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भारतीय लोकतंत्र : एक ढकोसला

भारतीय जनता पार्टी के चुनावी चाणक्य बाक़ायदा मीडिया के सामने बैठक बुलाकर यह बताते हैं कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश में जाटों का वोट अपनी ओर मिलाने के लिए वे जाट नेताओं को माना रहे हैं।
बहुजन समाज पार्टी घोषणा करके दलितों की पार्टी होने का दावा करती है। एआईएमएम घोषित करती है कि वह मुसलमानों की पार्टी है। शिवसेना डंके की चोट पर ख़ुद को हिन्दू समाज की पार्टी बताती है। शिरोमणि अकाली दल के नाम से ही स्पष्ट हो जाता है कि वह सिख समुदाय का प्रतिनिधित्व करती है।
और यह सब तब जबकि हमारे यहाँ संवैधानिक रूप से धर्म-सम्प्रदाय के आधार पर कोई राजनैतिक दल गठित नहीं किया जा सकता।
आज जब दिल्ली में जाटों की मनुहार चल रही थी तो उस पंचायत में भाग लेने के लिए माननीय गृहमंत्री जी गणतन्त्र दिवस की परेड से सीधे वहाँ पधारे थे। बाद में टीवी चौनल्स पर जाट नेता सर-ए-आम बता रहे थे कि जाट किस दल को वोट देंगे। और यह सब तब जबकि हमारा संविधान हमें बताता है कि भारत में गुप्त मतदान प्रणाली है और किसी भी मतदाता पर न तो किसी को मत देने के लिए दबाव बनाया जा सकता है न ही उससे पूछा जा सकता है कि वह अपने मताधिकार का प्रयोग किसके पक्ष में करेगा!
इन सब विरोधाभासों को देखता हूँ तो समझ आता है कि भारतीय लोकतंत्र एक ऐसा ढकोसला बनकर रह गया है जिसकी गरिमा को तार-तार करने में पूरा तंत्र समान रूप से सक्रिय है। सभी राजनैतिक दल भारतीय लोकतंत्र को बाल पकड़कर घसीटते हुए जुआघर में लाते हैं और बारी-बारी से उसका चीरहरण करते हैं। बस अंतर इतना है कि जब एक पक्ष चीरहरण कर रहा होता है तो दूसरा पक्ष पांडवों के कपड़े पहन लेता है और जब दूसरा पक्ष चीरहरण में संलग्न होता है तो पहला पक्ष लपक के उसके कपड़े लपेटकर नैतिक होने का अभिनय करने लगता है।
लोकतंत्र बेचारा ईश्वर से गुहार लगाता है। बीस-तीस वर्ष की गुहार के बाद ईश्वर तो नहीं आता लेकिन ईश्वर का गेट-अप पहनकर कोई आता है और दोनों पक्षों को तितर-बितर करके ख़ुद चीरहरण करने लगता है। सभागार में बैठे राजा से लोकतंत्र इसलिए कुछ नहीं कह पाता, क्योंकि राजा की आँखों पर लोकतंत्र ने ख़ुद अपने हाथों से पट्टी बांधी है।
सभा में कुछ विदुर भी हैं। जो इस चीरहरण पर दोनों पक्षों से प्रश्न करता है। लेकिन दोनों पक्ष चीरहरण की अनैतिकता पर उत्तर देने की बजाय विदुर से प्रतिप्रश्न करते हैं कि जब उस पक्ष वाले चीरहरण कर रहे थे तब तुम कहाँ थे?
विदुर बताता है कि मैं उनसे भी प्रश्न कर रहा था। लेकिन वे उसकी बात नहीं मानते और उसके प्रत्येक प्रश्न पर प्रतिप्रश्न उछाल कर उसे लोलक की भाँति इधर-से-उधर दौड़ाते रहते हैं।
इस भागदौड़ से परेशान होकर कभी-कभी विदुर किसी एक पक्ष के साथ चीरहरण में शामिल हो जाता है और जो विदुर ऐसा नहीं कर पाता वह इस गुत्थी को सुलझाने में उलझ जाता है कि दोनों में से कौन सा पक्ष अधिक बेहतर है। वह जिसने एक ही झटके में लोकतंत्र को निर्वस्त्र कर दिया, या फिर वह जिसने तड़पा-तड़पा के हलाल स्टाइल में कपड़े उतारे।
आज गणतंत्र दिवस के दिन यह लिखते हुए मेरे भीतर एक सिहरन हो रही है कि इस देश के गणतंत्र पर राजनीति का घुन लग चुका है। बेशर्मी और ढिठाई से दल बदलने वाले लोग; अपनी कही हुई बात से पलट जाने वाले लोग; जिसे गाली दें, स्वार्थ के लिए उसके गले लग जाने वाले लोग; जिसकी उंगली पकड़ कर चले, उसे लात मारने वाले लोग; रंगे सियारों की तरह अपने मुंह में तिनके ठूस कर मौक़ा मिलते ही हुआ-हुआ करने वाले लोगों में से भारतीय समाज का भविष्य तलाश पाना लगभग असंभव हो चुका है।
चुनाव के इस भौंडे नाटक के बीच भारतीय जनमानस के भविष्य पर कालिख पोती जा रही है। लेकिन मैं इतना ज़रूर जानता हूँ कि यदि एक व्यक्ति भी इस लेख से यह समझ सका कि जिन राजनैतिक सियारों के स्वर में स्वर मिलाकर हम अपने आंगन में विष बो रहे हैं, उनका न हो हमारे धर्म से कोई सरोकार है, न हमारे वंशजों से, न हमारे भविष्य से और न ही हमसे; तो मुझे लगेगा कि अभी इस राष्ट्र की राजनीति को यह भय दिखाया जा सकता है कि जनता का विवेक अभी मरा नहीं है।

