Article, Chirag Jain Writings, Prose, Shabdon Ki Kunjgaliyaan
हिंसा किसी समस्या का समाधान नहीं हो सकती। अराजकता किसी समाज के लिए स्वीकार्य नहीं हो सकती। जिन लोगों ने अपने राजनैतिक हित साधने के लिए आपको गाली देना सिखाया है, वे ही अपनी अन्तरराष्ट्रीय छवि बचाने के लिए आपको असभ्यता के आरोप में पार्टी से बाहर कर देते हैं। जिन लोगों के चित्र अपनी प्रोफाइल फोटो में चेपकर आप किसी व्यक्ति अथवा पार्टी विशेष के समर्थक होने का दंभ भरते हैं वे लोग आपके विवेक को हाइजैक करके आपकी प्रोफाइल को ‘यूज़’ कर रहे हैं, और आपको पता भी नहीं चलता।
नफ़रत के बीज बोते समय यह हमेशा स्मरणीय है कि काँटे आपका झंडा देखकर आपको ज़ख्मी नहीं करते हैं। आप कितनी भी सावधानी से दूसरे की ओर लक्ष्य करके नागफनी बोते रहिए, उसका एक न एक फन आपकी ओर ज़रूर मुड़ेगा।
हैदराबाद एनकाउंटर पर पुलिस को बधाई देने वाले यह नहीं समझ पा रहे थे कि पुलिस प्रशासन को न्याय का अधिकार दे दिया गया तो क्या होगा। अदालतों के सिस्टम में व्याप्त ख़ामियों को सुधारने की बजाय स्वयं को अदालत मान लेना बर्बरता की ओर बढ़ने का संकेत है।
जब मॉब लिंचिंग की ओट लेकर हत्याएँ की जा रही थीं, तब हमारा राजनैतिक नेतृत्व अपने-अपने कार्यकर्ताओं को यह नहीं समझा सका कि जेल में बंद अपराधी को भी मारने का अधिकार किसी व्यक्ति या भीड़ को नहीं दिया जा सकता। ऐसे में केवल ‘आरोप’ अथवा ‘संदेह’ के आधार पर ‘फैसला ऑन द स्पॉट’ करनेवालों से लोकतन्त्र को सर्वाधिक ख़तरा है। लिंचिंग की घटनाएँ हो रही थीं और सभी राजनैतिक दल अपनी-अपनी वोटिंग का बहीखाता खोलकर लाभ-हानि का गणित लगाने में व्यस्त थे।
कांग्रेस ने रामदेव के आंदोलन को कुचलने के लिए जो लाठी चलाई थी, उसी के वार से आज कांग्रेस के एक लीडर की पसली टूट गई है। कांग्रेस ने सीबीआई को तोता बनाकर अपने राजनैतिक विरोधियों पर छोड़ दिया था। इसी परम्परा के फलस्वरुप आज भारतीय जनता पार्टी ने ईडी के कंधे पर बंदूक रखकर विरोधियों को निशाने पर ले लिया है।
किसान आंदोलन के समय आंदोलनकारियों को आतंकवादी और ग़द्दार कहनेवाले यह न भूलें कि सत्ता हमेशा किसी की नहीं रहती। आंदोलन के अस्त्र को इतना बदनाम मत करो कि यदि सत्ता से बाहर होकर कभी आपको आंदोलन के अस्त्र का प्रयोग करना पड़े तो इसमें धार ही न बचे।
बुलडोजर चलाकर स्वयं को विक्रमादित्य समझने वाले यह स्मरण रखें कि यदि सत्ता चली गई तो यही जेसीबी बेताल बनकर उनकी कमर तोड़ देगी। पाटीदार आंदोलन के समय गुजरात की सड़कों पर अग्निवर्षा करनेवाले आज तत्कालीन सत्ताधीश के साथ बैठे हैं। उस समय उस अराजकता को समर्थन देने वाले कांग्रेसी भी लोकतन्त्र के अपराधी थे और आज उस अराजकता से उपजे लीडर को साथ बैठाने वाले भाजपाई भी उसी अपराध में संलग्न हैं।
किसी भी सरकारी योजना का विरोध करना युवाओं का लोकतांत्रिक अधिकार है किन्तु उस अधिकार की ओट में अराजक हो जाना कम से कम गांधी के देश में तो बर्बरता ही कहा जाएगा। जिस गांधी को गाली दे-देकर राष्ट्रवादियों ने सोशल मीडिया पाट दिया है, जिस गांधी को ‘यूज़’ करके कांग्रेस ने सत्ता की शतरंज बिछायी है उसी गांधी की ज़रूरत आज फिर आन पड़ी है।
