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आस्था का अपमान

जो आस्था न तोड़ सका उसने मन्दिर तोड़े और जो विचार को न मिटा सका वह किताबें जलाने लगा। लेकिन यह कृत्य वीरता का नहीं, अपितु स्वयं के परास्त होने की घोषणा है। अभिमन्यु की हत्या करके कौरवों ने पाण्डवों को आतंकित नहीं किया था अपितु आश्वस्ति प्रदान की थी कि कौरवों का नैतिक बल समाप्त हो गया है।
जब तर्क करते-करते कोई तर्क के स्थान पर बल अथवा क्रोध का प्रयोग करने लगे तो यह सूचना है कि उसके तरकश में तर्क का कोई तीर शेष नहीं है। यह ऐसे ही है जैसे कोई धनुष से तीर छोड़ने के स्थान पर धनुष ही फेंककर मार दे।
किसी ग्रंथ की प्रतियाँ जलाना, किसी धर्म का आस्था केंद्र ध्वस्त करना, अपने विपक्षी की चरित्र हत्या करना, अपने विरोधी का नाम बिगाड़कर बोलना -यह सब इस बात की सूचना है कि तर्क के संग्राम में हमारे पार तर्क ही नहीं कुतर्क भी समाप्त हो चुके हैं।
यह सब कुछ बहुत बचकाना है। रामचरितमानस की प्रतियाँ जलाने से मानस में विराजित राम कैसे अपमानित हो सकते हैं? आप तुलसी की चौपाई पर तर्क करें, वह आपका अधिकार है किन्तु पुस्तक जलाकर आप उस ग्रंथ को मिटाना चाह रहे हैं तो यह आपके मूढ़ होने का प्रमाण है।
ये डिजिटल युग है भाई। दो कौड़ी की तुकबंदी करने वाले भी रेडियो तरंगों और बाइनरी में रूपान्तरित होकर अनन्त काल तक सुरक्षित रहने के जुगाड़ कर लेते हैं, ऐसे में आप हार्डकॉपी जलाकर रगों में दौड़ती रामचरितमानस को मिटाने का दंभ भर रहे हैं! हास्यास्पद है यह।
युद्ध में अनैतिक आचरण करनेवाला योद्धा, जन सहानुभूति खो देता है। बाबा तुलसी के जिस लेखन को आप फूंकना चाह रहे हैं, वह किसी काग़ज़ के टुकड़े पर नहीं बल्कि मानस पटल पर अंकित है।
जब कोई भाजपा का प्रवक्ता राजनैतिक बहस में विपक्षी नेताओं के नाम बिगाड़कर बोलता है तब यह साफ़ समझ आता है कि इस व्यक्ति के पास विचार का घोर अभाव है इसलिए यह हरकतों से ध्यान बंटाने की चेष्टा कर रहा है। राहुल गांधी को ‘पप्पू’ कहनेवाले; नरेंद्र मोदी को ‘फेंकू’ कहनेवाले; रवीश को ‘रबिश’ या ‘खबीस’ कहनेवाले दरअस्ल राहुल, मोदी या रवीश को नहीं चिढ़ा रहे होते हैं, ब्लकि अपनी पराजय पर एक बेहूदा हँसी का पर्दा डालने की कोशिश कर रहे होते हैं।
ठीक इसी प्रकार मानस की प्रतियाँ जलानेवाले मानस को भस्म नहीं कर रहे अपितु एक पूरे विमर्श को स्वाहा करने का कुत्सित प्रयास कर रहे हैं।
किसी को मानस के किसी अंश पर शंका हुई- इसमें कोई अपराध नहीं है। किसी अन्य ने अपने ज्ञान के अनुसार उस शंका का उत्तर दे दिया, इसमें भी कुछ ग़लत नहीं है। शंका करने वाला उत्तर से संतुष्ट नहीं हुआ- यह भी बेहद समान्य घटना है। निवारण करने वाला झल्लाहट और क्रोध से भर गया- यह भी स्वाभाविक है। चर्चा, शास्त्रार्थ में बदल गई; सन्दर्भ स्पष्ट किए गए -इस सबमें कोई बुराई नहीं थी। वरन् यह तो किसी सभ्य समाज के सविवेक होने का द्योतक है।
किन्तु इस चर्चा में शंका करनेवाले को अपमानित करना अनैतिक था और इस चर्चा के दौरान मानस की प्रतियां जलाना अपराध था।
तुलसी, राम और मानस; ये तीनों ही अग्नि के प्रभाव क्षेत्र से बहुत दूर निकल चुके हैं। मान-अपमान जैसे लौकिक शब्द भी इनके आभामंडल के तेज में विलुप्त हो जाते हैं। किंतु इनके विषय में चर्चा करते हुए अभद्रता या अराजकता की लक्ष्मण रेखा लांघनेवाला अपने संस्कारों का आधार कार्ड अवश्य सार्वजानिक कर देता है!
इस घटना पर इसके अपराधियों को लज्जित होना चाहिए और इस पर प्रतिक्रिया करने से पहले राम में आस्था रखने वाले हर मनुष्य को यह चौपाई अवश्य स्मरण रखनी चाहिए :