© चिराग़ जैन

मतदान

वोटिंग के दिन उंगली पर जो स्याही का निशान बनता है, वही निशान एक दिन लोकतन्त्र का राजतिलक सिद्ध होगा।

✍️ चिराग़ जैन

भाषा के स्तर से झाँकता व्यक्तित्व

भाषा किसी भी व्यक्तित्व का प्रथम विज्ञापन है। आप अपनी बात कहने के लिए जिस शब्दावली का प्रयोग करते हैं, वह आपकी मूल प्रवृत्ति की द्योतक है।
राजनैतिक भाषणों की गाली-गलौज, अराजकता, अभद्रता तथा अशिष्टता के सैंकड़ों उदाहरणों से यूट्यूब पटा हुआ है। निरर्थक वक्तव्य, कुतर्क, अश्लीलता और मूर्खतापूर्ण वक्तव्यों को रेखांकित करके मीडिया नकारात्मकता को हतोत्साहित करता है। यह अच्छी बात है। ट्रोलिंग कि माध्यम से भी ऐसी पोस्ट्स ख़ूब वायरल हो जाती हैं। लेकिन मुझे एक भी पोस्ट आज तक ऐसी नहीं मिली जो भाषा का स्तर पर सभ्य तथा शिष्ट लोगों की प्रशंसा में लिखी गयी हो। नकारात्मकता को हतोत्साहित करने में जितनी ऊर्जा व्यय होती है उसकी आधी ऊर्जा भी यदि सकारात्मकता के प्रोत्साहन में निवेश की जाए तो पूरा परिदृश्य बदल जाएगा।
जैसे प्रत्येक दल में बड़बोले, अशिष्ट और गालीबाज़ों की उपस्थिति है वैसे ही प्रत्येक दल में शिष्ट, विनम्र, शालीन तथा सभ्य नेताओं की भी उपस्थिति है। यह हमारा दुर्भाग्य है कि हम इन नेताओं के सद्गुणों पर चर्चा करते ही नहीं हैं।
बात ये सभी लोग अपनी-अपनी पार्टी के एजेंडे के अनुरूप ही कहते हैं, लेकिन बात कहने का इनका सलीक़ा उल्लेखनीय है।
दो दशक के सामाजिक जीवन, कवि-सम्मेलनीय यात्राओं और लपेटे में नेताजी के सैंकड़ों एपिसोड करने के कारण अनेकानेक राजनैतिक व्यक्तित्वों से भेंट हुई है। इनमें से कुछ लोगों की वक्तृत्व कला तथा भाषा शैली मन मोह लेती है।
मैं पुनः स्पष्ट कर दूँ कि इनमें से किसी भी नेता के राजनैतिक विचार पर चर्चा न करके मैं केवल इनके भाषा संस्कार की बात कर रहा हूँ।
इस क्रम में पहला नाम है श्री सुधांशु त्रिवेदी का। रामचरितमानस की चौपाइयों से लेकर हिंदी की सैकड़ों कविताएं, उर्दू के हज़ारों अशआर तथा संस्कृत के अनेक श्लोक इन्हें कंठस्थ हैं। किसी भी विषय पर अपनी बात रखते समय ये इन काव्यांशों से अपनी बात को पुष्ट करते हैं। भाषा का संस्कार ऐसा है कि शब्द सधे हुए तथा प्रभावी वाक्य विन्यास के साथ उपस्थित होते हैं।