अग्निवीर योजना के मुआमले में यदि आंदोलन को ही ग़लत ठहरा दिया जाए तो भी अनुचित होगा और यदि उस आंदोलन के बहाने की जा रही आगजनी और हिंसा का समर्थन किया जाए तो भी अनुचित होगा।
ऐसे में गांधी का ‘शांतिपूर्ण विरोध’ का मंत्र सामयिक लगता है। टेलिविज़न डिबेट से लेकर राजनैतिक बयानबाज़ी तक एक तरीके के लोग इन आंदोलनकारियों को अनपढ़, असभ्य, राष्ट्रद्रोही और नालायक सिद्ध करना चाह रहे हैं और दूसरी तरह के लोग इस आगजनी को आंदोलन, विरोध, क्रोध और सत्ता की मनमानी का प्रतिफल बताने पर तुले हैं। जबकि वास्तविकता यह है कि ये सब लड़के हमारे इसी समाज के वे नौनिहाल हैं, जिनको लोकतन्त्र के अधिकारों का पाठ पढ़ाते समय मास्टर जी ने गांधी की अहिंसा का पन्ना हिकारत से पलट दिया था।
✍️ चिराग़ जैन
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कोई मनुष्य अपने भीतर चल रहे प्रत्येक भाव को अभिव्यक्त कर दे, तो समाज उसे तत्काल ‘पागल’ घोषित कर देगा। इच्छाएँ उस मदमस्त गजराज की तरह होती हैं कि उन पर लोकभय का अंकुश न लगाया जाए तो वे पूरा वनप्रदेश तहस-नहस कर सकती हैं। आजकल कुछ लोग अपने मन के भीतर की इन समस्त उत्कंठाओं को अभिव्यक्त करने को आधुनिकता कहते हैं, जबकि अध्यात्म इन इच्छाओं को नियंत्रित करके शांत करने को संन्यास कहता है। यहाँ यह ध्यातव्य है कि ‘संन्यास’ इच्छाओं को नियंत्रित करने का मार्ग है और ‘मोक्ष’ इच्छाओं से पार पा जाने का बिंदु है, लेकिन इसके बावजूद इच्छाओं से उलझकर जीवन को सुलझाने की उत्कंठा रखनेवाले व्यक्ति के लिए नगर नहीं, वन उपयुक्त बताया गया है।
नगर में रहना है तो नगर के नियमों का पालन करना ही होगा, अन्यथा समाज में अराजकता फैल जाएगी। समाज को अराजकता से बचाने के लिए ही समाज को नियमों की बाड़ से बांधा जाता है। यह बाड़ समाज का विकास अवरुद्ध करने के लिए नहीं, अपितु समाज को सुंदर, सुव्यवस्थित तथा सुगढ़ बनाए रखने के लिए आवश्यक है।
यह बहुत संभव है कि इस बाड़ की कोई कड़ी समाज के सुख को अवरुद्ध करके उसे चोटिल करने लगे तो उसे हटाकर उसका समाधान करने की व्यवस्था भी बाड़ बनानेवाले करते ही हैं। इसीलिए दुनिया के प्रत्येक संविधान में नियमों के बदलाव संबंधी नियम भी सम्मिलित होते हैं। एक सभ्य समाज इन्हीं नियमों का पालन करते हुए किसी सामाजिक नियम के परिवर्तन का मार्ग प्रशस्त करता है।
बाड़ की कोई डंडी आपको चुभी और आपने अपने समर्थकों की फौज जुटाकर पूरी बाड़ को ही ध्वस्त कर डाला तो आपने अपने नगर में जंगल बोने से अधिक कुछ नहीं किया।
कई बार राजनैतिक महत्वाकांक्षाओं के कारण बाड़ की डंडियों का प्रयोग समाज की प्रताड़ना हेतु होने लगता है। ऐसे में पूरा समाज धीरे-धीरे संगठित होकर पुरानी बाड़ को उखाड़ फेंकता है और नई खपच्चियाँ लगाकर थोड़ी खुली बाड़ लगाने लगता है। बाद में इस नयी बाड़ के खुलेपन में जब गन्दगी सड़ने लगती है तो फिर उस बाड़ को काट-छाँटकर टाइट कर दिया जाता है और समाज व्यवस्थित रूप से मर्यादित हो जाता है।