सौरज धीरज तेहि रथ चाका।
सत्य सील दृढ़ ध्वजा पताका॥
बल बिबेक दम परहित घोरे।
छमा कृपा समता रजु जोरे॥

✍️ चिराग़ जैन

भविष्य का अनुमान

किसी समाज के वर्तमान का आकलन उसके वैभव से किया जाता है, किंतु उसके भविष्य का अनुमान केवल उसके विवेक से लगाया जा सकता है। घटनाएँ और दुर्घटनाएं यदि समाज के लिए कुछ दिन तक न्यूज बुलेटिन की स्टोरी भर बनकर रह जाएं और उनसे बेहतर समाज के निर्माण का कोई विमर्श नहीं उपजे तो समझ लीजिए कि हमारी पीढ़ियां ख़तरे में हैं।
यह वर्ष प्रारंभ हुआ और देश की राजधानी में एक जीती-जागती लड़की सड़कों पर घसीटकर मार दी गई। पूस की सर्द रात में 12 किलोमीटर तक किसी इंसानी जिस्म के खुरदरी सड़क पर घिसटने की कल्पना से लोगों की रूह काँप गई।
सुबह होने से पहले लड़की दुनिया से जा चुकी थी और ख़बर दुनिया पर छा चुकी थी। अब शुरू हुआ हेडलाइंस और पब्लिक सिम्पैथी का घिनौना खेल।
न्यू ईयर के जश्न के तुरंत बाद मीडिया को एक सेंसेशनल स्टोरी मिली तो ‘पुलिस की लापरवाही’; ‘स्त्री सुरक्षा’ और बलात्कार जैसे शब्दों के साथ रिपोर्टिंग की जाने लगी। चूँकि ख़बर में पुलिस को विलेन बनाना था, इसलिए हर ख़बर में लड़की को ‘पीड़िता’ कहकर संबोधित किया जा रहा था।
दस बजते-बजते राजनीति गरमा गई और आरोपियों में से एक का भाजपा कनेक्शन भुनाने के लिए आम आदमी पार्टी एक्टिव हो गई। उधर दिल्ली के एलजी और केंद्र सरकार के गृह मंत्रालय ने घटना पर अफसोस ज़ाहिर करते हुए दिल्ली पुलिस से घटना की अपडेट लेनी शुरू कर दी।
दो दिन तक मीडिया मृतका की माँ के रोते-बिलखते फुटेज, सौरभ भारद्वाज की प्रेस कॉन्फ्रेंस, दिल्ली पुलिस के उच्च अधिकारियों की प्रेस स्टेटमेंट और थाने के बाहर जमा भीड़ की बाइट चलाकर काम चलाता रहा। उस रात के चश्मदीदों की क्लिप भी हर तीन-चार मिनिट में रिपीट होती रही, जिससे यह सिद्ध हो रहा था कि दिल्ली पुलिस नाकारा है। कुछ बड़े चैनल्स ने स्कूटी से टक्कर और गाड़ी के नीचे फंसी लड़की की एनीमेशन भी चलाई। एक डिवाइडर से यू टर्न लेती गाड़ी की सीसीटीवी फुटेज भी सैंकड़ों बार चलाई गई। बारह किलोमीटर तक घिसटकर मर चुकी लड़की को मीडिया दो दिन तक घसीटता रहा।
अदालत में सुनवाई होने से पहले ही आरोपियों को अपराधी घोषित कर दिया गया। पुलिस की चार्जशीट का तो पता नहीं लेकिन जल्दबाज़ रिपोर्टर्स ने उन्हें बलात्कारी कहने में देर नहीं लगाई।
लड़की की पहचान, उसके परिवार की पहचान, उसकी सहेली की पहचान सब कुछ मीडिया ने सार्वजानिक कर दी और विधि-पत्रकारिता के नियम-कायदे मुँह बाये देखते रह गए।
उधर एक आरोपी का भाजपा से सम्बंध होने के कारण भाजपा इस पूरे मुद्दे पर बैकफुट पर रही।