ठीक इसी तरह श्रीमती रागिनी नायक को भी न जाने कितनी ही नज़्में, ग़ज़लियात, कविताएं, चौपाइयां और श्लोक रटे हुए हैं। और साहित्यिक समझ इतनी परिपक्व है कि संदर्भ उपस्थित होते ही बिल्कुल परफेक्ट पंक्तियाँ उद्धृत करने में ये दक्ष हैं। स्वर को कब कितना ऊँचा करना है और कब खिलखिलाकर चर्चा के तनाव को ग़ायब कर देना है -इसकी समझ रागिनी जी को भरपूर है।
एक वक्ता के रूप में सुधांशु जी और रागिनी जी; दोनों ही की एक ख़ासियत मुझे बहुत प्रभावित करती है और वह यह कि ये दोनों ही लोग सामनेवाले के अखाड़े में उसके स्तर पर उतरकर दाँव लगाना जानते हैं लेकिन जिस भी अखाड़े में उतरते हैं उसे बहुत जल्दी अपने स्तर तक ले आते हैं।
श्री शत्रुघ्न सिन्हा भी हर बात का उत्तर किसी काव्योक्ति से देकर लाजवाब कर देते हैं। उनका अध्ययन कोष बहुत समृद्ध है। और सबसे बड़ी बात यह कि वे अशआर को अशआर की ही तरह पढ़ना जानते हैं।
ऐसे ही एक वक्ता है श्री राकेश सिन्हा। कड़वे सवालों का उत्तर देते समय भी उनकी मिठास कभी ग़ायब नहीं होती। श्री सुधांशु मित्तल भी बड़े धैर्य के साथ विरोधी की बात सुनते हैं फिर मुस्कुराते हुए अपने राजनैतिक अनुभव के पिटारे से कोई संदर्भ तलाशकर धीमी आवाज़ में पुख्ता बात कहते हैं। श्री मनीष सिसोदिया भी असभ्यता के दायरे से दूर रहकर अपनी बात रखने में परिपक्व हैं।
तर्क की कसौटी पर श्री गौरव वल्लभ, श्री कन्हैया कुमार, श्री आलोक शर्मा, श्री कपिल सिब्बल, श्री श्रीकांत शर्मा, श्री शाहनवाज़ हुसैन, श्री अससुद्दीन ओवैसी भी विषय को भटकाने की बजाय टू द प्वाइंट उत्तर देते हैं, किन्तु इन सबको कई जगह धीरज खोते देखा जा चुका है। असभ्य न भी हों तो इनकी आवाज़ से इनके अनियंत्रण को भाँप लिया जाता है।
भारतीय राजनीति ने पंडित अटल बिहारी वाजपेयी और सुषमा स्वराज सरीखे वक्ताओं के उदाहरण प्रस्तुत किये हैं। लालू प्रसाद यादव जैसा हास्यबोध; आनन्द शर्मा जैसी समझ; शशि थरूर जैसी व्याख्या; के एक गोविंदाचार्य जैसी विद्वत्ता; राजनाथ सिंह जैसा ठहराव और मीरा कुमार जैसी मृदुता भारतीय राजनीति की पहचान रही है।
यदि हमने अच्छे लोगों की चर्चा करना शुरू कर दिया तो भारतीय राजनीति का वह दौर फिर लौट सकेगा।