कमोबेश, यही समाज के संचालन की सामान्य प्रक्रिया है। किंतु सोशल मीडिया के दौर में जब प्रत्येक व्यक्ति के हाथ में अपना मनोभाव अभिव्यक्त करने का साधन आ गया है, ऐसे में ‘केवल ध्यानाकर्षण के उद्देश्य से’ कुछ लोग न केवल असंयत भावनाओं को ढिठाई से अभिव्यक्त करने लगे हैं बल्कि यह भी मान बैठे हैं कि उनसे बाड़ में वे जिस एक संटी को बदलना चाह रहे हैं, उसी से पूरी बाड़ का चरित्र बदलने की क्रांति हो जाएगी। जिसका जो मन होता है, वह बाड़ पर लिख जाता है। जो चाहे, जिस मर्ज़ी लकड़ी को कोसने लगता है। कोई इन खपच्चियों को आपस में रगड़कर आग लगाने पर उतारू है, तो कोई इन्हें अलग-अलग रंगों में रंगकर रंगदारी वसूलने में लगा है। कोई इन डंडियों को हथियार बना लेना चाहता है तो कोई इन डंडियों पर पाँव रखकर अपना क़द ऊँचा करने में व्यस्त है।
सोशल मीडिया के कारण पूरा समाज इस बाड़ पर अपनी-अपनी क्षमतानुसार प्रहार कर रहा है, किन्तु यह प्रहार किसी आवश्यक क्रांति के लिए लोकतांत्रिक प्रयास न होकर कुछ लाइक्स, कुछ कमेंट और कुछ व्यक्तिगत लाभ बटोरने का उद्देश्य से किये जा रहे कुत्सित आघात हैं। इनके परिणामस्वरूप मर्यादा की बाड़ जगह-जगह से जर्जर हो गयी है। और यदि सोशल मीडिया पर बौराए फिर रहे उन्मादियों के इन आघातों को नहीं रोका गया तो इस बाड़ के उस पार खड़ा जंगल, सूनामी के वेग से समाज में घुस आएगा और उस वेग में सबसे पहले वे लोग ध्वंस होंगे जो अनवरत इस सामाजिक बाड़ को जर्जर कर रहे हैं।
…और तब, अराजकता बो रहे इन मूढ़ों के अस्तित्व की लाश पर सैड वाली इमोजी भी पोस्ट करने कोई नहीं आएगा, क्योंकि इनकी पोस्ट लाइक करने वाला समाज तब अराजकता की सुनामी से जूझ रहा होगा।
© चिराग़ जैन
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विमानन सेवाओं ने मुनाफ़े को वरीयता देते हुए यात्रियों के कष्टों को पूरी तरह अनदेखा कर दिया है। आप जब कोई फ्लाइट बुक करते हैं तो उसके हिसाब से आगे का कार्यक्रम तथा बुकिंग भी प्लान करते हैं। जब सब कुछ तय हो जाता है तब अचानक पता चलता है कि एअरलाइंस को सवारी कम मिली, इसलिए उसने आपसे बिना पूछे आपको किसी अन्य फ्लाइट में शिफ्ट कर दिया है। इस बदलाव से आपका यात्रा का उद्देश्य, आपकी आगे की यात्रा तथा आपका सुख-चैन ध्वस्त होता हो तो होता रहे। जब आप एयरलाइंस के ऑफिस में फोन करके इस असुविधा की शिकायत करते हैं तो वहाँ आईवीआर की तरह रटे हुए वाक्य बोलनेवाले मनुष्य आपसे कुल तीन वाक्यों में बात करते हैं:
1. आपको हुई असुविधा के लिए हमें खेद है।
2. आप यदि यात्रा नहीं करना चाहते तो आपको फुल रिफण्ड मिलेगा।
3. सॉरी, सर यह कंपनी पॉलिसी है, इसमें हम आपकी कोई सहायता नहीं कर सकते।
इन तीन वाक्यों के बल पर वे आपका रक्तचाप अपने हवाई जहाज से भी ऊँचा पहुँचाकर फोन काट देते हैं।
फ्लाइट कैंसिलेशन के कारण बताते हुए ‘ऑपरेशनल रीज़न’ लिखकर काग़ज़ की ख़ाना-पूर्ति कर दी जाती है।
आप परेशान होकर अन्य फ्लाइट विकल्प देखते हैं तो अन्य एयरलाइंस की टिकट ‘आपदा में अवसर’ तलाशते हुए दो-तीन गुनी बढ़ चुकी होती है। अब आपको समझ नहीं आता कि फुल रिफण्ड देनेवाली एयरलाइंस का धन्यवाद किन शब्दों में ज्ञापित करें!