दो दिन बाद सुधीर चौधरी ने अपने ‘ब्लैक एंड व्हाइट’ में यह दावा किया कि कंझावला कांड में एक नया एंगल सामने आया है कि उस रात दुर्घटना में मरने वाली लड़की के साथ एक सहेली भी थी। सुधीर चौधरी ने यह भी बताया कि उस सहेली से उनके चैनल ने एक्सक्लूसिव बातचीत करके पता चला लिया है कि मृतका उस रात होटल के कमरे से शराब पीकर निकली थी और उसका उसकी सहेली से झगड़ा भी हुआ। होटल के स्टाफ से यह भी पता चल गया कि वह लड़की पहले भी इस होटल में आती रही है, कि उस लड़की से मिलने (थोड़ी देर के लिए) उसके पुरुष मित्र भी आए थे…!
इसके बाद अचानक सोशल मीडिया के ग्रुप्स में कुछ ऐसा पोस्ट किया जाने लगा जिससे ख़बर के प्रति लोगों का नज़रिया एकदम बदल गया। जो बिलखती माँ अपनी बेटी के हत्यारों को मृत्युदंड देने की मांग कर रही थी, वही अब अपनी मरी हुई बेटी को छीछालेदर से बचाने की कोशिश करती मिली।
मेरा प्रश्न यह है कि हम आख़िर कब तक इस प्रचार तंत्र के हाथों की कठपुतली बने रहेंगे? नीचे जो प्रश्न मैं पूछ रहा हूँ उनको गंभीरता से सोचकर अपने आप से उनके उत्तर पूछने का प्रयास करना :-
1. अगर वह लड़की किसी तथाकथित अपराध में लिप्त रही भी हो (जो सुनिश्चित करना न्यायालय का कार्य है) तो भी क्या उसे मार देने की छूट किसी अन्य नागरिक को दे देनी चाहिए?
2. अगर वह नशे की हालत में किसी गाड़ी से टकरा ही गयी थी, तो भी क्या उसे 12 किलोमीटर तक सड़क पर घसीटना जस्टीफाई किया जा सकता है?
3. रात के समय यदि कोई लड़की सड़क पर किसी भी स्थिति में मृत पाई जाए, तो क्या उस स्थिति में यह मान लेना चाहिए कि उसका बलात्कार ही हुआ होगा?
4. इस दुर्घटना के बाद क्या हमारे समाज को इस बात पर गंभीरता से विचार नहीं करना चाहिए कि देर रात तक बाहर रहने वाले लोगों की गतिविधियों पर कम से कम पारिवारिक अंकुश की पहल की जाए।
5. स्कूटी पर जा रही स्त्री हो या गाड़ी में घूम रहे पुरुष; दोनों ही के लिए भीषण सर्दी की रात में सुनसान सड़कों पर निकलना असुरक्षित क्यों नहीं है?
6. पुलिस की मुस्तैदी और कार्यशैली पर पूरी व्यवस्था को गंभीरता से पुनर्विचार क्यों नहीं करना चाहिए?
7. क्या यह सत्य नहीं कि पुलिसकर्मी से शिकायत करने पर यदि पुलिसवाला उल्टे आपको ही डाँटकर भगा दे तो आप कुछ नहीं कर पाते।
8. क्या यह सत्य नहीं कि पुलिस अपनी जनता से सुरक्षाकर्मी जैसा नहीं अपितु तानाशाह जैसा व्यावहार करती है।
9. क्या यह सत्य नहीं है कि आरोपियों में एक व्यक्ति के भाजपा सम्बंध से भाजपा विरोधियों को ‘अवसर’ मिल गया?
10. क्या यह सत्य नहीं की लड़की की सहेली की गवाही से भाजपा समर्थकों को ‘अवसर’ मिल गया?
11. क्या यह सत्य नहीं कि हमें हमारी सड़कों को दिन-रात सुरक्षित और निर्भय बनाए रखने के प्रयासों को वरीयता देनी चाहिए।
12. क्या यह आवश्यक नहीं कि इस घटना की रिपोर्टिंग करते समय मीडिया को मनुष्य होने की न्यूनतम अर्हता का ध्यान रखना चाहिए!
मेरा विनम्र अनुरोध है कि इस पोस्ट पर कोई भी टिप्पणी करने से पहले यह अच्छी तरह जाँच लें कि आप जो लिखने जा रहे है वह खुले हुए ज़ख़्म पर मरहम लगाने जैसा है, यदि आपकी उंगली ने रिसाव के किसी भी संवेदनशील तन्तु को छू दिया तो घाव की टीस, चित्कार बनकर मनुष्यता के कान फोड़ देगी!