✍️ चिराग़ जैन

विघटन

“अलवर में एक मूक-बधिर बालिका के साथ सामूहिक बलात्कार हुआ।” इस ख़बर में न तो ‘अलवर’ शब्द महत्वपूर्ण है, न ‘मूक-बधिर’। इसमें अगर कुछ महत्वपूर्ण है तो वह है बलात्कार। इसमें किसी शब्द पर शर्मिंदा हुआ जा सकता है तो वह शब्द है बलात्कार।
लेकिन हम इस एक शब्द को छोड़कर, बाक़ी हर शब्द पर चर्चा करेंगे। भाजपा समर्थक ‘अलवर’ शब्द को बार बार बोलकर राजस्थान की कांग्रेस सरकार को नीचा दिखाएंगे। उत्तर में कांग्रेस समर्थक ‘हाथरस-हाथरस’ चिल्लाकर उत्तर प्रदेश की भाजपा सरकार को चिकोटी काटेंगे। कोई ‘दलित-दलित’ चिल्लाएगा तो कोई बलात्कृता और बलात्कारी का धर्म बताकर चिल्लाने लगेगा।
लेकिन इन सब चीख़-चिल्लाहटों में वो एक चीख़ कराहकर दम तोड़ देगी, जो उस दुर्घटना में किसी चिड़िया के हलक़ से निकली होगी। हम बलात्कार को छोड़कर हर विषय पर चर्चा करेंगे।
आख़िर कब तक हम मूल विषय की आवाज़ को अपने शोर-शराबे की क्षमता से दबाते रहेंगे? कई बार ऐसा लगता है कि कहीं ये राजनैतिक दल इस बात की प्रतीक्षा तो नहीं करते कि चुनाव से पहले अगर विरोधी पार्टी की सरकार वाले राज्य में कोई बलात्कार हो जाए तो बाज़ी पलटी जा सकती है। …लेकिन मन यह मानने को तैयार नहीं होता कि कोई मनुष्य किसी बलात्कार की प्रतीक्षा कर सकता है। लेकिन जिस तरह बलात्कार के बाद राजनीति होती है, उसे देखकर इस आशंका को सिरे से ख़ारिज भी नहीं किया जा सकता।
निश्चित रूप से, प्रशासन या राजनेता बलात्कार जैसे घिनौने अपराध के समर्थन में नहीं हो सकते। लेकिन वे ऐसा कर पाने का नैतिक बल क्यों नहीं दिखा पाते कि इस तरह की किसी भी दुर्घटना पर अपराधी की जाति, धर्म और विचारधारा को दरकिनार करके स्पष्ट विरोध दर्ज कराए।
एक बार, किसी एक मुद्दे पर हम ख़ालिस इंसान होकर सोचने की हिम्मत क्यों नहीं जुटा पाते? किसानों की आत्महत्या भाजपा के शासनकाल में हुईं तो कांग्रेस शोर मचाने लगी। अरे भाई, एक बार यह स्वीकार क्यों नहीं करते कि एक भी आत्महत्या प्रशासन के लिए शर्मनाक है। फिर चाहे वह जिसकी भी सरकार हो।
एक बार, किसी एक मुद्दे पर हम सब कोरे भारतवासी होकर क्यों नहीं सोच सकते। एक बार भाजपा समर्थक भाजपा से, और कांग्रेस समर्थक कांग्रेस से सवाल क्यों नहीं पूछ पाते?
ऐसी कौन सी शासन व्यवस्था का सपना हम देख चुके हैं जिसमें शासन कोई भी करे, व्यवस्था पूरी तरह चरमराई ही रहेगी? एक बार महंगे को महंगा, झूठे को झूठा, मूढ़ को मूढ़, भ्रष्ट को भ्रष्ट, अभद्र को अभद्र, अश्लील को अश्लील क्यों नहीं कहा जा सकता?