मैं ऐसी ही एक एयरलाइंस से फुल रिफंड लेने की ख़़ुशी मनाता हुआ, तीन गुना किराया और चार गुना समय नष्ट करके वाराणसी से चेन्नई जा रहा हूँ। रास्ते में चार घण्टे बंगलोर हवाई अड्डे पर बैठकर इतनी दयावान विमानन सेवाओं के प्रति कृतज्ञ महसूस करूंगा।
न्यायालय में इस प्रकार के मुक़द्दमों के भाग्य में सिवाय धूल के कुछ नहीं है। प्राधिकृत नियामकों को नैतिक-अनैतिक तरीक़े से विमानन सेवाओं से उगाही करने से फ़ुर्सत नहीं मिलती। लोक कल्याणकारी सरकारों ने ये सब सेवाएँ निजी हाथों में बेचकर अपना पल्ला झाड़ ही लिया है।
चूँकि सरकार सर्वज्ञ होने के साथ-साथ स्थितप्रज्ञ भी है, अतः वह यह सारा खेल जानते हुए भी अपनी वेदी पर चढ़नेवाले चढ़ावे से आगे देखने का प्रयास नहीं करती। जनता के दुःख-दर्द में यदि सरकार हस्तक्षेप करेगी तो जनता अपनी लड़ाई स्वयं लड़ने की इम्यूनिटी नहीं जुटा पाएगी, इसलिए सरकार जनता को मुनाफ़ाखोरों के आगे फेंककर अपने हिस्से का चढ़ावा चबाते हुए जनता के संघर्ष का खेल देखती रहती है।
हाल ही में जिस सरकारी एयरलाइंस को निजी हाथों में बेच दिया गया है, उसमें नए मालिक ने आरटीआई और जन-शिकायतों की सारी फाइलें नष्ट करके ये दोनों विभाग बंद कर दिए हैं। जनता के प्रति उत्तरदायित्व का इससे बेहतर उदाहरण नहीं मिल सकता।
आम नागरिक इस बात से ख़ुश है कि विमानन सेवाओं के किरायों से लेकर मनमानी तक, कहीं कोई अवरोधक नहीं है… देश सही दिशा में विकास कर रहा है।
✍️ चिराग़ जैन
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जन्तर-मन्तर पर एक आन्दोलन उपजता है। युवा, वृद्ध, स्त्री, पुरुष, अमीर, ग़रीब सब एक बूढ़ी काया में तन्त्र के सुधार की उम्मीद देखने लगते हैं। कोई राजनैतिक आधार नहीं, कोई प्रोपेगेंडा नहीं, कोई ग्लैमर नहीं… पीछे बैनर पर महात्मा गांधी का भव्य चित्र, आगे श्वेत वसन धारी अन्ना हजारे, माइक पर जनता को आंदोलन का अर्थ समझाते कुमार विश्वास और अनशनकारी के साथ बैठे अरविंद केजरीवाल तथा मनीष सिसोदिया।
कांग्रेस शासन के अहंकार से त्रस्त मीडिया ने अपने सारे कैमरे जन्तर-मन्तर की ओर घुमा दिए। एक शब्द यकायक पूरे देश में आग की तरह फैल गया – ‘जनलोकपाल’। जिस तरह की तहरीरें हुईं, उनसे जन-समर्थन का आकार बढ़ता गया। जिसे देखो वही ‘मैं भी अन्ना’ की टोपी लगाए जन्तर-मन्तर की ओर बढ़ चला।
उधर दस वर्ष से सत्ता पर क़ाबिज़ कांग्रेस की मनमानियों का विरोध करनेवाले बुद्धिजीवी तथा सामाजिक व्यक्तित्व भी आंदोलन के मंच पर आ पहुँचे। शांतिभूषण, प्रशांत भूषण, योगेन्द्र यादव, आशुतोष, किरण बेदी और न जाने कितने ही लोकप्रिय चेहरे आन्दोलन के मंच पर दिखने लगे। जनता का सैलाब उमड़ रहा था। ‘जनलोकपाल’ बिल गीत, संगीत, नुक्कड़ नाटक, नारेबाज़ी, कविता पर सवार होकर पूरे माहौल पर छा गया था।