✍️ चिराग़ जैन

मेरी मौत की ख़बर

एक रात
एक न्यूज़ चैनल
स्पीड की सारी हदें पार कर गया
न्यूज एंकर ने
मेरे टीवी पर
मुझे ही बताया कि मैं मर गया

नेशनल चैनल की न्यूज़ थी
इसलिए संदेह भी नहीं कर सकता था
और मीडिया का इतना सम्मान करता हूँ
कि इस ख़बर को सच साबित करने के लिए
मैं सचमुच मर सकता था

मैंने भी एक झटके में
दुनिया के हर तेज़ चैनल को बीट कर दिया
और अपने ट्विटर हैंडल से
अपनी ही आत्मा की शांति का ट्वीट कर दिया

अब क्या था
मेरी अच्छाइयों की चर्चा
हर फेसबुक फ्रेंड करने लगा
डेढ़ घंटे में ही RIP CHIRAG का हैशटैग
सोशल मीडिया पर ट्रेंड करने लगा

मेरे बारे में ऐसी-ऐसी बातें लिखी गईं
जिनके बारे मैं मैं ख़ुद नहीं जानता था
उस दिन मैंने लगभग डेढ़ सौ ट्वीट उन अजनबियों के पढ़े
जिन्हें मैं अपना भाई मानता था

उस दिन मुझे पता चला
कि मैंने
अपनी हर नयी कविता को
किस-किस से ठीक करवाया
ढाई सौ लोग ऐसे मिले
जिन्होंने मदद करके
मेरा एक कमरे का मकान बनवाया

उस दिन हर इंसान के
बदले हुए किरदार दिख रहे थे
जो मुझसे उधार लिए बैठे हैं
वो भी मुझे कर्ज़दार लिख रहे थे

उस दिन इतनी ऊँची-ऊँची छोड़ी गई
कि छोड़ने वाले ख़ुद ही नहीं पकड़ पाए
तीन सौ लोगों ने मुझे उंगली पकड़ कर मंच पर चढ़ाया
और उनमें से ढाई सौ तो ख़ुद नहीं चढ़ पाए