एक बार विपक्षी पार्टी में मौजूद किसी अच्छे इंसान की सार्वजनिक प्रशंसा क्यों नहीं की जा सकती? इतने लंबे समय तक राजनीति को प्रमुख मानकर देख चुके तो एक बार मुद्दों को प्रमुख मानकर क्यों नहीं देखा जा सकता?
किसानों के आंदोलन पर पानी की बौछार करवाने वाली सत्ता की आलोचना करने वाला विपक्ष एक बार इतना नैतिक बल क्यों नहीं जुटा पाता कि वह रामदेव के आंदोलन पर आधीरात को हुए लाठीचार्ज के लिए क्षमायाचना कर सके।
अलवर के बलात्कार पर अशोक गहलोत को घेरने वाले भाजपाई एक बार यह स्वीकार क्यों नहीं कर पाते कि बलात्कार हाथरस में हो या हैदराबाद में; अलवर में हो या दिल्ली में …बलात्कार सिर्फ़ बलात्कार होता है। और इस अपराध के अपराधियों को यथाशीघ्र सज़ा दिलवाने के लिए हम सब राजनीतिज्ञ एकजुट होकर काम करेंगे।
एक बार किसी बलात्कार की ख़बर में घटनास्थल, जाति और धर्म टटोलने से पहले हम अपने घर के आंगन में खेलती किलकारी के सिर पर हाथ फेरकर यह शपथ क्यों नहीं उठा सकते कि कम से कम इस एक विषय पर हमारी धारणा किसी राजनैतिक प्रोपेगेंडा से प्रभावित नहीं होगी। न पक्ष में, न विपक्ष में।
दलित का बलात्कार! क्या मतलब है इस बात का? सवर्ण का होता तो क्या अपराध न होता? मुस्लिम के साथ दरिंदगी? हिन्दू, सिख, ईसाई, जैन के साथ होती तो दुखद न होती? आख़िर कब तक हम इन मातमों में माइक तलाशते रहेंगे?
कोई सद्भाव की बात करे तो उसमें वामपंथ तलाशा जाने लगता है। कोई मिलकर रहने को कहे तो उसे कांग्रेसी चमचा कहकर ट्रोल किया जाता है। कोई सांस्कृतिक चेतना का हवाला दे तो उसे संघी और भाजपाई कहकर अपमानित किया जाता है। कोई मनुष्यता पर सतर्क विवरण प्रस्तुत कर तो उसे रवीश का चेला कहा जाता है। कोई सभी दलों से अलग हटकर केवल भारतीय होने की अपील करे तो उसे केजरीवाल की राह पर चलने वाला बताया जाने लगता है।
मैं देश के सभी राजनैतिक दलों से अपील करता हूँ; मैं देश के सभी बुद्धिजीवियों से अनुरोध करता हूँ; मैं देश के सभी धर्मगुरुओं से निवेदन करता हूँ; मैं देश की सभी सेलिब्रिटीज़ से रिक्वेस्ट करता हूँ कि घृणा और विघटन की राह पर बहुत आगे निकल आए इस देश को एक बार मनुष्यता की भव्यता की याद दिलाएँ ताकि जब हमारी अगली पीढ़ी के साथ कोई अन्याय हो तो उसके आँसू पोंछने वाले हाथ उससे उसकी जाति, कुल, धर्म या राजनैतिक विचारधारा का सर्टिफिकेट न मांगे।