कांग्रेस के तत्कालीन विरोधी राजनेताओं ने भी इस मंच पर चढ़ने की कोशिश की, लेकिन आंदोलन की कोर कमेटी ने किसी भी राजनैतिक व्यक्तित्व को मंच पर चढ़ने की अनुमति नहीं दी। इस निर्णय के कारण उमा भारती और ओमप्रकाश चौटाला सरीखे जनप्रतिनिधियों को आंदोलन तक पहुँच कर बैरंग वापस लौटना पड़ा।
इस निर्णय से जनता का विश्वास और बढ़ा। मीडिया ने इस निर्णय को ख़ूब हाइलाइट किया और जन्तर-मन्तर पर जनता की सूनामी आ गयी।
सबको यक़ीन हो गया कि यह ‘जनलोकपाल बिल’ भारतीय तन्त्र में व्याप्त भ्रष्टाचार की इति कर देगा। उन दिनों अचानक से जनता में भी ईमानदारी के अंकुर फूटने लगे थे। मैंने देखा कि जो लोग सौ-पचास रुपये ले-देकर निकल लेने के अभ्यस्त थे, उन्होंने भी चालान होने पर बाक़ायदा चालान भरना शुरू कर दिया था। यह सब देखकर महसूस हुआ कि यदि सिस्टम का करप्शन दूर हो जाए तो जनता स्वतः नियमों का सम्मान करने लगती है।
जो लोग भारत की जनता को भ्रष्टाचारी कहकर ‘इस देश का कुछ नहीं हो सकता’ टाइप के डायलॉग बोलते हैं, उन्हें मैं यह बात पूरे विश्वास के साथ कह सकता हूँ कि राजनीति, ब्यूरोक्रेसी और उद्योगों के आधार पर पनप रहे मध्यस्थों को छोड़ दें तो बाक़ी जनता को किसी भी प्रकार के नियम का उल्लंघन करने में कोई रुचि नहीं है। यदि जनता आश्वस्त हो कि उसके टैक्स का पैसा स्विस बैंकों के आंकड़ों में तब्दील नहीं होगा या राजनैतिक हित साधने के लिए प्रकारांतर से वोट ख़रीदने का अस्त्र न बनेगा तो उसे टैक्स देने में कोई आपत्ति नहीं होगी। इसलिए जो भी व्यक्ति भ्रष्टाचार के लपेटे में जनता को समान रूप से शामिल करता है, वह परिस्थिति को सुलझाने और समझने की बजाय पीड़ित को दोषी सिद्ध करने में अधिक विश्वास रखता है।
अन्ना आंदोलन के समय जनता की उम्मीदें जाग उठी थीं और ‘सिविल सोसाइटी’ नामक अवधारणा पुनः अस्तित्व में आई थी। जेपी आंदोलन के बाद जनता का ऐसा संगठित रूप पहली बार दिखाई दिया था। मुझे अच्छी तरह याद है, उन दिनों अन्ना की हर हरक़त सरकारी तंत्र की नींद उड़ा देती थी।
इसी अवसर का लाभ उठाकर बाबा रामदेव ने भी काले धन के खि़लाफ़ मोर्चा खोल दिया। रामलीला मैदान में पहुँचने का आह्वान हुआ और बाबा रामदेव जब दिल्ली हवाईअड्डे पर उतरे तो पाँच-पाँच कैबिनेट मिनिस्टर उनकी मनुहार के लिए एयरपोर्ट पर हाथ बांधे खड़े थे।
उधर अन्ना आंदोलन जनलोकपाल की हठ पर अड़ा था। रामलीला मैदान में आधी रात को लाठीचार्ज हुआ और बाबा का आंदोलन कुचल दिया गया। इधर कई दौर की बातचीत के बाद भी सरकार और अन्ना आंदोलन के मध्य कोई सहमति नहीं बनी तो एक दिन मीटिंग के बाद तत्कालीन कानून मंत्री श्री कपिल सिब्बल ने मीडिया के सामने झुंझलाकर कहा कि – ‘चुनाव लड़ें ना, बिल बनाना है तो चुनाव लड़कर सरकार में आओ और बनवा लो बिल।’