एक ने तो यहाँ तक लिखा
कि मुझे हिन्दी का व्याकरण ही उससे ‘सिखा’

वो बहुत प्रतिभाशाली था
वो बहुत अच्छा था
हमेशा खरा बोलता था
मंच पर जादू करता था
हर ओर मेरे सद्गुणों की चर्चा ख़ूब होने लगी
कॉपी-पेस्ट टाइप की श्रद्धांजलियां पढ़-पढ़कर
मुझे मरने से ऊब होने लगी

जब लोगों ने मेरी बर्दाश्त से ज़्यादा
मेरा महिमामंडन कर दिया
तो मैंने अपने मरने की ख़बर का खण्डन कर दिया

खण्डन की ख़बर से
एक ओकेजनल फ्रेंड सचमुच उदास हो गया
कितनी मेहनत से श्रद्धांजलि की पोस्ट लिखी थी
तेरह सौ लाइक्स भी आ गए थे
सारी माइलेज का सत्यानाश हो गया

एक रिश्तेदार ने गुस्से में फोन किया
ये क्या तरीक़ा है भाईसाहब
पहली बार तो आपकी मौत की न्यूज़ मिली थी
वो भी झूठ हो गयी
आपकी तो शोकसभा तक हूट हो गई
मैंने तो तेरहवीं के लिए
हलवाई भी बुक करवा दिया है
भाईसाहब आपने नहीं मर के
मुझे मरवा दिया है

एक ने तो गुस्से में यहाँ तक कह डाला
फिर बच गया साला।

थोड़ी ही देर में मैं जान चुका था
कि आज की दुनिया में
मौत की ख़बर का भी
मल्टिपल यूज़ है
ऐसी हर ख़बर
किसी के लिए पोस्ट
किसी के लिए ट्वीट
और किसी के लिए ब्रेकिंग न्यूज़ है

हम लोगों को एक-दूसरे के मर जाने का इंतज़ार है
ज़िंदा बच जाने का डर है
संवेदना की लाश पर खड़े लोगों के लिए
अब मौत भी एक अवसर है

✍️ चिराग़ जैन

दीमक का चारा

जो व्यक्ति घर में फैले कचरे से परेशान है, वह घर से प्यार करता है। उसे यह कहकर ट्रोल नहीं किया जा सकता कि वह हमारे घर को कचरा कहकर हमारी भावनाओं को आहत कर रहा है।
जो कचरे को देख ही नहीं पा रहा है, वह उसे साफ़ कैसे करेगा? यदि कभी उसे सफाई का अभिनय करना भी पड़ा तो वह अनजाने में घर का ज़रूरी सामान कचरे के दाम बेच देगा। क्योंकि जो लोग उसे सामान और कचरे की पहचान करा सकते थे उनकी आवाज़ को तो उसने घरद्रोही कहकर ख़ामोश कर दिया था।
जो मेहमान के आने पर कचरे को कोने में दुबकाने में विश्वास करता है, वह घर भर को बदबू से भरने की तैयारी कर रहा है। दीवार के ऊपर चूना पोत देने से भीतर की दीमक ढक जाती है, मरती नहीं है। घर को दीमक मुक्त करने के लिए दीमक की बांबी तक पहुँचना होगा। लेकिन जो भी इस प्रयास में दीवार को खुरचने चला, उसे आपने घरद्रोही कहकर प्रताड़ित किया। उसके हाथ में जो औज़ार थे, उन्हें हथियार सिद्ध करके आपने उसे घर से बहिष्कृत भी करवा दिया। घर के प्रति उसकी सद्भावना को निर्वसन करके निष्कासित कर दिया।
जिन हाथों में दीमक के उपचार का यंत्र था, वे हाथ अपने चीथड़े सम्भालने में व्यस्त हो गए। उधर दीमक दीवार को खोखला करके बाहर निकलने लगी तो उस शक्तिहीन बहिष्कृत को कोसते हुए आपने दीवार से बाहर निकलते घिनौने बुरादे के आगे कोई शोपीस रख दिया। जब दीमक वह शोपीस भी खाने लगी तो आपने किसी दूसरी दीवार पर घर के किसी पुरखे की तस्वीर टांक दी और घोषित कर दिया कि घर का जो सदस्य इस तस्वीर का सत्कार नहीं करेगा, वह घर द्रोही होगा।
घरवाले पुरखे की तस्वीर पूजने में व्यस्त हो गए और दीपक पुरखों की विरासत को खोखला करती रही। जब तस्वीर भी दीमक के आगोश में समाने लगी तो सबको अलग अलग तस्वीरें थमा दी गईं।
पुरखों के बनाए घर पर दीमक लगी है और हम अपनी अपनी तस्वीरें लेकर इतरा रहे हैं। जिसने यह दीमक देख ली उसकी आँखें मत फोड़ो। जो रोज़ नया शोपीस रखकर आपको एक कमरे से दूसरे कमरे में टहला रहा है, उसके मन का कपट समझने का प्रयास करो, क्योंकि उसने आपके पूरे घर को दीमक का चारा बना डाला है।

