण
मैं नहीं लिखना चाहता
कोई अच्छी कविता
तुम्हें ले कर।
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Do Misron Ke Beech, Muktak, Poetry
कर्ता का सम्मान कहां है
ऐसा यहां विधान कहां है
राम-कृष्ण हैं, हर मंदिर में
तुलसी या रसखान कहां है
✍️ चिराग़ जैन
Chintan ke Swar, Chirag Jain Writings, Free Verse, Poetry
इन दिनों
संदर्भ निंदा कर रहे हैं
विषय की भावार्थ से-
शब्द लट्टू हो गए
भाषा पे
या फिर व्याकरण पे
बोलियों के गेसुओं में फँस गया है मर्म
कुछ अलंकारों में सीमित हो गया कवि-कर्म
जटिल सा लगने लगा है
आजकल सरलार्थ
आँख मूंदे, मुस्कुराता
मौन है भावार्थ
✍️ चिराग़ जैन