इससे पूर्व राजनेताओं को मंच न दिए जाने के मुआमले में अरविन्द केजरीवाल अन्ना के मंच से यह घोषणा कर बैठे थे कि न तो हम किसी राजनैतिक दल को अपने मंच पर आने देंगे और न ही राजनीति में पदार्पण करेंगे। लेकिन सिब्बल की चुनौती के बाद कोर कमेटी में यह सुगबुगाहट होने लगी थी कि राजनैतिक पार्टी बनाई जावे या नहीं।
एक धड़ा कहता था कि इतने बड़े जन-समर्थन को व्यर्थ नहीं जाने देना चाहिए। लोकतंत्र में चुनाव लड़ना सभी का अधिकार है और अच्छे चरित्र के लोगों को राजनीति में सक्रिय होना भी चाहिए। उधर, दूसरे पक्ष का यह मानना था कि यदि हमने राजनीति में पदार्पण किया तो यह आंदोलन भी पिछले आंदोलनों की भाँति अपने सत्व का चुम्बकत्व खो देगा। सिविल सोसाइटी की अवधारणा ध्वस्त हो जाएगी और भविष्य में जनता ऐसे जन-आंदोलनों से जुड़ने से पहले हज़ार बार विचार करेगी।
इस दूसरे पक्ष में स्वयं अन्ना हजारे भी शामिल थे। दिल्ली का चुनाव सामने था और आंदोलनकारियों को बहुत जल्दी कोई बड़ा निर्णय लेना था। इस स्थिति में राजनीति में जाने के समर्थकों ने अन्ना की बात को अनदेखा करके ‘आम आदमी पार्टी’ की घोषणा कर दी।
जिस कोर कमेटी ने राजनेताओं को आंदोलन का मंच नहीं लेने दिया था, वही कोर कमेटी आंदोलन का मंच छोड़कर राजनीति के अखाड़े में दाँव लगाने लगे। अरविन्द केजरीवाल के नेतृत्व में मनीष सिसोदिया, कुमार विश्वास, संजय सिंह, योगेन्द्र यादव और तमाम चेहरे जनसभाएँ करके वोट जुटाने में लग गए।
किरण बेदी सरीखे व्यक्तित्व अन्ना के समर्थन में राजनैतिक पार्टी से दूर रहे और केजरीवाल आदि की राजनैतिक महत्वाकांक्षा की भर-भर निंदा करने लगे।
आंदोलन पार्श्व में चला गया और राजनीति की बिसात बिछ गयी। आम आदमी पार्टी का कुछ लोग मखौल बनाने लगे और कुछ इसे उम्मीद की किरण कहकर समर्थन में आ जुटे।
प्रारम्भिक स्थिति यह थी कि पार्टी के पास चुनाव लड़ने के लिए कुल सत्तर प्रत्याशी नहीं थे। ‘जो मिला उसे टिकट दे दिया’ -की नीति पर प्रत्याशी घोषित किये गए। उधर भारतीय जनता पार्टी ने उन्हीं किरण बेदी को मुख्यमंत्री प्रत्याशी घोषित कर दिया, जो राजनीति में उतरने पर केजरीवाल की निंदा कर रही थीं।
देश का राजनैतिक परिप्रेक्ष्य बदल गया। कांग्रेस का बड़ा किला यकायक ध्वस्त होने लगा। शीला दीक्षित जैसी सफल राजनेत्री कांग्रेस की अहमन्यता की भेंट चढ़ गयी और दिल्ली विधानसभा से कांग्रेस ग़ायब हो गयी। उधर केन्द्र की कांग्रेस सरकार भी लोकनिंद्य हुई और गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी की लोकप्रियता ने उन्हें प्रधानमंत्री की कुर्सी पर सुशोभित कर दिया।