✍️ चिराग़ जैन

मिलियन व्यूज़ का सवाल है रे बाबा!

‘व्यू बढ़ाने के लिए कुछ भी करेंगा‘ -यह वाक्य वर्तमान समाज का मूलमंत्र बन गया है। किसी की औक़ात और हैसियत इस बात से मापी जाने लगी है कि उसे कितने लोग फॉलो करते हैं। दुनिया के तमाम काम लाइक, फॉलो, सब्रक्राइब, शेयर और कमेंट जैसे शब्दों तक सीमित हो गए हैं।
आप कितने भी बड़े योगी हों, अगर आपके सोशल मीडिया फॉलोअर्स नहीं हैं, तो आपका योग किसी काम का नहीं। और अगर आपने किसी तरह से सोशल मीडिया पर स्वयं को योगी सिद्ध कर दिया तो फिर योग की कोई सिद्धि हो या न हो, कोई फर्क़ नहीं पड़ता। इसीलिए सफल योगी बनने के लिए योग करने से अधिक आवश्यक है, ट्वीट करना।
आपकी दुकान चले या न चले, फेसबुक चलती रहनी चाहिए। फेसबुक की एक्टिविटी रुक गयी तो दुकान पर ग्राहकों की भीड़ से कोई लाभ नहीं।
आप वाइल्ड लाइफ सफारी पर जाएँ तो पर्यटक बनकर नहीं, फोटोग्राफर बनकर जाएँ। शेर दिखे तो उसे निहारने की बजाय कैमरा निकालकर जिराफ़ बन जाइए। न जाने कौन-सा क्लिक आपको इंस्टा पर फेमस कर देगा।
रील्स देखो तो समझ आता है कि फेमस होने की इस होड़ में न कोई मर्यादा शेष बची है, न ही कोई हिचक। साठ सेकेंड तक दर्शकों को अपनी रील पर रोके रखने के लिए सारी सीमाएं लांघ दी गईं। कूल्हे मटकाकर दर्शकों का मन नहीं बहला तो नंगी पीठ दिखाकर रोक लिया। इससे भी बात नहीं बनी तो भद्दी गालियाँ देकर फेमस होने निकल पड़ी। आजकल स्कर्ट या फ्राक के नीचे के वस्त्र दिखाने तक को नॉर्मल माना जाने लगा है। 30 सेकेंड की इन वीडियो क्लिप को मिलियन और बिलियन व्यू का आँकड़ा दिलाने के लिए युवतियों ने लज्जा को ब्रेन से ब्लॉक कर दिया है।
पुरुष भी इस अपराध में समान उत्तरदायी है। पूरा-पूरा दिन स्क्रॉल करके रील देखनेवाले अंगूठों की रेखाएँ घिसने लगी हैं। मोबाइल की स्क्रीन में क़ैद हो चुकी आँखों में इतनी रौशनी ही नहीं बची है कि हम अपने समाज पर घिर आए अंधेरे को पहचान सकें। जिस युवा पीढ़ी के हाथों में देश की बागडोर होनी थी उसके हाथ टच स्क्रीन मोबाइल की अदृश्य बेड़ियों से बंधे हुए हैं। अफ़ीम के नशे से तो देश बच गया लेकिन मोबाइल के असीम नशे से बचने का कोई रास्ता नहीं दिखाई दे रहा है।