✍️ चिराग़ जैन

आगे टोल प्लाज़ा है

वह दिन दूर नहीं जब हर टोल प्लाज़ा पर लिखा होगा कि अगला टोल प्लाज़ा 500 मीटर आगे है।
2017 में भारत सरकार ने सभी वाहनों के लिए टोल टैक्स भुगतान करने के लिए ‘फास्ट टैग’ आवश्यक कर दिया था। इसके समर्थन में यह तर्क दिया गया था कि इससे टोल प्लाज़ा पर लगने वाली लम्बी कतारों से मुक्ति मिलेगी। (यद्यपि तब भी यह नियम था कि यदि टोल प्लाज़ा पर एक निश्चित दूरी से अधिक लम्बी लाइन लग जाए तो सभी वाहनों को बिना टोल वसूले जाने दिया जाएगा।)
यदि किसी ने फास्ट टैग न लगवाया तो टोल प्लाज़ा से गुज़रते समय उससे दोगुने पैसे वसूले जाएंगे। अब जनता विवश होकर निजी कंपनियों के पास फास्ट टैग ख़रीदने पहुँची। कंपनियों ने सिक्योरिटी मनी के रूप में 150-200 रुपये प्रत्येक वाहन धारक से धरवा लिए। रीचार्ज के लिए जमा करवाने वाली रक़म करोड़ों रुपये का आँकड़ा पार कर गयी।
अब हर वाहन पर फास्ट टैग लग गए और वाहन चालक यह समझने लगे कि टोल प्लाज़ा पर जाम लगना बंद हो जाएगा। कुछ जगह हुआ भी लेकिन अधिकतर टोल प्लाज़ा पर फास्ट टैग की मशीनें काम नहीं करतीं। वहाँ खिड़की पर बैठा वसूलीकर्ता आपको गाड़ी आगे-पीछे करवाता रहता है। फिर भी मशीन स्कैन न कर सके तो आपको कह दिया जाता है कि आपके फ़ास्ट टैग में बैलेंस नहीं है। आप आश्चर्यचकित होकर मोबाइल निकालते हैं। फिर उसमें फास्ट टैग की एप्प खोलकर उसे बैलेंस दिखाते हैं। वह अपने भावनाशून्य चेहरे को दूसरी ओर घुमाकर एक अजीब से स्वर में चिल्लाता है। उस स्वर को सुनकर कुछ मिनिट बाद एक प्राणी अपने हाथ में एक छोटा-सा स्कैनर लेकर आता है। आपके फास्ट टैग को स्कैन करता है और तब आप टोल से निकल पाते हैं।
इस पूरी प्रक्रिया में यदि आप थोड़े भी चिड़चिड़ाते हैं तो तुरंत आपकी गाड़ी के चारों ओर छह-सात पहलवान प्रकट हो जाएंगे और आपको प्रकान्तर से समझा देंगे कि हमसे पैसे वसूलने के लिए इन्होंने सरकार को पैसे दिए हैं, इसलिए इनका कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता।
रोज़-रोज़ की इस ज़्यादती से परेशान होकर आप थाने जाने का विचार करते हैं और एक दिन थाने चले जाते हैं। थानेवाले आपको पहले प्यार से और फिर डाँटकर चलता कर देते हैं। आप थाने के बाहर खड़े होकर समझ जाते हैं कि पुलिसवालों के हाथों बेइज़्ज़त होने की अपेक्षा ठेकेदार के गुंडों के हाथों लुटना बेहतर है।
अब टोल प्लाज़ा पर कितनी भी लाइन लगे, आप चुपचाप खड़े रहते हैं। इस जिल्लत से गुज़रते हुए आपको यह ध्यान ही नहीं रहता कि कब आपके टोल टैक्स में 20-25 प्रतिशत की वृद्धि कर दी गयी है। इस वृद्धि का विरोध नहीं किया जा रहा, इससे ठेकेदार ख़ुश है। ठेकेदार जनता से वसूलकर मोटा पैसा सरकार को दे रहा है, इससे सरकार ख़ुश है। (क्योंकि सरकार का काम बिज़निस करना नहीं है) और जनता… वह यह सोचकर ख़ुश है कि पहले से बनी हुई सड़क पर जो नया टोल प्लाज़ा बन रहा है, उस पर अभी टोल शुरू नहीं हुआ है।

✍️ चिराग़ जैन

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