राजनीति का चरित्र पूरी तरह बदल गया। इसके बाद राजनैतिक बैनर्स का रंग-रूप बदलने लगा। भारतीय जनता पार्टी के पोस्टर्स से अटल-आडवाणी युग समाप्त हो गया और दिल्ली की गद्दी पर बैठे केजरीवाल ने अपने साथियों से एक-एक करके किनारा कर लिया। जो पार्टी से बाहर जाता, वही केजरीवाल को महत्वाकांक्षी बताकर आलोचना करता।
कुछ जो ज़्यादा आहत हुए उन्होंने भारतीय जनता पार्टी में ठीया बना लिया। कुछ येन-केन-प्रकारेण राजनीति में बने रहने के लिए कुछ-कुछ उछलकूद करते रहते हैं।
जन्तर मन्तर पर जो पौधा बोया गया था, उसके एक-एक पत्ते को झाड़ दिया गया और जिन अन्ना को आगे रखकर आन्दोलन खड़ा किया गया, वे पिछले कुछ वर्षों से अदृश्य हैं। बाबा रामदेव राजनैतिक गतिविधियों से लोकप्रियता बटोरकर पतंजलि के प्रोडक्ट्स के व्यापार को शानदार तरीके से चला रहे हैं। कंपनियों की ख़रीद-फ़रोख़्त करके उन्होंने अपने टर्न ओवर को आश्चर्यजनक रूप से बढ़ा लिया है। उनसे आजकल कोई कालेधन संबंधी उनके दावों पर प्रश्न करता है तो वे उसको कहते हैं कि ‘मेरी पूँछ पाड़ ले!’
इधर आंदोलन के प्रभाव से बनी पार्टी ने पंजाब में भारी सफलता प्राप्त की और नवनिर्वाचित मुख्यमंत्री भगवंत मान ने यह आदेश पारित किया है कि पंजाब के सरकारी दफ्तरों में अब सरदार भगतसिंह और बाबासाहेब भीमराव अंबेडकर की ही तस्वीर लगाई जाएगी। महाराज रणजीत सिंह, महात्मा गांधी और विवेकानन्द के चित्र सरकारी दफ्तरों से हटा दिए गए हैं। इस निर्णय से यह सिद्ध होता है कि राजनीति में श्रद्धा तथा सम्मान भी गणित की पुस्तकों के अनुसार तय किया जाता है।
महात्मा गांधी की तस्वीर अन्ना आंदोलन की आखि़री याद थी। उसे हटाकर पंजाब सरकार ने यह बता दिया है कि जिसके नाम पर जितने समय तक समर्थन मिलेगा, उसकी तस्वीर उतने समय तक मुस्कुराती रहेगी।
सबके अपने-अपने मार्गदर्शक मंडल हैं… सबके अपने अपने रालेगण सिद्धि हैं और सबके अपने-अपने महात्मा गांधी हैं। सबके अपने आदर्श हैं और सबकी अपनी राजनीति है… जनता कुछ पूछे तो कह दिया जाएगा – ‘जा मेरी पूँछ पाड़ ले।’
✍️ चिराग़ जैन
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‘भैया, दिल्ली वाला गीत अभी क्यों रिलीज़ किया। यूक्रेन युद्ध पर कुछ इमोशनल-सा वीडियो बना दो। ग़ज़ब वायरल होगा। दिल्ली-विल्ली तो कभी भी चल जाएगा, इस टाइम वॉर के पोटेंशियल को कैश करो।’ -यह सलाह देनेवाला शख़्स मेरा हितचिंतक है, यह तय है। डिजिटल मार्केटिंग और आधुनिक बाज़ारों के मापदंड पर यह सलाह सही भी हो सकती है लेकिन मेरे भीतर का कबीर इस सलाह को सुनकर प्रसन्न होने की बजाय भयभीत हो गया है।
युद्ध बाज़ार में खींच लाया गया है और अब बाज़ार इससे लाभ उठाने के लिए युद्धरत है। यह मानवीय संवेदना की मृत्यु की घोषणा है।