ट्रेन के आगे लेटने से लेकर अनावश्यक और वीभत्स स्टण्ट करने तक सब कुछ करने की हिम्मत है इस पीढ़ी के पास। फेसबुक लाइव पर आत्महत्या तक देख चुके हम लोग फेमस होने की इस अंतहीन होड़ में अपने वारिसों के स्वर्णिम भविष्य की बलि लिए चले जा रहे हैं। मृत्यु के भयावह वीडियो जब तक गूगल और फेसबुक के आर्टिफिशल इंटेलिजेंस द्वारा अवरुद्ध किए जाते हैं तब तक उन्हें डाउनलोड करके व्हाट्सएप पर वायरल कर दिया जाता है। यूट्यूब का सिस्टम गुप्तांगों की पहचान करने में सक्षम है और ऐसे सभी वीडियो ब्लॉक कर देता है जिनमें स्त्री अथवा पुरुष के गुप्तांगों का स्पष्ट प्रदर्शन हो।
गूगल की इस क्रूरता से लड़ने के लिए हमारे क्रांतिकारी युवाओं ने ऐसे झीने उपाय खोज लिए हैं, जिन्हें गूगल की आँखें न बेंध सकें लेकिन समान्य व्यूअर का मन बहलता रहे। झीना परिधान ख़रीदने की स्थिति न हो तो किसी भी कपड़े पर पानी डालकर अपने फॉलोअर का मन बहलाया जा सकता है।
आप किसी भी धर्म से संबद्ध हों, फेमस होने की भूख ने आपके समाज के युवाओं को अभद्र तथा आपके समाज की युवतियों को अश्लील बनाने की पूरी तैयारी कर ली है। सुहागरात की वीडियो बनाकर वायरल करने तक के क़िस्से सामने आ रहे हैं।
प्रेम, वात्सल्य, संवेदना, करुणा और यहाँ तक कि हास्य भी किसी एक इमोजी का मोहताज होकर रह गया है। प्रतिक्रिया के बहाने आपके सोचने-समझने की क्षमता जीवित न हो जाए इसलिए आपका स्मार्टफोन आपको हर बात का उत्तर देने के लिए प्री-फिक्स वाक्यों का सुझाव दे देता है। हर भाव को व्यक्त करने के लिए इमोजी उपलब्ध है, अब आप अपने चेहरे पर भाव लाए बिना भी अपनी प्रतिक्रिया लिखकर भेज सकते हो।
ज़ुबान कट जाए तो जी सकते हैं लेकिन अंगूठा कट गया तो जीना सम्भव न होगा। दवाई छूट सकती है लेकिन पोस्ट नहीं छूटनी चाहिए। बैंक का ब्याज कम हो जाए पर चैनल का ग्राफ नहीं गिरना चाहिए। चैनल की पॉपुलरिटी कम होने लगे तो किसी को गाली दे दो, किसी की चरित्र-हत्या कर दो, ख़़ुद नंगे हो जाओ या किसी को नंगा कर दो… चैनल चलता रहना चाहिए।
कुछ न कर सकें तो भी ‘केवल फेमस होने की भूख से ओतप्रोत’ अनर्गल, अश्लील, भौंडी, भद्दी, अभद्र वीडियो पोस्ट करनेवालों को ब्लॉक करने की पहल भी कर ली तो इस मरती हुई संस्कृति को कुछ साँसें उधार देनेवालों में आपका नाम भी शामिल होगा।

✍️ चिराग़ जैन

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