पत्रकारिता का काम है कि भूख से पीड़ित व्यक्ति की सूचना समाज तक पहुँचाए। कविता का दायित्व है कि वह उस भूखे तन की न्यूनतम आवश्यकता पूर्ण करने योग्य संवेदना समाज में प्रसारित करे और राजनीति की प्रवृत्ति है कि वह उस भूखे को रोटी देते हुए फ़ोटो खिंचाकर उसका श्रेय लेने का श्रम करे। किन्तु लाइक्स और शेयर्स की अंधी दौड़ में संलग्न समाज उस भूखे तन को नोच-नोच कर वायरल होने का उपाय ढूंढ रहा है।
लाइक्स और शेयर्स की यह होड़ इतनी वीभत्स है कि घर परिवार में मृत्यु होने पर ‘शव’ के चित्र और ‘शवदाह’ के वीडियो लाइव करने से भी हमें संकोच नहीं होता। चुम्बन से लेकर गर्भावस्था तक सब कुछ केवल लाइक्स बटोरने का ज़रिया हो चला है।
अमानुष होने का इससे बड़ा प्रमाण क्या होगा कि किसी की आह सुनकर हमारी आँख में आँसू आने की बजाय, उस आह को बेचने के विचार से हमारी आँखों में चमक आ जाती है। युद्ध के सभी वीडियो बाज़ार ही वायरल करा रहा है यह सत्य नहीं है किन्तु हर वायरल होती वीडियो की संवेदना का बाज़ार भाव टटोला जा रहा है यह भयावह है।
अपने समाज के युवक-युवतियों को जब ‘अश्लील’ और ‘लगभग अश्लील’ रील्स तथा शॉट्स बनाते देखता हूँ तो एहसास होता है कि ‘समाज’ नामक जिस किले में हमने अपने परिवारों को सुरक्षित कर दिया था उसकी दीवारों में दरार पड़ गयी है। टीन-एजर्स को जब सार्वजनिक वीडियो में ‘गालियाँ’ बकते देखता हूँ तो साफ़ दिखाई देता है कि आँखों की हया और बड़े-बुजुर्गों के लिहाज का जो छप्पर हमने समाज पर डाल रखा था वह तार-तार हो गया है और हमारा समाज खुले आसमान के नीचे लगभग नंगा बैठा है।
इसके तन पर जो कुछ कतरनें बची हैं, उन्हें संवेदना की सीवन से न सीया गया तो आश्चर्य न करना कि बाज़ार में मातम की डिमांड होने पर पड़ोसी के घर का मातम बेचनेवाला यूट्यूबर अपने घर में ही प्रोडक्शन करने का जुगाड़ कर ले। अपराध का वीडियो आसानी से वायरल होता है, इस वीडियो को बनाने के लिए आपका नौनिहाल अपराध की राह पर किस दूरी तक जा सकता है, इसका अनुमान बहुत आवश्यक हो चला है। थोड़ी-सी उघाड़ करने से लाइक्स तेज़ी से आने लगे तो आपकी बेटियाँ लोभ के इस अंधकूप में जल्दी ‘सेलिब्रिटी’ बनने के लिए क्या कुछ कर जाएंगी इसका आभास बेहद ज़रूरी है।
हर आँसू, हर संवेदना, हर पीड़ा और हर रिश्ते को वायरल होने का एक अवसर मानना इन कर्णधारों को कितना बर्बर कर देगा… यह यथाशीघ्र अनुभूत कर लीजिए क्योंकि यदि ये शोर एक प्वाइंट और बढ़ गया तो फिर किसी भी तरह से आपकी बात इनके कानों तक नहीं पहुँच सकेगी। ‘कुछ भी’ करके वायरल होने की दौड़ लगाते इन होनहारों को रोक लो, वरना ये वायरल होने के लिए ‘कुछ भी’ कर जाएंगे…!
✍️ चिराग़ जैन